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पूर्वी पाकिस्तान से आए लोग शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित हैं, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर बोले माणिक साहात्रिपुरा
15 अग॰ 2026, 4:07 pm (27 दिन पहले)· 3

पूर्वी पाकिस्तान से आए लोग शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित हैं, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर बोले माणिक साहा

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने अगरतला में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर कहा कि 1947 के विभाजन के समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए नागरिकों को शरणार्थी कहने के बजाय विस्थापित माना जाना चाहिए।

सन 1947 के भारत विभाजन के दौरान अपने घर-बार और संपत्ति छोड़कर आने वाले लोगों की पहचान को लेकर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। अगरतला में शुक्रवार को आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से त्रिपुरा आए लोगों को शरणार्थी कहना अनुचित है, क्योंकि उन्हें विषम परिस्थितियों के कारण मजबूरी में अपनी पैतृक ज़मीन और घर छोड़ना पड़ा था। ऐसे नागरिकों को शरणार्थी के बजाय आधिकारिक तौर पर विस्थापित व्यक्ति का दर्जा दिया जाना चाहिए।

त्रिपुरा के जनसांख्यिकीय ढांचे पर विभाजन का प्रभाव

अगरतला के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री माणिक साहा ने रेखांकित किया कि 1947 में देश का बंटवारा जनभावनाओं के विपरीत हुआ था। विभाजन से पहले वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश अविभाजित भारत का ही अटूट हिस्सा थे। बंटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान (जो अब बांग्लादेश है) की सीमा से सटे होने के कारण त्रिपुरा पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ा। वहां से बड़े पैमाने पर बंगाली हिंदुओं का पलायन हुआ, जिसने राज्य की सामाजिक संरचना और जनसांख्यिकी को हमेशा के लिए बदल दिया।

ऐतिहासिक संबंध और विस्थापन का अनूठा अनुभव

माणिक साहा ने त्रिपुरा और पड़ोसी क्षेत्रों के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक संबंधों का जिक्र किया। उन्होंने कुमिला, चकले रोशनबाद और चटगांव हिल ट्रैक्ट्स जैसे इलाकों का उल्लेख करते हुए बताया कि ये क्षेत्र त्रिपुरा की ऐतिहासिक विरासत से गहराई से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि देश का विभाजन न हुआ होता तो पूर्वी पाकिस्तान में संकट झेल रहे बंगाली हिंदुओं को कभी अपना घर छोड़कर त्रिपुरा नहीं आना पड़ता। X पर लिखा कि विभाजन का यह दर्दनाक अध्याय हमारे इतिहास का एक गहरा घाव है, जिसने लाखों लोगों को बेघर कर असीम पीड़ा सहने पर मजबूर किया। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि त्रिपुरा में विस्थापन का अनुभव अन्य राज्यों, जैसे असम, की तुलना में अलग और अनूठा रहा है।

राष्ट्रवाद की भावना और युवा पीढ़ी को जागरूक करने का आह्वान

मुख्यमंत्री ने देश की नई पीढ़ी को विभाजन के दीर्घकालिक सामाजिक और राजनीतिक परिणामों से अवगत कराने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अखंडता और देशभक्ति के प्रति भाजपा की प्रतिबद्धता अटूट है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाए जा रहे हफ्ते भर के हर घर तिरंगा अभियान का उद्देश्य नागरिकों के भीतर राष्ट्रवाद की भावना को और मजबूत करना है। पारंपरिक रूप से 15 अगस्त का उत्सव स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने तक सीमित रहता था, लेकिन इस व्यापक अभियान के जरिए देश प्रेम के संदेश को हर घर तक पहुंचाया जा रहा है।

विपक्षी दलों की राजनीति पर कड़ा हमला

अपने संबोधन के अंतिम चरण में मुख्यमंत्री माणिक साहा ने विपक्षी दल माकपा पर राजनीतिक लाभ के लिए अशांति फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार के हालिया बयान की तीखी आलोचना की, जिसमें उन्होंने जनसमस्याएं न सुलझने पर उग्रवादी मानसिकता के साथ आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी थी। साहा ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता को भड़काने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सरकार राज्य में शांति और विकास के माहौल को बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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सवाल-जवाब

