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राजस्थान की रेगिस्तानी मोठ अब वैश्विक स्तर पर शुष्क इलाकों में खाद्य सुरक्षा मजबूत करेगी, 70 से अधिक जीनोटाइप परीक्षण के लिए विदेश रवानाराजस्थान
20 सित॰ 2026, 7:06 pm (5 दिन पहले)· 1

राजस्थान की रेगिस्तानी मोठ अब वैश्विक स्तर पर शुष्क इलाकों में खाद्य सुरक्षा मजबूत करेगी, 70 से अधिक जीनोटाइप परीक्षण के लिए विदेश रवाना

स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान के लिए मोठ के 70 से अधिक जीनोटाइप विदेश भेजे हैं। यह कदम कम बारिश और सूखे से जूझते इलाकों में बेहतर उत्पादन क्षमता परखने के साथ स्थानीय भुजिया उद्योग को भी नई मजबूती देगा।

रेगिस्तानी परिस्थितियों में किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा मानी जाने वाली मोठ की फसल अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की तैयारी कर रही है। पश्चिमी राजस्थान के सूखे इलाकों की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले इस दलहन के आनुवंशिक गुणों को वैश्विक स्तर पर परखने की एक बड़ी वैज्ञानिक पहल शुरू हुई है। इसी कड़ी में बीकानेर स्थित स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने मोठ के 70 से अधिक जीनोटाइप अनुसंधान और व्यापक क्षेत्रीय परीक्षण के लिए विदेश भेजे हैं। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, कम वर्षा और सीमित सिंचाई वाले विदेशी इलाकों में मोठ की अनुकूलता और उत्पादन क्षमता का विस्तृत वैज्ञानिक आकलन करना है। यदि इन परीक्षणों से सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तो भविष्य में राजस्थान के थार रेगिस्तान की यह पारंपरिक दलहनी फसल दुनिया के कई अन्य शुष्क देशों में भी खेतों की रौनक बढ़ा सकेगी।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जलवायु अनुकूलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन

विश्वविद्यालय के अनुसंधान अधिकारी डॉ. एन.के. शर्मा के अनुसार, यह महत्वपूर्ण शोध कार्य यूनाइटेड किंगडम के किर्कहाउस ट्रस्ट और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के साझा सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम के तहत विश्वविद्यालय में संरक्षित मोठ की अलग-अलग आनुवंशिक सामग्रियों को विदेशी अनुसंधान केंद्रों तक पहुंचाया गया है। इन विभिन्न जीनोटाइप का वैज्ञानिक परीक्षण यह स्पष्ट करेगा कि कौन सी आनुवंशिक सामग्री अत्यंत शुष्क मौसम, पानी की भारी कमी और तेजी से बदलते तापमान के बीच भी टिकाऊ और बेहतर उत्पादन देने में सक्षम है। जलवायु परिवर्तन के मौजूदा दौर में कम पानी में पकने वाली ऐसी फसलों की मांग दुनिया भर के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही है।

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रेगिस्तानी किसानों के लिए जीवनरेखा समान है यह दलहन

राजस्थान के अत्यधिक शुष्क और रेतीले भूभाग में मोठ केवल एक सामान्य फसल नहीं, बल्कि खेती की जीवनरेखा मानी जाती है। मानसूनी बारिश कमजोर रहने या पूरी तरह विफल होने की स्थिति में जब अन्य फसलों के उत्पादन की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, तब किसान मोठ को सबसे मजबूत और भरोसेमंद विकल्प मानकर बुआई करते हैं। न्यूनतम नमी में तैयार होने वाला यह दलहन भीषण गर्मी और प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों को आसानी से सहन कर लेता है। पूरे राजस्थान में वर्तमान में लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोठ की खेती की जाती है, जो राज्य के कृषि परिदृश्य में इसके व्यापक महत्व को प्रमाणित करती है।

