प्रयोगशालाओं में जानवरों पर किए जाने वाले वैज्ञानिक प्रयोगों को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए मसौदा नियमों पर चर्चा तेज हो गई है। आम जनता और विशेषज्ञों के पास 5 नवंबर तक इन प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव तथा आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर है। जामिया हमदर्द के विभागाध्यक्ष और 2017 में गठित 'सोसायटी फॉर अल्टरनेटिव्स टू एनिमल एक्सपेरिमेंट्स' के उपाध्यक्ष डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने इन नियमों के विभिन्न पहलुओं, देश के औषधि उद्योग और जीव कल्याण से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अपना विस्तृत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि इन मसौदा नियमों को सिरे से खारिज करने के बजाय इनमें जरूरी संशोधन करना समय की मांग है।
अर्थव्यवस्था और आधुनिक दवा अनुसंधान में पशु परीक्षण की भूमिका
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और औषधि निर्माण की प्रक्रिया में प्रयोगशाला परीक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते हैं। डॉक्टर शेख रईसुद्दीन के अनुसार यह विषय सिर्फ अकादमिक रिसर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की समग्र अर्थव्यवस्था से भी बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत का औषधि निर्माण उद्योग घरेलू सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी में उल्लेखनीय योगदान देता है। भारत में तैयार होने वाली दवाइयों का निर्यात बड़े पैमाने पर अफ्रीकी देशों, अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे विकसित बाजारों में किया जाता है। किसी भी नई दवा को इंसानों तक पहुंचाने से पहले सुरक्षा के सख्त मानकों की जांच आवश्यक होती है, जिसके लिए शुरुआती चरणों में पशुओं पर परीक्षण की व्यवस्था अपनाई जाती रही है।
लैब में पशुओं की स्थिति और जैविक अंतर की चुनौतियां
चिकित्सा विज्ञान में किसी भी नए यौगिक या फॉर्मूलेशन का सीधे मानव शरीर पर परीक्षण करना कानूनन और चिकित्सकीय रूप से संभव नहीं होता। इसी कारण चूहों, रैट्स और खरगोशों पर प्रयोग किए जाते हैं। डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने स्पष्ट किया कि साधारण घरेलू चूहों और प्रयोगशाला वाले रैट्स में बड़ा जैविक अंतर होता है। प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाली प्रजातियों को विशेष रूप से प्रजनन के जरिए लैब के भीतर ही तैयार किया जाता है, उन्हें सीधे खुले पर्यावरण से नहीं पकड़ा जाता। हर इंसान की आनुवंशिक संरचना जिस प्रकार भिन्न होती है, उसी तरह रैट्स और खरगोशों का जेनेटिक्स भी अलग होता है।
परीक्षण के दौरान इन बेजुबान जीवों को शारीरिक पीड़ा और गंभीर बीमारियों के दौर से गुजरना पड़ता है। यदि परीक्षण के दौरान किसी दवा की अत्यधिक खुराक दे दी जाए तो जानवर की मृत्यु तक हो सकती है। डॉक्टर रईसुद्दीन का कहना है कि यदि प्रयोग उचित प्रोटोकॉल, सावधानी और वैज्ञानिक संवेदनशीलता के साथ किए जाएं तो जानवरों पर पड़ने वाले इन प्रतिकूल प्रभावों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
जैविक संरचना के मामले में जानवर और मनुष्य एक जैसे नहीं होते। उदाहरण के लिए, रैट्स में उल्टी करने की शारीरिक क्षमता नहीं होती। यदि कोई मनुष्य किसी कड़वे या हानिकारक पदार्थ का सेवन करता है तो उसका शरीर उल्टी के जरिए उसे बाहर निकाल देता है, जबकि रैट्स ऐसा नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, खरगोश अत्यधिक संवेदनशील जीव होते हैं और उन्हें गाजर दी जाती है। इंसानों के भीतर भी भौगोलिक आधार पर भिन्नताएं पाई जाती हैं। यूरोप के निवासियों की त्वचा में मेलेनिन की कमी के कारण त्वचा कैंसर की संभावना अधिक रहती है, जबकि भारत और अफ्रीका जैसे गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों के लोगों की त्वचा में मेलेनिन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
