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राजस्थान के नोहर में सिर्फ दो पार्षदों वाली भाजपा ने बनाई पालिका, बिसाऊ में एक वोट से जीती कांग्रेसराजस्थान
21 सित॰ 2026, 1:09 pm (4 दिन पहले)· 0

राजस्थान के नोहर में सिर्फ दो पार्षदों वाली भाजपा ने बनाई पालिका, बिसाऊ में एक वोट से जीती कांग्रेस

राजस्थान के निकाय चुनाव में नोहर में लॉटरी से भाजपा ने कांग्रेस को मात देकर पालिकाध्यक्ष पद जीता, जबकि बिसाऊ में कांग्रेस की सलमा बानो ने एक वोट से विजय पाई।

राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में अप्रत्याशित सियासी घटनाक्रम देखने को मिला है, जहाँ दो अलग-अलग निकायों में मुकाबला बेहद रोमांचक मोड़ पर जाकर खत्म हुआ। झुंझुनूं जिले के बिसाऊ में कांग्रेस उम्मीदवार ने एक वोट के बेहद करीबी अंतर से बाजी मारी। वहीं दूसरी ओर, हनुमानगढ़ जिले की नोहर नगरपालिका में महज दो पार्षदों के दम पर चुनाव में उतरी भारतीय जनता पार्टी ने पूरा समीकरण पलटते हुए पालिकाध्यक्ष की कुर्सी अपने नाम कर ली।

बिसाऊ में एक वोट के अंतर से कांग्रेस की जीत

झुंझुनूं जिले की बिसाऊ नगरपालिका में चेयरमैन पद के चुनाव में कांग्रेस की सलमा बानो और भाजपा की सोनम देवी आमने-सामने थीं। मतदान से पहले के संख्या बल पर नजर डालें तो भाजपा खेमे में 13 पार्षद बताए जा रहे थे, जबकि कांग्रेस के पास 12 पार्षदों का समर्थन दिखाई दे रहा था। इस तरह मुकाबला कागजों पर भाजपा के पक्ष में झुका हुआ माना जा रहा था।

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मतगणना पूरी होने पर नतीजों ने सभी को चौंका दिया। क्रॉस वोटिंग या पाला बदलने के चलते कांग्रेस की सलमा बानो ने सोनम देवी को ठीक एक मत से शिकस्त दे दी। एक वोट के इस बेहद मामूली अंतर से मिली जीत ने बिसाऊ में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जश्न मनाने का मौका दिया, जबकि भाजपा को अपनी मजबूत स्थिति के बावजूद अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा।

नोहर में 40 वार्डों की नगरपालिका का रोचक गणित

हनुमानगढ़ जिले के नोहर में स्थानीय निकाय की जंग इससे भी कहीं अधिक नाटकीय साबित हुई। नोहर नगरपालिका कुल 40 वार्डों में बंटी हुई है। आम चुनाव के परिणाम सामने आए तो कांग्रेस ने अकेले दम पर 20 वार्डों में जीत हासिल की थी, जो बहुमत के आंकड़े से सिर्फ एक कदम दूर थी। वहीं भाजपा के खाते में मात्र 2 सीटें आई थीं। शेष 18 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।

इस पूरे मुकाबले में 18 निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे अहम बन गई थी। कांग्रेस को अपना बोर्ड बनाने के लिए सिर्फ एक और वोट की दरकार थी, जबकि भाजपा को 18 में से सभी निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने की कड़ी चुनौती थी।

टाई होने के बाद लॉटरी से हुआ पालिकाध्यक्ष का फैसला

पालिकाध्यक्ष पद के लिए भाजपा की ओर से हाजन खातून टाक चुनावी मैदान में थीं, जबकि कांग्रेस ने सुमित चाचाण को अपना प्रत्याशी बनाया था। सुमित चाचाण नोहर के स्थानीय कांग्रेस विधायक अमित चाचाण के भाई हैं, जिससे यह प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई थी। मतदान के बाद जब मतों की गिनती हुई, तो दोनों ही प्रत्याशियों को 20-20 वोट मिले।

वोटों के इस गणित से साफ हो गया कि 2 पार्षदों वाली भाजपा सभी 18 निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल करने में कामयाब रही और उसका आंकड़ा 20 तक पहुंच गया। इसके विपरीत, 20 पार्षदों वाली कांग्रेस एक भी निर्दलीय पार्षद को अपने साथ नहीं जोड़ पाई और अपने मूल 20 वोटों पर ही सिमट गई।

दोनों पक्षों को बराबर मत मिलने की स्थिति में नियमों के अनुसार परिणाम तय करने के लिए लॉटरी निकाली गई। लॉटरी की इस प्रक्रिया में भाग्य ने भाजपा का साथ दिया और हाजन खातून टाक की पर्ची निकली। इस तरह भाजपा प्रत्याशी को पालिकाध्यक्ष घोषित किया गया और कांग्रेस को हाथ में आई बाजी गंवानी पड़ी।

