भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के जलीय क्षेत्र में एक बड़ा जलवायु परिवर्तन आकार ले रहा है, जहां समुद्र की सतह का तापमान असामान्य गति से बढ़ रहा है। नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) द्वारा जारी नवीनतम पूर्वानुमानों के अनुसार, प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति तेजी से मजबूत हो रही है। वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर से दिसंबर 2026 की अवधि के दौरान इस प्रणाली के वर्ष 1950 के बाद से दर्ज किसी भी अल नीनो चक्र की तुलना में अधिक विनाशकारी होने की 69 प्रतिशत संभावना जताई गई है। इसके अतिरिक्त, मौसम विशेषज्ञों ने उत्तरी गोलार्ध में आने वाली शीतकालीन अवधि के दौरान इस मजबूत अल नीनो के बने रहने की 90 प्रतिशत संभावना आंकी है, जिससे वैश्विक स्तर पर मौसम और कृषि प्रणालियों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
प्रशांत महासागर में तापमान वृद्धि और ENSO चक्र का तंत्र
जुलाई के महीने के दौरान प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसके आगामी महीनों में और अधिक तीव्र होने का अंदेशा है। NOAA के अनुसार, जब इतनी व्यापक पैमाने पर समुद्री घटना घटित होती है, तो इसके साथ जुड़ी प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों का उभार होना लगभग तय हो जाता है। अल नीनो वास्तव में अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का गर्म चरण होता है, जो उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के गर्म होने और वायुमंडलीय हवाओं के दबाव में आने वाले बदलावों से पैदा होता है।
मौसम विज्ञान के मानकों के अनुसार, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में तीन महीने का औसत समुद्री तापमान एक निर्धारित सीमा से ऊपर चला जाता है, तब आधिकारिक तौर पर अल नीनो की स्थिति घोषित की जाती है। यह ENSO चक्र तीन मुख्य चरणों में विभाजित रहता है: अल नीनो की गर्म अवस्था, सामान्य या न्यूट्रल स्थिति, और ला नीना का ठंडा चरण। अल नीनो के दौरान समुद्र का जल असामान्य रूप से गर्म होने से वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण बिगड़ जाता है, जिससे कई महाद्वीपों में बारिश की नियमित प्रणाली बाधित होती है, भीषण सूखा पड़ता है और तापमान में तीव्र बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
भारतीय मानसून पर असर और 2026 की वर्षा के आंकड़े
भारत के दृष्टिकोण से अल नीनो का गहरा महत्व है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इसका संबंध सामान्य से कम बारिश से रहा है। अतीत में जब-जब प्रशांत महासागर में जलस्तर अत्यधिक गर्म हुआ है, तब-तब भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी बारिश पर दबाव देखा गया है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच हर बार एक समान संबंध नहीं होता, क्योंकि भारतीय वर्षा तंत्र पर कई अन्य समुद्री और वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है।
मौजूदा वर्ष 2026 के मानसून सीजन के दौरान भारत में अब तक सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। 1 जून से 13 अगस्त 2026 के बीच देश भर में कुल 491.8 मिलीमीटर बारिश हुई है, जो ऐतिहासिक सामान्य औसत से 12 प्रतिशत कम है। इस सीजन की शुरुआत काफी शुष्क रही थी, जहां अकेले जून के महीने में बारिश में 35.4 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई थी। यद्यपि जुलाई के महीने में बारिश का आंकड़ा सामान्य स्तर के आसपास पहुंच गया था, लेकिन भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार अगस्त और मानसून के शेष बचे हिस्से में सामान्य से कम बारिश होने की ही संभावना जताई गई है।
भारतीय क्षेत्र में प्रभाव पहुंचने की समयसीमा और मानसूनी राहत
विकसित हो रहे इस अल नीनो की समयसीमा भारत के लिए काफी रणनीतिक मोड़ पर आ रही है। जलवायु अध्ययनों से पता चलता है कि प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाले मौसमी बदलावों का असर भारतीय महासागर और भारतीय उपमहाद्वीप के क्षेत्रों पर तुरंत नहीं दिखता। प्रशांत महासागर के मौसमी संकेतकों का प्रभाव हिंद महासागर तक पहुंचने में आमतौर पर 40 से 45 दिनों का समय अंतराल लगता है।
चूंकि इस अल नीनो का सबसे चरम रूप वर्ष 2026 के अंतिम महीनों में दिखाई देगा, इसलिए इसका वास्तविक प्रभाव तब स्पष्ट होगा जब भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने समापन चरण में होगा। भारत में मानसून की आधिकारिक वापसी की सामान्य तिथि 30 सितंबर निर्धारित है। ऐसे में जब तक इस अल नीनो का पूर्ण प्रभाव भारतीय वायुमंडल पर पहुंचेगा, तब तक मानसून की मुख्य बारिश की अवधि बीत चुकी होगी। यही कारण है कि इस वर्ष की मानसूनी बारिश पर अल नीनो का सीधा और व्यापक विनाशकारी असर सीमित रहने की उम्मीद है।
इंडियन ओशन डाइपोल की भूमिका और अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव
प्रशांत महासागर की गतिविधियों के अलावा, हिंद महासागर में उत्पन्न होने वाला इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) भी भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है। IOD भी ENSO की तरह हिंद महासागर में समुद्र और वायुमंडल के बीच का एक जलवायु पैटर्न है। वर्तमान में IOD न्यूट्रल यानी तटस्थ स्थिति में बना हुआ है। हालांकि, IMD के पूर्वानुमान संकेत देते हैं कि मानसून के अंतिम चरण में IOD के सकारात्मक यानी पॉजिटिव दिशा में जाने की प्रबल संभावना है।
सकारात्मक IOD की स्थिति में हिंद महासागर का पश्चिमी भाग गर्म हो जाता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप पर बादलों का निर्माण और बारिश की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। यदि IOD सकारात्मक हो जाता है, तो यह अल नीनो से उत्पन्न होने वाली शुष्कता को काफी हद तक बेअसर कर सकता है। फिर भी, चूंकि भारत की विशाल आबादी, कृषि क्षेत्र और जल संसाधन पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर हैं, इसलिए इस तरह की समुद्री विसंगतियां अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा चिंता का विषय बनती हैं। 2026 के अंत और उसके बाद के महीनों में इस मजबूत अल नीनो के कारण आगामी फसलों और शीतकालीन मौसम पर पड़ने वाले संभावित असर पर लगातार नजर रखना बेहद आवश्यक है।



