रासायनिक प्रभाव और इंसानी सुरक्षा के व्यावहारिक पहलू
विभिन्न जीवों पर रसायनों का प्रभाव काफी हद तक समान प्रतीत होने के बावजूद कई स्तरों पर भिन्न भी हो सकता है। किसी दवा की जो खुराक एक छोटे चूहे के लिए उपयुक्त होती है, वह इंसानों के लिए पूरी तरह अलग अनुपात में तय की जाती है। गाय, भैंस और बिल्लियों में कई तरह के एंजाइम नहीं पाए जाते, जिससे दवाओं का असर बदल सकता है।
इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां पशु परीक्षण में पूरी तरह सुरक्षित पाई गई दवाएं इंसानों के लिए नुकसानदेह साबित हुईं। जेंटामाइसिन नामक एंटीबायोटिक इसका बड़ा उदाहरण है। यह दवा जानवरों के परीक्षण में सुरक्षित दिखी थी, लेकिन बाद में इंसानों में इसके उपयोग से गुर्दे की गंभीर बीमारियां सामने आने लगीं। इसके अलावा, दवाओं का प्रभाव मरीज की उम्र पर भी निर्भर करता है, जहां बच्चों और वृद्धों के लिए खुराक का पैमाना अलग होता है। नर और मादा के हार्मोनल चक्र भी परिणामों को प्रभावित करते हैं। मादा जीवों में हार्मोनल बदलावों के कारण प्रतिक्रियाएं बदल सकती हैं। इन सभी जटिलताओं को समझने और सुरक्षित दवा तैयार करने में खरबों रुपये और अरबों डॉलर का भारी खर्च आता है, जिसका अंतिम उद्देश्य मानव स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
वैकल्पिक वैज्ञानिक तकनीकों की प्रगति और सीमाएं
विज्ञान के विकास के साथ पशुओं पर निर्भरता कम करने के कई आधुनिक विकल्प उभर रहे हैं। वर्तमान में ऑर्गन ऑन चिप और ह्यूमन ऑन चिप जैसी आधुनिक प्रणालियों पर तेजी से काम हो रहा है। यकृत और गुर्दे की जैविक कार्यप्रणाली को अब इन माइक्रोचिप्स पर रीक्रिएट कर रसायनों का अध्ययन किया जा रहा है। डॉक्टर शेख रईसुद्दीन के अनुसार न्यू अप्रोच मेथोडोलॉजीस आने वाले समय में अनुसंधान के तौर-तरीकों को बदल देंगी। उनका अनुमान है कि आगामी एक दशक के बाद ऐसी स्थिति बन सकती है जहां केवल कुछ ही विशिष्ट परिस्थितियों में जीवित जानवरों पर परीक्षण की जरूरत रह जाएगी।
हालांकि, व्यवहार संबंधी अध्ययनों में अभी भी पशुओं का परीक्षण पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। यदि किसी जानवर में पहले से कोई अंदरूनी बीमारी हो या उसे संतुलित आहार न मिला हो, तो परीक्षण के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए चिप्स और अन्य माध्यमों के बावजूद कुछ क्षेत्रों में जानवरों की आवश्यकता बनी रहेगी।
सफलतापूर्वक बदले गए पुराने परीक्षण और वैश्विक प्रतिबंध
कॉस्मेटिक और त्वचा परीक्षण के क्षेत्र में विज्ञान ने जानवरों के विकल्प खोजने में महत्वपूर्ण सफलता पाई है। प्रयोगशाला में मानव त्वचा का विकल्प विकसित किया जा चुका है, जिसे रिकॉन्स्टिट्यूटेड ह्यूमन एपिथलियम कहा जाता है। इसके जरिए त्वचा की जलन और संवेदनशीलता की जांच बिना किसी जानवर को नुकसान पहुंचाए की जा सकती है। यूरोपीय बाजारों में जब कोई प्रसाधन सामग्री भेजी जाती है, तो यह प्रमाणित करना अनिवार्य होता है कि उसका पशुओं पर परीक्षण नहीं हुआ है।
अतीत में खरगोशों की आंखों में दवाइयां डालकर टॉक्सिसिटी की जांच की जाती थी, जिसे ड्रेज़ टेस्ट कहा जाता था। यह बेहद अमानवीय और दर्दनाक परीक्षण था। आज यह प्रक्रिया पूरी तरह से प्रतिबंधित की जा चुकी है। भारत सहित दुनिया के किसी भी देश में अब खरगोशों पर ड्रेज़ टेस्ट करने की कानूनी अनुमति नहीं है।
प्रस्तावित मसौदा नियमों की समीक्षा और वैज्ञानिकों की चिंताएं
केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए नए नियमों के मसौदे में जनता, शिक्षकों, वैज्ञानिकों और मीडिया से 5 नवंबर तक सुझाव मांगे जाने के कदम को डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने एक सकारात्मक पहल बताया। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था एशियन फेडरेशन से भी संबद्ध है, जिसका मुख्यालय जापान में स्थित है और वे लगातार वैकल्पिक परीक्षण विधियों पर कार्यशालाएं आयोजित करते हैं।
