वैज्ञानिक प्रयोगों और दवा तथा उत्पाद परीक्षण के लिए प्रयोगशालाओं में रखे जाने वाले बेजुबान जीवों के जीवन और सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार की ओर से पेश किए गए नए मसौदा नियमों पर आम जनता और विशेषज्ञों से अपने विचार साझा करने के लिए 5 नवंबर तक की मियाद तय की गई है। इस पृष्ठभूमि में पीपल फॉर एनिमल्स से जुड़ी पशु कल्याण कार्यकर्ता अंबिका शुक्ला ने प्रस्तावित नीतिगत बदलावों पर कड़े सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर इन बदलावों को बिना आवश्यक सुधारों के लागू कर दिया गया, तो यह न केवल प्रयोगशालाओं के भीतर जीवों पर होने वाली ज्यादती को बेहिसाब बढ़ा देगा, बल्कि भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान की साख और नतीजों की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाएगा।
दर्द, दहशत और क्रूरता से जूझते बेजुबान जीव
वैज्ञानिक परीक्षणों की बंद दीवारों के पीछे जानवरों की वास्तविक हालत पर रोशनी डालते हुए अंबिका शुक्ला ने बताया कि आम नागरिक अक्सर उन अंतिम आविष्कारों और दवाओं का लाभ उठाते हैं जो उनके जीवन को सुगम बनाती हैं, परंतु इसके पीछे की प्रक्रिया को नहीं देख पाते। दर्द, खौफ, अकेलापन, भूख और भीषण मानसिक तनाव ऐसी भावनाएं हैं जिन्हें मनुष्य की तरह ही पशु भी गहराई से महसूस करते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि असहनीय शारीरिक यातना सहने के बावजूद वे अपनी पीड़ा को मानव शब्दों में प्रकट करने में असमर्थ होते हैं।
प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले बीगल प्रजाति के कुत्तों की स्थिति का उदाहरण देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि इन परीक्षण केंद्रों में उनकी चीख और कराहने की आवाज को बाहर जाने से रोकने के लिए उनके वोकल कॉर्ड्स तक काट दिए जाते हैं। कई ऐसे बीगल जीव जो किसी तरह ऐसे परीक्षण परिसरों से बाहर निकाले जाते हैं, वे शेष जीवन हमेशा के लिए अपनी स्वाभाविक आवाज खो चुके होते हैं। इसी प्रकार सौंदर्य प्रसाधनों और उपभोक्ता सामानों के परीक्षण का ब्योरा देते हुए उन्होंने बताया कि खरगोशों पर शैंपू की जांच के दौरान उनके सिर को एक स्थिर उपकरण में पूरी तरह जकड़ दिया जाता है ताकि उनकी आंखें खुली रहें, जिसके बाद सीधे उनकी आंखों में शैंपू की बूंदें डाली जाती हैं। यह रासायनिक प्रक्रिया अत्यंत तीव्र पीड़ा और जलन उत्पन्न करती है। लिपस्टिक और अन्य प्रसाधनों की जांच में भी ऐसी ही दर्दनाक प्रक्रियाओं को आजमाया जाता है।
स्रोत की अनिश्चितता और आवारा पशुओं के इस्तेमाल का खतरा
प्रस्तावित नियमों के तकनीकी पहलुओं पर आपत्ति दर्ज करते हुए अंबिका शुक्ला ने कहा कि पूर्व व्यवस्था के तहत वैज्ञानिक शोध के लिए केवल उन्हीं जीवों के उपयोग की अनुमति थी जिनका पालन-पोषण प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में किया गया हो। इससे उन पशुओं के स्वास्थ्य, उनके पूर्व चिकित्सा इतिहास और जैविक स्थिति पर पूरा नियंत्रण बना रहता था, जो सटीक शोध परिणामों के लिए अनिवार्य है। इसके विपरीत, नए मसौदे में प्रयोगशालाओं को बाहरी स्रोतों से जानवर हासिल करने की छूट देने की बात कही गई है।