सवाल-जवाब

नोहर नगरपालिका में पालिकाध्यक्ष का चुनाव किसने जीता?
नोहर में भाजपा उम्मीदवार हाजन खातून टाक ने लॉटरी के जरिए पालिकाध्यक्ष पद का चुनाव जीता।
नोहर में कुल कितने वार्ड हैं और शुरुआती नतीजे क्या रहे थे?
नोहर में कुल 40 वार्ड हैं, जिनमें कांग्रेस को 20, भाजपा को 2 और निर्दलीयों को 18 सीटें मिली थीं।
नोहर में फैसला लॉटरी से क्यों करना पड़ा?
भाजपा की हाजन खातून टाक और कांग्रेस के सुमित चाचाण दोनों को बराबर 20-20 वोट मिले थे, इसलिए टाई होने पर लॉटरी निकाली गई।
बिसाऊ नगरपालिका में चेयरमैन पद पर किसकी जीत हुई?
झुंझुनूं के बिसाऊ में कांग्रेस की सलमा बानो ने भाजपा की सोनम देवी को एक वोट से हराकर जीत दर्ज की।
बिसाऊ में मतदान से पहले दोनों दलों के पास कितने पार्षद बताए जा रहे थे?
मतदान से पहले भाजपा खेमे में 13 और कांग्रेस खेमे में 12 पार्षद बताए जा रहे थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·3 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय चुनावों में संख्या बल और प्रबंधन के बीच का अंतर साफ दिखा है। बिसाऊ में क्रॉस वोटिंग से मजबूत स्थिति में बैठी पार्टी की हार और नोहर में दो सीटों वाली पार्टी द्वारा सभी निर्दलीयों को अपने पाले में लाकर मुकाबला टाई करना और फिर लॉटरी जीतना दिखाता है कि जमीनी कूटनीति और जोड़तोड़ चुनावी गणित से ज्यादा भारी पड़ सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे पारंपरिक दलीय समीकरणों से परे जाकर राजनीतिक प्रबंधन और हॉर्स ट्रेडिंग की बदलती जमीनी हकीकत को उजागर करते हैं। नोहर में महज दो पार्षदों वाली भाजपा द्वारा सभी अठारह निर्दलीय पार्षदों को एकजुट कर लेना और लॉटरी के जरिए जीत दर्ज करना तथा बिसाऊ में कांग्रेस का क्रॉस वोटिंग के दम पर एक वोट से बाजी पलटना यह साबित करता है कि स्थानीय निकायों में चुनावी अंकगणित से ज्यादा आखिरी समय की रणनीतिक जोड़-तोड़ और व्यक्तिगत प्रभाव निर्णायक साबित होते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

यह राजनीतिक घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जमीनी स्तर के चुनावों में अब दलीय निष्ठा से अधिक व्यक्तिगत समीकरण और प्रबंधन भारी पड़ने लगे हैं। नोहर में 20 सीटों के बावजूद कांग्रेस का एक भी निर्दलीय को न साध पाना और बिसाऊ में स्पष्ट बढ़त के बावजूद भाजपा का क्रॉस-वोटिंग से हारना यह बताता है कि स्थानीय निकायों में सत्ता की चाबी अब कड़े रणनीतिक समन्वय और अंतिम समय के सामंजस्य के पास है। आने वाले समय में मुख्य राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक असंतोष और स्थानीय नेतृत्व की कमजोरी पर गंभीरता से विचार करना होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

राजस्थान के इन निकाय चुनावों के नतीजे स्थानीय राजनीति और जमीनी स्तर पर रणनीतिक प्रबंधन की अनूठी बानगी पेश करते हैं। बिसाऊ में क्रॉस वोटिंग और नोहर में निर्दलीय पार्षदों का पूरी तरह एक खेमे में एकजुट होना यह साबित करता है कि स्थानीय चुनावों में दलीय निष्ठा से ज्यादा व्यक्तिगत समीकरण और प्रबंधन मायने रखते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राजनीतिक राज्यों के स्थानीय चुनावों के लिए भी यह परिणाम एक बड़ा सबक है कि आखिरी वक्त तक कोई भी मुकाबला एकतरफा नहीं होता।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह घटनाक्रम स्थानीय चुनाव प्रबंधन और राजनीतिक अनुशासन की विफलता का एक स्पष्ट उदाहरण है। जहाँ नोहर में कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत के करीब (20 सीटें) होने के बावजूद एक भी निर्दलीय को न जोड़ पाना और बिसाऊ में क्रॉस वोटिंग के कारण हार का सामना करना, यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर भीतरघात और प्रबंधन की चूक किसी भी मजबूत दल को पटखनी दे सकती है। इस तरह के अप्रत्याशित नतीजे यह चेतावनी भी देते हैं कि निर्वाचन प्रक्रिया में गुप्त मतदान के दौरान दलीय व्हिप और आंतरिक समन्वय कितने कमजोर साबित हो सकते हैं, जिससे भविष्य के चुनावों में पार्टियों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा।

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