रूस को रास्ते से हटाकर सीधे यूरोप तक अपना माल पहुंचाने के लिए चीन ने एक नई रेलवे लाइन बिछाने का काम शुरू कर दिया है। किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान से होकर गुजरने वाला यह प्रोजेक्ट अब भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक और भूराजनैतिक चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग किर्गिस्तान के दौरे पर पहुंचे थे, और इसी दौरान इस महत्वाकांक्षी रेल परियोजना को आगे बढ़ाने पर बातचीत हुई। भले ही शी जिनपिंग का मकसद अपने देश का व्यापार बढ़ाना रहा हो, लेकिन इसका सीधा असर भारत की रणनीतिक और कारोबारी स्थिति पर पड़ने वाला है।
चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेल लाइन का पूरा खाका
चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के तहत बन रही इस रेलवे लाइन को चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान यानी सीकेयू रूट कहा जा रहा है। करीब 500 किलोमीटर लंबी यह लाइन तैयार होते ही चीन रूस को बीच में लाए बिना सीधे यूरोप तक अपना माल भेज सकेगा। यह दोनों देशों को जोड़ने वाला अब तक का सबसे छोटा रेल मार्ग होगा। इस रूट का सबसे बड़ा हिस्सा, यानी करीब 305 किलोमीटर, किर्गिस्तान की पहाड़ी सीमा में बनाया जा रहा है, जहां सुरंगों के जरिये पटरी बिछाई जा रही है। इसी कड़ी में चीन ने किर्गिस्तान में 210 मीटर लंबी एक सुरंग बनाने का काम भी शुरू कर दिया है। एक बार यह पूरा प्रोजेक्ट खत्म हो गया तो चीन से यूरोप तक सीधी रेल कनेक्टिविटी उपलब्ध हो जाएगी, जो अभी संभव नहीं है।
27 सुरंगें, 43 पुल और 20 स्टेशन बनाने की योजना
इस 500 किलोमीटर लंबे रूट पर चीन ने कुल 27 सुरंगें, 43 पुल और 88 रोडबेड सेक्शन तैयार करने की योजना बनाई है। रास्ते भर में 20 रेलवे स्टेशन भी बनाए जाने हैं। इतने बड़े ढांचागत निर्माण के पीछे चीन की मंशा हर मौसम में तेज और भरोसेमंद सप्लाई चेन खड़ी करने की है, ताकि बर्फबारी या खराब मौसम में भी माल की आवाजाही न रुके। इस प्रोजेक्ट के पूरा होते ही चीन की सीधी पहुंच यूरोप और मिडिल ईस्ट तक हो जाएगी। इतना ही नहीं, आने वाले समय में यह रूट पाकिस्तान और हिंद महासागर तक जमीनी रास्ते से जुड़ सकता है, जिससे मिडिल ईस्ट, दक्षिण एशिया के साथ यूरोप में भी चीन के कारोबार में और तेजी आने की संभावना है।
सेंट्रल एशिया में भारत को पीछे छोड़ सकता है चीन
इस रेलवे लाइन के चालू होते ही सेंट्रल एशिया के बाजार में चीन की पकड़ काफी मजबूत हो जाएगी, और वह इस क्षेत्र में भारत से आगे निकल सकता है। नई लाइन से चीन और यूरोप के बीच की दूरी घटकर करीब 900 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे सफर के 7 से 8 दिन बच जाएंगे। जाहिर है कि जब चीन की सप्लाई इतनी तेज हो जाएगी, तो भारत के लिए इस पूरे इलाके में मुकाबला करना कठिन हो सकता है। बताया जा रहा है कि इस रेलवे लाइन की सालाना क्षमता करीब 1.5 करोड़ टन होगी, जो भारत के कारोबार पर सीधा असर डाल सकती है। दूसरी तरफ भारत को अभी सेंट्रल एशिया तक पहुंचने के लिए समुद्री रास्ते का सहारा लेना पड़ता है, जो ईरान के चाबहार बंदरगाह पर टिका हुआ है।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान तक पहुंच बनी तो भारत को झटका
अगर आगे चलकर चीन का यह रेल नेटवर्क अफगानिस्तान और पाकिस्तान की रेलवे लाइनों से जुड़ जाता है, तो यह भारत के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है। ऐसा होने पर चीन किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अरब सागर तक अपना कारोबार पहुंचा सकेगा। उज्बेकिस्तान खुद भी इस रूट को हिंद महासागर से जोड़ने की योजना पर काम कर रहा है। ऐसा हुआ तो चीन को पाकिस्तान के बंदरगाहों और अरब सागर तक पहुंचने का एक और वैकल्पिक रास्ता मिल जाएगा, जिसे भारत के लिए सबसे बड़ा भू-राजनैतिक खतरा माना जा रहा है।
भारतीय निर्यातकों पर बढ़ सकता है दबाव
चीन की इस नई रेल लाइन का सीधा असर भारत के लिए सेंट्रल एशिया के बाजार पर पड़ेगा। अगर चीन इस बाजार में कम कीमत वाला सामान तेजी से पहुंचाने लगा, तो मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंज्यूमर गुड्स और औद्योगिक उपकरण जैसे सामान का निर्यात करने वाले भारतीय कारोबारियों के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। इससे भारतीय कंपनियों पर कीमत और डिलीवरी दोनों मोर्चों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
चाबहार बन सकता है भारत का जवाब
हालांकि चीन के इस प्रोजेक्ट से भारत के लिए एक नया मौका भी बनता दिख रहा है। इससे भारत के लिए चाबहार परियोजना की अहमियत और बढ़ जाएगी, जिसके जरिये भारत ईरान और सेंट्रल एशिया तक अपना सामान आसानी से पहुंचा सकता है। इसके अलावा भारत के पास इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी आईएनएसटीसी के जरिये यूरोप और रूस तक अपना कारोबार बढ़ाने का भी विकल्प मौजूद है। इस नजरिए से देखें तो आने वाले वर्षों में चाबहार भारत के लिए सिर्फ एक बंदरगाह भर नहीं, बल्कि पूरे सेंट्रल एशिया का लॉजिस्टिक्स गेटवे बन सकता है।



















