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पितृ पक्ष 2026: जानिए भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होने वाले 16 दिनों के श्राद्ध के जरूरी नियम और तर्पण की सही विधिउत्तराखंड
16 सित॰ 2026, 7:02 am (6 दिन पहले)· 0

पितृ पक्ष 2026: जानिए भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होने वाले 16 दिनों के श्राद्ध के जरूरी नियम और तर्पण की सही विधि

हिन्दू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए समर्पित पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से होती है। इस 16 दिवसीय पवित्र अवधि में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराने के साथ गाय, कुत्ते और कौए के लिए भोजन का अंश निकालने का विशेष विधान है।

सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति आभार प्रकट करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की अवधि को बेहद खास माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो लोग इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण जैसे अनुष्ठान करने से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है और किसी भी तरह के पितृ दोष से राहत मिलती है। यह पूरा दौर कुल 16 दिनों तक चलता है और इसकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होने का नियम तय किया गया है। धार्मिक ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि इन विशेष दिनों में पूर्वज अपनी लोक से उतरकर पृथ्वी पर आते हैं और परिजनों द्वारा किए जाने वाले श्रद्धा कर्म को स्वीकार कर उन्हें सुरक्षित जीवन का आशीर्वाद देते हैं।

भाद्रपद पूर्णिमा से होती है शुरुआत

शुरुआती तिथियों और इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए पंडित श्रीधर शास्त्री ने लोकल 18 को बताया कि अक्सर लोगों के मन में यह गलतफहमी रहती है कि इन अनुष्ठानों का आरंभ आश्विन महीने से होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुल 16 दिनों की यह अवधि वास्तव में भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है। आश्विन कृष्ण पक्ष की पहली तिथि यानी प्रतिपदा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक कुल 15 दिन श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। पंचांग के गणित के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा के दिन उन्हीं पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो। इसके अलावा शास्त्रों में यह नियम भी बताया गया है कि पूर्णिमा के दिन ननिहाल पक्ष यानी नाना-नानी के पितरों के निमित्त भी तर्पण और श्रद्धा कर्म किए जा सकते हैं।

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जीव-जंतुओं के लिए भोजन का अंश

अनुष्ठानों और नियमों के बारे में आगे बताते हुए ज्योतिषी ने कहा कि पूर्वजों को तृप्त करने के लिए बलि कर्म का बहुत अधिक महत्व माना गया है। जब भी घर में भोजन तैयार किया जाता है, तो सबसे पहले गाय, कुत्ते और कौए के लिए एक निश्चित हिस्सा अलग निकाला जाता है जिसे ग्रास कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से ही अर्पित किया गया भोजन सीधे पूर्वजों तक पहुंच जाता है।

श्राद्ध भोज में खीर की अनिवार्यता

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पूर्वजों के लिए बनने वाले भोजन में दूध, घी और मुख्य रूप से चावल की खीर का होना बहुत जरूरी माना गया है। सात्विक और सफेद रंग की मिठाइयां पूर्वजों को सबसे ज्यादा पसंद आती हैं। पूरी विधि-विधान के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना, इसके अलावा कुशा और काले तिलों के साथ दी जाने वाली तिलांजलि घर के सभी पितृ दोषों को शांत करती है। पूर्णिमा से शुरू होकर अमावस्या पर समाप्त होने वाले इस धार्मिक अनुष्ठान से पूर्वज प्रसन्न होकर अपने परिजनों को सुख, समृद्धि और लंबी उम्र का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

सवाल-जवाब

पितृ पक्ष की शुरुआत कब से होती है?
पितृ पक्ष की विधिवत शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से होती है और यह सर्वपितृ अमावस्या तक कुल 16 दिनों तक चलता है।
भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किसके लिए किया जाता है?
यह श्राद्ध केवल उन्हीं पूर्वजों के लिए किया जाता है जिनका निधन किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो।
श्राद्ध के भोजन में सबसे महत्वपूर्ण क्या माना गया है?
श्राद्ध के भोजन में दूध, घी और विशेष रूप से चावल की खीर का होना अनिवार्य माना गया है।
किन जीवों के लिए सबसे पहले भोजन निकाला जाता है?
भोजन तैयार होने पर सबसे पहले गाय, कुत्ता और कौए के लिए अंश निकाला जाता है जिसे ग्रास कहा जाता है।
पूर्णिमा तिथि पर किसका श्राद्ध किया जा सकता है?
इस तिथि पर नाना-नानी यानी मातृकुल के पितरों का भी श्राद्ध और तर्पण श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·5 दिन पहले

संस्कृति और परंपरा से जुड़ी ऐसी विषयवस्तु अब केवल धार्मिक पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल और ओटीटी स्पेस में भी 'माइथोलॉजी और एसेस्टर्स' जैसे जॉनर में बड़े पैमाने पर स्ट्रीम की जा रही है। इस प्रकार की रिपोर्ट्स पाठकों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय परंपराओं आधारित कंटेंट की बढ़ती मांग को भी स्पष्ट करती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

यह पारंपरिक अनुष्ठान अब एक बड़े 'सिल्वर इकॉनमी' और फेस्टिव मार्केट का हिस्सा बन चुका है। पितृ पक्ष के दौरान पारंपरिक भोज, पूजा सामग्री, और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने पर होने वाला पारिवारिक व्यय देश के कंज्यूमर मार्केट में एक बड़ा अल्पकालिक आर्थिक चक्र तैयार करता है, जिससे एफएमसीजी और सेवा क्षेत्र को विशेष गति मिलती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

यह आर्थिक पहलू इस बात का प्रमाण है कि हमारी संस्कृति किस प्रकार विशाल आर्थिक चक्रों को संचालित करती है। पितृ पक्ष जैसे धार्मिक आयोजनों पर होने वाला पारिवारिक व्यय सीधे तौर पर स्थानीय बाजारों, खुदरा व्यापार और सेवा प्रदाताओं को मजबूती देता है। यह चक्र स्पष्ट करता है कि सांस्कृतिक गतिविधियां और बाजार की मांगें किस तरह एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

यह रिपोर्ट पितृ पक्ष की शुरुआत और इसके धार्मिक स्वरूप को स्पष्ट करती है। उत्तर प्रदेश और देश के ग्रामीण व शहरी इलाकों में इस 16 दिवसीय काल के दौरान बाजारों में पूजन सामग्री, गाय और कौए के लिए निकाले जाने वाले ग्रास की वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। साथ ही, अनुष्ठानों के दौरान सामाजिक और पारिवारिक मेल-मिलाप का माहौल भी बनता है, जो सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

इस धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष के इतर, ऐसे आयोजनों के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से प्रशासन की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। विशेषकर बड़े मंदिरों, नदी घाटों और तर्पण स्थलों पर जुटने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करना और यातायात सुचारू बनाए रखना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती रहता है। इसके अलावा, अनुष्ठानों के नाम पर भीड़भाड़ वाले बाजारों में सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना भी कानून-व्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा है।

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