प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए जानवरों के इस्तेमाल को लेकर तैयार किए गए केंद्र सरकार के नए मसौदे पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। पीपल फॉर एनिमल्स की ट्रस्टी और पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि नए दिशा-निर्देशों से प्रयोगशालाओं के भीतर पशुओं की सुरक्षा के लिए दशकों से बना ढांचा ध्वस्त हो सकता है। उनका मानना है कि इन बदलावों का दायरा केवल बेजुबान प्राणियों पर होने वाली शारीरिक यातनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में होने वाले वैज्ञानिक प्रयोगों की प्रामाणिकता, स्वास्थ्य सुरक्षा और औषधीय शोध की गुणवत्ता पर भी गहरा नकारात्मक असर डाल सकता है। बेजुबान जीव अपनी वेदना शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते, इसलिए उन पर होने वाले प्रयोगों में मानवीय संवेदना और सख्त सरकारी नियंत्रण का होना अनिवार्य माना जाता रहा है।
मौजूदा कानूनी सुरक्षा तंत्र को कमजोर करने के आरोप
पशु कल्याण और संरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर करीब 30 वर्षों का जमीनी अनुभव रखने वाली गौरी मौलेखी का कहना है कि सरकार का यह मसौदा बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। उनका विश्लेषण है कि इस प्रकार के नियम सामने आने के पीछे दो मुख्य वजहें हो सकती हैं। पहली संभावना यह है कि इस नीति को तैयार करने वाले नीति-निर्माताओं को मौजूदा कानूनों और जमीनी वास्तविकताओं की बुनियादी समझ नहीं है। दूसरी आशंका यह है कि कुछ खास व्यावसायिक उद्योगों को मनमानी छूट और वित्तीय लाभ पहुंचाने के इरादे से इन नियमों को इस तरह गढ़ा गया है। उन्होंने आगाह किया कि इन प्रावधानों का असर केवल शोध में इस्तेमाल होने वाले जीवों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समूचे उद्योग जगत, वैज्ञानिक समुदाय और अंततः आम जनता की सेहत को भी प्रभावित करेगा। जहां एक तरफ वैश्विक स्तर पर पशु संरक्षण कानूनों को और अधिक कड़ा बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ हमारे यहां पहले से स्थापित सुरक्षा व्यवस्था को ढीला करने की तैयारी की जा रही है।
हितों के टकराव की स्थिति और लैब को मनमानी मंजूरी की छूट
प्रस्तावित ड्राफ्ट के सबसे विवादित बिंदु को रेखांकित करते हुए गौरी मौलेखी ने बताया कि इसमें वैज्ञानिक संस्थानों और प्रयोगशालाओं को यह तय करने की खुली छूट दी जा रही है कि उन्हें किस प्रयोग के लिए सरकारी अनुमति की दरकार है और किसे वे बिना बाहरी अनुमति के खुद ही आगे बढ़ा सकते हैं। किसी परीक्षण में जीव को होने वाले दर्द और पीड़ा की श्रेणी को कम या ज्यादा आंकने का अधिकार भी स्वयं शोध संस्थान के हाथों में सौंप दिया गया है। इसे हितों के प्रत्यक्ष टकराव की गंभीर स्थिति बताते हुए उन्होंने कहा कि संस्थान के भीतर गठित होने वाली 6 सदस्यों की आंतरिक समिति में 4 प्रतिनिधि उसी संस्थान के होंगे, जबकि महज 2 सदस्य बाहरी होंगे। ऐसी संरचना में संस्थान से जुड़े लोग बहुमत के बल पर अपने पक्ष में आसानी से मंजूरी हासिल कर लेंगे, जिससे किसी भी प्रकार की निष्पक्ष और तटस्थ जांच की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।
वैज्ञानिक औचित्य और पूर्व जांच की प्रक्रिया पर सवाल