बीज सुरक्षा, कीट रोकथाम और तकनीक का प्रसार

विश्वविद्यालय केवल किस्मों के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि फसल प्रबंधन, पौध संरक्षण के आधुनिक तौर-तरीकों, कीट नियंत्रण और बीमारियों की समय पर रोकथाम पर भी व्यापक अनुसंधान कर रहा है। किसानों को गुणवत्तापूर्ण उपज दिलाने के लिए प्रमाणित बीज और बीज उत्पादक सरकारी व निजी संस्थाओं को प्रजनक बीज उपलब्ध कराने पर भी योजनाबद्ध तरीके से काम चल रहा है। कृषि विश्वविद्यालय का अंतिम लक्ष्य प्रयोगशालाओं में तैयार आधुनिक तकनीकों और उन्नत बीजों को सीधे खेतों तक पहुंचाना है, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आय में ठोस सुधार किया जा सके।

विश्व प्रसिद्ध बीकानेरी भुजिया उद्योग की बुनियाद है मोठ

बीकानेर के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में मोठ का महत्व सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर का विश्वविख्यात नमकीन उद्योग भी पूरी तरह इसी पर टिका हुआ है। बीकानेरी भुजिया तैयार करने में लगभग 80 प्रतिशत मोठ के आटे का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है। स्थानीय स्तर पर मोठ की पैदावार में आने वाली किसी भी तरह की गिरावट का सीधा असर भुजिया के कुल उत्पादन, बाजार भाव और नमकीन निर्माण से जुड़ी दर्जनों इकाइयों पर पड़ता है। बीकानेरी भुजिया आज भारत ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार कई देशों में अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज करा चुकी है। ऐसे में मोठ की नियमित और बंपर पैदावार सुनिश्चित करना किसानों की आर्थिक मजबूती, स्थानीय उद्योग की स्थिरता और निर्यात के जरिए विदेशी मुद्रा कमाने के लिहाज से बेहद जरूरी है। उत्पादन बेहतर रहने पर स्थानीय भुजिया उद्योग को साल भर गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल वाजिब दामों पर मिलता रहेगा।

आरएम-2251 और 70 दिन में पकने वाली उन्नत किस्मों का विकास

कृषि विश्वविद्यालय में संचालित समर्पित मोठ परियोजना के तहत वैज्ञानिकों ने अब तक आठ से दस उच्च उपज वाली उन्नत किस्में विकसित करने में सफलता पाई है। इनमें आरएम-225, आरएम-257 और आरएम-435 जैसी प्रमुख किस्में शामिल हैं, जो पहले से किसानों के बीच काफी लोकप्रिय रही हैं। हाल ही में विकसित की गई आरएम-2251 किस्म को बीकानेर और राजस्थान के अन्य कम बारिश वाले जिलों के लिए बेहद उपयोगी और अधिक उत्पादन देने वाली किस्म माना गया है। इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने म्यूटेशन ब्रीडिंग तकनीक का इस्तेमाल करके एक ऐसी विशेष किस्म तैयार की है जो 70 दिन से भी कम समय में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। बहुत कम अवधि में तैयार होने वाली यह किस्म उन इलाकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जहां मानसूनी बारिश का दौर बेहद छोटा होता है। इससे बीच में ही बारिश रुक जाने की स्थिति में फसल सूखने या खराब होने का जोखिम काफी हद तक खत्म हो जाता है।

सवाल-जवाब

बीकानेर से मोठ के कितने जीनोटाइप विदेश भेजे गए हैं?
स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण के लिए 70 से अधिक जीनोटाइप विदेश भेजे हैं।
इस अनुसंधान में कौन से संस्थान सहयोग कर रहे हैं?
यह शोध यूनाइटेड किंगडम के किर्कहाउस ट्रस्ट और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहयोग से संचालित किया जा रहा है।
राजस्थान में कितने क्षेत्रफल पर मोठ की खेती होती है?
राजस्थान में वर्तमान में लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोठ की खेती की जाती है।
बीकानेरी भुजिया उद्योग में मोठ का कितना उपयोग होता है?
बीकानेरी भुजिया तैयार करने में लगभग 80 प्रतिशत मोठ का उपयोग कच्चे माल के तौर पर किया जाता है।
आरएम-2251 किस्म की क्या खासियत है?
आरएम-2251 किस्म को बीकानेर और राजस्थान के अन्य शुष्क इलाकों के लिए अत्यधिक उपयोगी और अधिक उपज देने वाली किस्म माना गया है।
म्यूटेशन ब्रीडिंग से तैयार किस्म कितने दिनों में पकती है?
म्यूटेशन तकनीक से विकसित विशेष किस्म 70 दिन से भी कम समय में पककर तैयार हो जाती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·4 दिन पहले