इस प्रस्तावित छूट में यह स्पष्ट व्याख्या नहीं दी गई है कि शोध संस्थान किन स्थानों से जीवों को ला सकते हैं। इस अस्पष्टता के कारण यह बड़ा अंदेशा पैदा होता है कि सड़कों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों, बिल्लियों, स्थानीय बाजारों या यहां तक कि जंगलों से वन्यजीवों को पकड़कर अनुसंधान के लिए भेजा जाने लगेगा। किसी भी अनियंत्रित परिवेश से उठाए गए बीमार अथवा अज्ञात पृष्ठभूमि वाले जीवों पर किए गए परीक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से अपूर्ण और त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष दे सकते हैं, जिसका सीधा नुकसान आगे चलकर इंसानी सेहत को भी हो सकता है।
निगरानी तंत्र में ढील और हितों का खुला टकराव
अंबिका शुक्ला ने परीक्षणों की मंजूरी और उनके निरीक्षण की प्रशासनिक व्यवस्था में प्रस्तावित फेरबदल पर भी गंभीर ऐतराज जताया है। पहले की व्यवस्था में किसी भी शोध परियोजना को हरी झंडी देने और उसकी सतत निगरानी सुनिश्चित करने के लिए एक केंद्रीय स्तर की विशेषज्ञ समिति जिम्मेदार होती थी, जो निष्पक्ष मूल्यांकन करती थी। नए प्रस्तावों में इस जिम्मेदारी को सीमित करते हुए स्वयं शोध संस्थानों को अपने ही प्रयोगों को मंजूरी देने का अधिकार सौंपने का प्रावधान किया गया है।
इस व्यवस्था को हितों के सीधे टकराव की संज्ञा देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी अनुसंधान संस्थान अथवा विश्वविद्यालय अपने ही प्रस्तावित प्रोजेक्ट को खारिज या अमान्य क्यों करेगा। ऐसी आंतरिक मंजूरी प्रणाली से बाहरी और स्वतंत्र निगरानी की रीढ़ टूट जाएगी। इसके अतिरिक्त, प्रस्तावित नियमों में प्रयोगशालाओं के औचक निरीक्षण की जगह पहले से सूचना देकर जांच करने की बात कही गई है। पूर्व सूचना मिलने पर किसी भी प्रयोगशाला को अपनी खामियों, अव्यवस्थाओं अथवा नियमों के उल्लंघन को छिपाने का पर्याप्त समय मिल जाएगा, जिससे निष्पक्ष निरीक्षण का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
वैज्ञानिक साख पर आंच और आधुनिक विकल्पों की जरूरत
मसौदे में खुले स्थानों पर प्रयोग करने की अनुमति के संकेत पर भी उन्होंने चिंता जाहिर की। उन्होंने स्पष्ट किया कि धूल, मिट्टी, तापमान में बदलाव और अनियंत्रित मौसम के बीच किए गए प्रयोगों के परिणाम कभी भी एक समान और दोहराने योग्य नहीं हो सकते। वैज्ञानिक शोध की पहली शर्त नियंत्रित वातावरण और मानक परिस्थितियां हैं, जिसके अभाव में शोध के परिणाम अविश्वसनीय हो जाते हैं। यदि भारतीय मानकों को कमजोर किया गया, तो विदेशी कंपनियां अपने देशों के सख्त कानूनों से बचकर भारत की प्रयोगशालाओं को सस्ते और अनियंत्रित परीक्षणों के केंद्र के रूप में इस्तेमाल करने लगेंगी, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान की छवि को गहरा आघात लगेगा।
अंबिका शुक्ला के अनुसार, भारत पहले ही सौंदर्य प्रसाधनों के लिए जानवरों पर परीक्षण बंद करने के बावजूद इस उद्योग में उल्लेखनीय प्रगति और विस्तार दर्ज कर चुका है। इसलिए स्थापित सुरक्षा तंत्र को पीछे ले जाने का कोई तार्किक आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि संवेदनशीलता और उच्च स्तरीय वैज्ञानिक शोध परस्पर विरोधी नहीं हैं; जानवरों को स्वच्छ, खुला और तनावमुक्त वातावरण देने से ही विश्वसनीय नतीजे संभव हैं। आज जब विश्व स्तर पर एआई, स्टेम सेल और कंप्यूटर आधारित सिमुलेशन मॉडल तेजी से विकसित हो रहे हैं, भारत को आधुनिक वैज्ञानिक विकल्पों को अपनाना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे 5 नवंबर की तय तारीख से पहले अपनी आपत्तियां और राय सरकार के समक्ष मजबूती से दर्ज कराएं।
