मुख्यमंत्री माणिक साहा ने विभाजन के पीड़ितों के बारे में क्या कहा?
माणिक साहा ने कहा कि 1947 के विभाजन के दौरान तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए लोगों को शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित व्यक्ति माना जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें मजबूरी में अपनी जायदाद छोड़नी पड़ी थी।
यह बयान किस अवसर पर दिया गया था?
यह बयान अगरतला में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर शुक्रवार को दिया गया था।
मुख्यमंत्री ने किन ऐतिहासिक इलाकों का जिक्र किया?
साहा ने कुमिला, चकले रोशनबाद और चटगांव हिल ट्रैक्ट्स का जिक्र करते हुए त्रिपुरा के साथ उनके ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित किया।
माणिक साहा ने किस विपक्षी नेता के बयान की आलोचना की?
उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार के उस बयान की आलोचना की जिसमें उन्होंने उग्रवादी मानसिकता के साथ आंदोलन करने की बात कही थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Vikram Yadav@vikram-yadav·27 दिन पहले

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का यह बयान पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीति में शरणार्थी बनाम विस्थापित की बहस को एक नई वैचारिक दिशा देता है। विभाजन की वजह से त्रिपुरा की जनसांख्यिकी और सामाजिक ताने-बाने में जो बदलाव आए, वे क्षेत्रीय चुनावों और राजनीतिक दलों की रणनीति को लंबे समय से प्रभावित करते रहे हैं। इस शब्दावली के बदलाव से प्रशासनिक और पुनर्वास नीतियों पर क्या असर पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·27 दिन पहले

विक्रम के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, मुख्यमंत्री माणिक साहा का यह बयान न केवल राजनीतिक और वैचारिक बहस को हवा देता है, बल्कि इस क्षेत्र पर आधारित भविष्य की ऐतिहासिक फिल्मों, वृत्तचित्रों और ओटीटी कंटेंट के लिए भी एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। विभाजन की विभीषिका और विस्थापितों के इस दर्दनाक अनूठे अनुभव को परदे पर लाने से दर्शकों को क्षेत्रीय इतिहास की उन जटिलताओं को समझने में मदद मिलेगी, जो अब तक मुख्यधारा के सिनेमा में अनछुए रहे हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·27 दिन पहले

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा का यह बयान केवल एक भाषाई या ऐतिहासिक वर्गीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक-आर्थिक और प्रशासनिक निहितार्थ हैं। शरणार्थी और विस्थापित के दर्जे में कानूनी व नीतिगत अंतर होने से पुनर्वास नीतियों, भूमि अधिकारों और वित्तीय सहायता के आवंटन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों के जटिल जनसांख्यिकीय संतुलन और वित्तीय संसाधनों पर इसका असर आने वाले समय में नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती बन सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·27 दिन पहले

मुख्यमंत्री माणिक साहा का यह बयान पूर्वोत्तर की भू-राजनीति और नागरिकता से जुड़े संवेदनशील कानूनी पहलुओं को नए सिरे से परिभाषित करता है। यदि केंद्र सरकार इस विस्थापित श्रेणी को प्रशासनिक मान्यता देती है, तो इससे भविष्य की कल्याणकारी योजनाओं, सीमावर्ती राज्यों के बजटीय आवंटन और स्थानीय भूमि बंदोबस्त नीतियों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, इससे क्षेत्रीय राजनीति में एक नई बहस छिड़ सकती है जिसका असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ना तय है।

Rohan Verma@rohan-verma·27 दिन पहले

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का यह बयान विभाजनकालीन शरणार्थी और विस्थापित की परिभाषा को कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर एक नई बहस देता है। पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं और जनसांख्यिकी पर इसके दूरगामी राजनीतिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं, जो आने वाले समय में राष्ट्रीय नीति निर्धारण को प्रभावित करेंगे।

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