चिकित्सा जगत में अपनी सादगी और निस्वार्थ सेवा के लिए खास पहचान रखने वाले जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. टीके लहरी इन दिनों गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थान बीएचयू के आईसीयू वार्ड में उन्हें भर्ती कराया गया है, जहां वे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। दिलचस्प और प्रेरणादायक बात यह है कि जिस परिसर में उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष बिताकर अनगिनत गंभीर मरीजों को नया जीवनदान दिया था, आज उसी अस्पताल के बिस्तर पर वे खुद उपचाराधीन हैं।
साधा जीवन और त्याग की अनूठी मिसाल
डॉ. टीके लहरी का जीवन हमेशा से ही अनुशासन, सादगी और सेवा भावना का पर्याय रहा है। उन्होंने साल 1997 के बाद से बीएचयू से मिलने वाली अपनी सैलरी का एक भी रुपया अपने लिए इस्तेमाल नहीं किया। वे वेतन के सारे पैसे गरीब और जरूरतमंद मरीजों के कल्याण तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दान कर दिया करते थे। यहां तक कि रिटायरमेंट के बाद भी उनका सेवा भाव कम नहीं हुआ और वे लगातार ओपीडी में बैठकर मरीजों की मुफ्त देखभाल करते रहे। अपनी पेंशन की रकम को भी उन्होंने पूरी तरह से जनहित और चिकित्सा कार्यों में ही समर्पित कर दिया था।
पैदल चलना और आम जिंदगी जीना पसंद
उनकी सादगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ महीने पहले तक वे बेहद साधारण और छोटे से मकान में रहते थे। उनका निवास स्थान बीएचयू अस्पताल से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर था और मौसम चाहे जो भी हो, वे रोज पैदल ही अस्पताल आते-जाते थे। उनके पास निजी वाहन या कार जैसी कोई सुख-सुविधा नहीं थी। हाथ में छाता थामे हुए सड़क पर पैदल चलते हुए उनका यह दृश्य स्थानीय लोगों के लिए आम था और लोग उन्हें किसी फरिश्ते से कम नहीं मानते थे।
शिक्षा और करियर का सफर
उनका जन्म 3 जनवरी 1941 को कोलकाता शहर में हुआ था। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने विदेश का रुख किया और साल 1969 में इंग्लैंड से कार्डियक सर्जरी के क्षेत्र में FRCS की डिग्री हासिल की। इसके बाद साल 1972 में उन्होंने M.Ch की पढ़ाई पूरी की। विदेश से लौटने के बाद उन्होंने महानगरों की चकाचौंध से दूर रहकर चिकित्सा सेवा को ही अपना एकमात्र धर्म बना लिया। बीएचयू में उन्होंने रीडर, असिस्टेंट प्रोफेसर, प्रोफेसर और डिपार्टमेंट के डीन जैसे अहम पदों की जिम्मेदारी संभालते हुए अपनी सेवाएं दीं और हर पल मरीजों की भलाई के लिए समर्पित रहे।
लाखों की सैलरी का समर्पण
प्राप्त जानकारी के अनुसार, साल 1994 के दौर में भी उनकी मासिक सैलरी 1 लाख रुपये से अधिक हुआ करती थी। उस दौर में इतनी बड़ी रकम होना अपने आप में बड़ी बात थी, लेकिन उन्होंने कभी इस धन से आलीशान बंगले या मर्सिडीज जैसी महंगी गाड़ियां नहीं खरीदीं। वे सिर्फ अपने दो वक्त के भोजन का खर्च रखकर बाकी सारी संपत्ति और आय को मरीजों की सेवा में लगा देते थे। उनके इस महान और असाधारण योगदान को मान्यता देते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी खुले मंच से उनकी प्रशंसा की है।
चिकित्सा के क्षेत्र में उनके विशिष्ट और ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2016 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया था। हालांकि, यह बड़ा सम्मान मिलने के बाद भी उनके स्वभाव में रत्ती भर भी अहंकार नहीं आया। वे हमेशा खुद को एक साधारण चिकित्सक ही मानते रहे जिनके लिए डॉक्टरी कोई पेशा नहीं बल्कि इंसानियत की सेवा का माध्यम थी। स्वस्थ रहने के दिनों में वे अस्पताल पहुंचते ही सीधे मरीजों से घुलते-मिलते थे, उनकी हर तकलीफ को बहुत गौर से सुनते थे और दवा के साथ-साथ मानसिक संबल भी प्रदान करते थे।
बीमारी और मौजूदा स्थिति
पिछले करीब 8 महीनों से डॉ. लहरी स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियों से जूझ रहे हैं और बीएचयू में ही उनका इलाज चल रहा है। वर्तमान में वे विशेषज्ञ डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में हैं। जिस आईसीयू वार्ड में उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान अनगिनत गंभीर मरीजों की सांसों को टूटने से बचाया था, आज भाग्यवश वे खुद उसी यूनिट के एक बेड पर जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। उनकी इस स्थिति से उनके चाहने वाले और पूरा चिकित्सा समुदाय चिंतित है तथा उनके शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहा है।




