वैज्ञानिक परीक्षणों की पारंपरिक प्रक्रिया को समझाते हुए मौलेखी ने रेखांकित किया कि किसी भी शोध को शुरू करने से पहले एक विस्तृत प्रोटोकॉल तैयार किया जाता है। इस दस्तावेज में यह स्पष्ट दर्ज करना अनिवार्य होता है कि अध्ययन के लिए कितने जीवों की जरूरत होगी, उन पर क्या-क्या चिकित्सीय या रासायनिक प्रक्रियाएं की जाएंगी, कौन सी खुराक दी जाएगी और पूरे परीक्षण का वैज्ञानिक औचित्य क्या है। इसके बाद कड़े स्तर पर यह परखा जाता है कि क्या इस अध्ययन को बिना जानवरों के किसी वैकल्पिक तकनीक से पूरा किया जा सकता है, क्या निर्धारित संख्या से कम जीवों में काम चल सकता है, और क्या वाकई यह प्रयोग समाज के हित में बेहद जरूरी है। अब तक यह पूरी प्रक्रिया सरकारी नियंत्रण वाली निगरानी प्रणाली के अधीन थी। लेकिन नए मसौदे के तहत कम दर्द वाले बताए जाने वाले परीक्षणों को प्रयोगशालाएं अपनी ही आंतरिक समिति से हरी झंडी दे सकेंगी, जिससे प्रक्रिया की पारदर्शिता समाप्त हो जाएगी।
खुले बाजार से खरीद और आवारा जानवरों के इस्तेमाल का जोखिम
प्रस्तावित मसौदे में शामिल एक और प्रावधान पर आपत्ति दर्ज कराई गई है, जिसके अनुसार यदि पंजीकृत ब्रीडर्स के पास परीक्षण के लिए जीव उपलब्ध न हों, तो प्रयोगशालाएं फार्म में पाले जाने वाले जानवरों, पक्षियों और मछलियों को खुले बाजार से खरीद सकेंगी। मौलेखी ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसी ढील से रिहायशी इलाकों के आसपास घूमने वाले आवारा कुत्तों, बंदरों तथा गाय-बैलों को भी अनुसंधान के नाम पर पकड़कर लैब में ले जाने का गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। उन्होंने इस प्रक्रिया के वैज्ञानिक खतरों का उल्लेख करते हुए बताया कि सड़कों, गलियों या जंगलों से उठाए गए जानवरों में पहले से मौजूद अज्ञात बीमारियां, कीटाणु और शारीरिक संक्रमण परीक्षण के वैज्ञानिक आंकड़ों को विकृत कर सकते हैं। जब बुनियादी डेटा ही दूषित होगा, तो उसके आधार पर तैयार होने वाली दवाओं के नतीजे इंसानी स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
परीक्षणों के दौरान क्रूरता और असहनीय पीड़ा की अनदेखी
प्रयोगशालाओं की चारदीवारी के भीतर पशुओं पर होने वाले बेहद दर्दनाक परीक्षणों का विवरण देते हुए मौलेखी ने स्पष्ट किया कि कई मामलों में दवाओं की प्रभावशीलता जांचने के लिए खरगोशों की हड्डियों को जानबूझकर तोड़ा जाता है। टॉक्सिसिटी यानी दवाओं के विषैलेपन की जांच के दौरान जीवों को इतनी अत्यधिक मात्रा में दवाइयां दी जाती हैं कि उनमें से 50 प्रतिशत की मौत हो जाए, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एलडी-50 परीक्षण कहा जाता है। इसके अलावा सौंदर्य प्रसाधनों और रसायनों की जलन की जांच करने के लिए जीवित खरगोशों की संवेदनशील आंखों में तरल डाला जाता है। यहां तक कि हेलमेट की सुरक्षा क्षमता परखने के लिए जीवित और पूरी तरह होश में रहने वाले बंदरों के सिर पर भारी यांत्रिक दबाव डाला जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि नए मसौदे में ऐसी यातनाओं से बचाव की शर्तें कमजोर कर दी गई हैं।
पांच साल तक लगातार प्रयोग और दर्द निवारक दवाओं की अनदेखी
नए प्रस्तावों के अंतर्गत सामने आई एक और बात का उल्लेख करते हुए मौलेखी ने बताया कि अब एक ही जीव पर लगातार 5 वर्ष की अवधि तक बार-बार परीक्षण किए जा सकेंगे। उन्होंने कहा कि पहले के नियमों में परीक्षण के दौरान एनेस्थीसिया और दर्द निवारक दवाओं का प्रयोग अनिवार्य किया गया था, लेकिन नए मसौदे में इस अनिवार्य सुरक्षा प्रावधान को हटा दिया गया है। शारीरिक आघात के अलावा उन्होंने जानवरों की मानसिक प्रताड़ना की ओर भी ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि जानवर केवल सुई चुभने या घाव होने का शारीरिक दर्द ही नहीं सहते, बल्कि वे अपने झुंड से अलग होने का अकेलापन, निरंतर तनाव, भय और अवसाद भी झेलते हैं। किसी जीव को लंबे समय तक भूखा रखना या उसकी स्वाभाविक शारीरिक गतिविधियों को पिंजरे में बांध देना भी अमानवीय प्रताड़ना है, जिसे केवल साधारण पैमाने से नहीं मापा जा सकता।