हालांकि, नए मसौदे के कुछ प्रावधानों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में गंभीर आपत्तियां हैं। मसौदे में एक ऐसा बिंदु है जिससे यह संकेत मिलता है कि वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए जंगलों या खुले परिवेश से भी जानवरों को पकड़ा जा सकता है। डॉक्टर रईसुद्दीन ने स्पष्ट किया कि किसी भी शोध परिणाम की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता होना अनिवार्य है। यदि भारत में कुत्तों या अन्य गैर-मानक जीवों पर परीक्षण कर उत्पाद बनाए जाते हैं, तो विदेशी नियामक एजेंसियां उन दवाओं या उत्पादों के आयात पर रोक लगा सकती हैं।
वन्यजीवों के दोहन का खतरा और डेटा की विश्वसनीयता
जंगलों से वन्यजीवों को पकड़कर अनुसंधान के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति किसी भी हाल में नहीं दी जानी चाहिए। भारत में व्यावसायिक हितों के चलते जंगलों से जानवरों को पकड़कर बेचने की अवांछित प्रवृत्ति शुरू हो सकती है, जिससे पहले से संकटग्रस्त और लुप्तप्राय प्रजातियों के अस्तित्व पर सीधा खतरा मंडराने लगेगा।
वैज्ञानिक शोध की दो बुनियादी आवश्यकताएं होती हैं, परिणामों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और डेटा की सत्यापन क्षमता अर्थात ट्रेसेबिलिटी। यदि परीक्षण मानकों के अनुरूप नहीं होंगे, तो उस डेटा को दुनिया भर में अमान्य कर दिया जाएगा। इसलिए नियमों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस स्तर का डेटा जनरेट हुआ और उसकी पारदर्शिता क्या है।
संस्थागत समितियों की भूमिका और निगरानी प्रणाली
मसौदा नियमों में हल्के और मध्यम स्तर के प्रयोगों की मंजूरी देने का अधिकार संस्थागत पशु आचार समितियों को सौंपने की बात कही गई है। इस पर अपने विचार रखते हुए डॉक्टर रईसुद्दीन ने कहा कि यदि संस्थागत समितियां पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से काम करें तो यह व्यवस्था व्यावहारिक है। हालांकि, कई बार शैक्षणिक संस्थानों में भावनात्मक दबाव देखा जाता है, जैसे किसी शोधार्थी की पीएचडी की समयसीमा खत्म होने पर नियमों में ढिलाई देकर जल्दबाजी में मंजूरी ले ली जाती है।
इस प्रकार के पक्षपात से बचने के लिए संस्थागत समितियों में बाहरी स्वतंत्र सदस्यों की मौजूदगी बेहद जरूरी है। बाहरी सदस्यों की निगरानी से पारदर्शिता बनी रहती है। नियमित रूप से हर दो से तीन महीने में बैठकें आयोजित की जाएं तो शोध कार्य में समय की बर्बादी भी नहीं होती और नैतिक मानकों का उल्लंघन भी नहीं होता।
सुधार के मुख्य सुझाव और भारतीय दृष्टिकोण
मसौदे को अधिक प्रभावी बनाने के लिए डॉक्टर शेख रईसुद्दीन ने कुछ स्पष्ट सुझाव दिए हैं। सबसे पहले, वन्यजीवों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। दूसरा, पशुओं के उपयोग और अनुसंधान से प्राप्त डेटा की सख्त ट्रेसेबिलिटी तय होनी चाहिए। तीसरा, जिन प्रयोगशालाओं में जानवरों को रखा जाता है और उनकी ब्रीडिंग की जाती है, वहां स्वच्छता, उचित वेंटिलेशन और उच्च स्तरीय पर्यावरणीय मानक सुनिश्चित किए जाने चाहिए ताकि प्राप्त डेटा पूरी तरह विश्वसनीय हो।
भारत को अनुसंधान के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को ही आधार बनाना होगा, जैसा कि देश ने सूचना प्रौद्योगिकी और दवा निर्माण के क्षेत्रों में करके दिखाया है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में हर जीव के प्रति करुणा और आदर का भाव रहा है। प्रकृति, जीव-जंतु और मानव जीवन एक-दूसरे के पूरक हैं। वर्तमान में पशु परीक्षण को रातों-रात पूरी तरह समाप्त करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है, लेकिन भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात AI और आधुनिक तकनीकें इसे काफी हद तक सीमित कर सकती हैं। इसलिए सरकार के मौजूदा मसौदा नियमों को रद्द करने के बजाय उनमें वैज्ञानिक और नैतिक सुधार किए जाने चाहिए।


