वैश्विक नीति और आर्थिक दृष्टिकोण से, यह अंतर्राष्ट्रीय कृषि सहयोग जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खाद्य असुरक्षा से निपटने की दिशा में एक बड़ा कदम है। दुनिया भर के शुष्क क्षेत्र, जिनमें अमेरिका के भी कुछ हिस्से शामिल हैं, गंभीर सूखे का सामना कर रहे हैं। ऐसे में राजस्थान के मोठ जैसे जलवायु-अनुकूल अनाज का परीक्षण वैश्विक खाद्य व्यापार और कृषि नीतियों को नया आकार दे सकता है। आर्थिक स्थिरता और टिकाऊ आपूर्ति श्रृंखला बनाने के लिए ऐसी वैश्विक साझेदारियां आज के समय की बड़ी जरूरत हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

यह पहल केवल एक कृषि अनुसंधान नहीं, बल्कि 'विज्ञान कूटनीति' (Science Diplomacy) और वैश्विक खाद्य सुरक्षा नीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। भारत और ब्रिटेन का यह साझा प्रयास दर्शाता है कि कैसे स्थानीय कृषि-ज्ञान को वैश्विक जलवायु अनुकूलन नीतियों से जोड़ा जा सकता है। थार की इस पारंपरिक फसल का अंतरराष्ट्रीय परीक्षण भविष्य में उन शुष्क देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा जो भुखमरी और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं। यह नीतिगत स्तर पर भारत को वैश्विक खाद्य सुरक्षा के एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित कर सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

अर्जुन के 'विज्ञान कूटनीति' वाले बिंदु को आगे बढ़ाते हुए, हमें इसके आर्थिक और व्यावसायिक प्रभाव को भी समझना होगा। मोठ केवल खाद्य सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि राजस्थान के प्रसिद्ध भुजिया उद्योग का मुख्य आधार है। इस अंतरराष्ट्रीय परीक्षण से न सिर्फ इस दलहन की वैश्विक मांग बढ़ेगी, बल्कि एग्रो-बिजनेस और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी मजबूत होगी। जलवायु अनुकूल कृषि आने वाले समय में एक बड़ा निवेश क्षेत्र बनने जा रही है। यह शोध मोठ को एक वैश्विक कृषि-कमोडिटी के रूप में स्थापित कर भारतीय कृषि-स्टार्टअप्स और निर्यातकों के लिए नए द्वार खोल सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोठ के 70 से अधिक जीनोटाइप भेजने की इस वैज्ञानिक पहल के साथ इसके कानूनी और सुरक्षात्मक पहलुओं पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। हमारी इस बहुमूल्य रेगिस्तानी कृषि विरासत को 'बायोपायरेसी' (जैव-चोरी) से बचाने के लिए सख्त कानूनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। स्थानीय किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता कानूनों के तहत उचित नियमन और सुरक्षात्मक नीतियां आवश्यक हैं, ताकि भविष्य में इस संपदा का कोई अवैध व्यावसायिक दोहन न कर सके।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

करन की बात बिल्कुल सही है। नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर, इस वैश्विक अनुसंधान के साथ 'एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग' (लाभों का साझाकरण) का एक स्पष्ट ढांचा तैयार होना चाहिए। हमारी पारंपरिक कृषि संपदा जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाती है, तो उसके व्यावसायिक उपयोग से होने वाला आर्थिक लाभ सीधे तौर पर थार के उन गरीब किसानों तक पहुंचना चाहिए जिन्होंने पीढ़ियों से इस बीज को सहेज कर रखा है। सरकार और विश्वविद्यालयों को केवल शोध समझौतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के नियमों को सख्ती से लागू कर एक मजबूत कानूनी कवच तैयार करना होगा, ताकि इस कृषि तकनीक का वास्तविक लाभ स्थानीय समुदायों को मिल सके।

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