वैश्विक मानकों के उलट दिशा में जाने का डर
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य की तुलना करते हुए मौलेखी ने यूरोपीय संघ द्वारा वर्ष 2010 में लागू किए गए कड़े कानूनों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ में किसी भी जीव पर शोध करने से पहले शोधकर्ताओं को कानूनी रूप से यह साबित करना होता है कि किसी भी गैर-पशु विकल्प से यह काम क्यों संभव नहीं है। वहां जीवों की संख्या को न्यूनतम रखने और परीक्षण पूरा होने के बाद उनके सुरक्षित पुनर्वास की पुख्ता व्यवस्था करना अनिवार्य है। इसके विपरीत, भारत में लाया गया नया मसौदा प्रयोगशालाओं को मनमानी छूट देता हुआ प्रतीत होता है। मौलेखी ने आशंका व्यक्त की कि इस नीति से वे अंतरराष्ट्रीय प्रयोग, जिन्हें कड़े नियमों की वजह से विकसित देशों में मंजूरी नहीं मिलती, भारत में कराए जाने लगेंगे। इससे भारत एक तरह से वैश्विक रिसर्च का डंपिंग ग्राउंड और जीवों के लिए यातना गृह बनकर रह जाएगा।
औचक निरीक्षण की व्यवस्था खत्म होने से निगरानी पर चोट
निगरानी तंत्र के कमजोर होने पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि पहले स्वतंत्र जांच दलों को प्रयोगशालाओं का औचक निरीक्षण करने का कानूनी अधिकार था, जिससे वे बिना किसी पूर्व सूचना के मौके पर जाकर वास्तविक हालात देख सकते थे। लेकिन नए नियमों में निरीक्षण से पहले प्रयोगशाला को अग्रिम सूचना देने का प्रावधान जोड़ा जा रहा है। मौलेखी का कहना है कि पहले से सूचना मिलने पर संस्थान अपनी कमियों, अनियमितताओं, पशुओं की दयनीय स्थिति और इस्तेमाल होने वाले अवैध उपकरणों को छुपाने में सफल हो जाएंगे। अपने एक पूर्व निरीक्षण का उदाहरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज की टॉक्सिकोलॉजी लैब में औचक छापे के दौरान 27 बड़े सांप मृत पाए गए थे, जिनमें लगभग 19 फीट लंबी मादा किंग कोबरा भी शामिल थी। उस समय संबंधित निगरानी समिति ने फौरन हस्तक्षेप कर कड़ी कार्रवाई की थी, जो पूर्व सूचना मिलने पर कभी संभव नहीं हो पाती।
विकल्पों को अपनाने और 5 नवंबर तक आपत्तियां दर्ज कराने का आह्वान
गौरी मौलेखी ने बल देकर कहा कि आधुनिक युग में भारत के पास चिकित्सा, विज्ञान और तकनीकी अनुसंधान में विश्व का नेतृत्व करने का अभूतपूर्व अवसर है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत कंप्यूटर सिमुलेशन और प्रयोगशाला में विकसित कोशिकाओं की मदद से जानवरों पर होने वाली क्रूरता को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि देश में नियम और निगरानी कमजोर होगी, तो वैश्विक मंच पर हमारे शोध की साख गिरेगी और भारत वैज्ञानिक प्रगति की दौड़ में पीछे छूट जाएगा। उन्होंने आम नागरिकों, वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, औद्योगिक प्रतिनिधियों और पशु कल्याण संगठनों से अपील की है कि वे इस मसौदे पर सरकार द्वारा तय की गई 5 नवंबर की समयसीमा से पहले अपनी लिखित आपत्तियां और सुझाव अवश्य दर्ज कराएं, ताकि कानून ऐसा बने जो देश को आधुनिकता की ओर ले जाए, न कि दशकों पीछे धकेल दे।
















