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राजस्थान निकाय चुनावों में यूजीसी मुद्दे की गूंज, करणी सेना के आंदोलन से बीजेपी को हुआ नुकसानराजस्थान
16 सित॰ 2026, 10:27 pm (8 दिन पहले)· 0

राजस्थान निकाय चुनावों में यूजीसी मुद्दे की गूंज, करणी सेना के आंदोलन से बीजेपी को हुआ नुकसान

राजस्थान के निकाय चुनावों में श्री राजपूत करणी सेना के यूजीसी रोल बैक आंदोलन का असर देखने को मिला है, जिससे कई इलाकों में बीजेपी को झटका लगा है और निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में जीत दर्ज की है।

राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। श्री राजपूत करणी सेना और विभिन्न अगड़ी जातियों के संगठनों द्वारा चलाए गए यूजीसी रोल बैक आंदोलन का सीधा असर चुनाव परिणामों पर साफ तौर पर दिखाई दिया है। इस राजनीतिक उठापटक के बीच सत्ताधारी दल बीजेपी को कई प्रमुख क्षेत्रों में उम्मीद के विपरीत प्रदर्शन करना पड़ा है। राजपूत बहुल क्षेत्रों में पार्टी का वोट बैंक खिसक गया और इसका सीधा फायदा निर्दलीय उम्मीदवारों को मिला। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक दलों के अपने-अपने दावे और तर्क सामने आ रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ने सियासी समीकरणों को जरूर प्रभावित किया है।

बीकानेर से जयपुर तक आंदोलन का सफर

इस पूरे राजनीतिक बदलाव की शुरुआत कुछ महीने पहले हुई थी जब बीकानेर के देशनोक से जयपुर तक एक लंबी पदयात्रा निकाली गई थी। श्री राजपूत करणी सेना के मुखिया महिपाल सिंह मकराना की अगुवाई में यह 18 दिन की यात्रा निकाली गई थी। इसके बाद तीन अगस्त को जयपुर में श्री राजपूत करणी सेना के नेतृत्व में अगड़ी जातियों ने यूजीसी रोल बैक के मुद्दे पर एक बड़ा विरोध मार्च निकाला था। इस आंदोलन के दौरान करणी सेना की ओर से स्पष्ट ऐलान किया गया था कि राजपूतों समेत सभी अगड़ी जातियों के मतदाता आगामी निकाय चुनावों में बीजेपी के पक्ष में मतदान करने से बचें और इसके बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन करें।

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महिपाल सिंह मकराना का बड़ा दावा

चुनाव परिणाम सामने आने के बाद श्री राजपूत करणी सेना के मुखिया महिपाल सिंह मकराना ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि निकाय चुनाव में उनकी अपील और निर्दलीयों के समर्थन में चलाए गए प्रचार का व्यापक असर रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस आंदोलन की वजह से कुल 30 फीसदी निर्दलीय उम्मीदवार जीत हासिल करके आए हैं और पार्टी के कई दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बीजेपी बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गई। मकराना के अनुसार, जिन निर्दलीय उम्मीदवारों ने यूजीसी की मांग के समर्थन में शपथ पत्र भरा था, उन्होंने या तो चुनाव जीता या फिर मुख्य पार्टियों को कड़ी शिकस्त दी।

दिग्गज नेताओं के गढ़ में बीजेपी को झटका

करणी सेना के इस दावे की पड़ताल करने पर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत बीकानेर से हुई थी और संयोग से केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल के संसदीय क्षेत्र बीकानेर में ही बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। बीकानेर नगर निगम में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इसके अलावा सीकर में भी पार्टी को सफलता नहीं मिली। आंदोलन का मुख्य केंद्र रहे जयपुर जिले की बात करें तो यहां उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी का विधानसभा क्षेत्र विद्याधर नगर और उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का विधानसभा क्षेत्र झोटवाड़ा दोनों ही राजपूत बहुल माने जाते हैं। इन दोनों ही क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा।

विद्याधर नगर और झोटवाड़ा में गिरा वोट शेयर

आंकड़ों पर गौर करें तो विद्याधर नगर में बीजेपी के जीतने वाले वार्डों का प्रतिशत पिछले चुनाव के 64.3 फीसदी से लुढ़क कर सीधे 60 फीसदी पर आ गया। इस क्षेत्र में करीब बीस फीसदी वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। दूसरी तरफ झोटवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही जहां विजयी वार्डों का आंकड़ा पिछले चुनाव के 63 फीसदी से घटकर 53 फीसदी रह गया। झोटवाड़ा में 23 फीसदी निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए। हालांकि पार्टी को अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन इन दोनों सीटों पर इसका असर ज्यादा गहरा था। कांग्रेस का यह भी तर्क है कि जयपुर में यूजीसी के मुद्दे पर हुए पुलिस लाठीचार्ज का भारी राजनीतिक खामियाजा शासन कर रही पार्टी को भुगतना पड़ा है।

भरतपुर से जोधपुर तक बदला चुनावी समीकरण

नुकसान का यह दायरा केवल जयपुर, बीकानेर और सीकर तक सीमित नहीं रहा। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में नगर निगम चुनावों के दौरान निर्दलीय उम्मीदवारों ने सबसे अधिक सीटों पर कब्जा जमाया। यहां तक कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दल संख्या बल के मामले में निर्दलीयों से पीछे छूट गए। जोधपुर में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत न केवल अपनी पार्टी को नगर निगम में बहुमत नहीं दिला पाए, बल्कि वे अपना खुद का वार्ड और बूथ भी बचाने में नाकाम रहे। इसी तरह अजमेर में भी केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी नगर निगम चुनाव में कांग्रेस से पीछे रह गई।

निर्दलीयों के पक्ष में गया अगड़ी जातियों का वोट

इस पूरे चुनाव परिणाम में एक और खास बात यह देखने को मिली कि नाराज अगड़ी जातियों के मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी को चुनने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों पर अधिक भरोसा जताया। पूरे राज्य में कुल 2273 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीतने में सफल रहे हैं, जबकि बीजेपी के 4179 और कांग्रेस के 3613 पार्षद जीतकर आए हैं। यही कारण है कि जिन जगहों पर बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां अधिकांश सीटों पर कांग्रेस भी बहुमत से कोसों दूर रही। यदि राजस्थान के 2021 और 2026 के चुनावी नतीजों की आपस में तुलना की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सत्ता में होने का कोई विशेष लाभ पार्टी को इन निकाय चुनावों में नहीं मिल सका। हालांकि कांग्रेस का वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले जरूर कुछ कम हुआ, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवारों के हिस्से में करीब दो फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

सवाल-जवाब

राजस्थान निकाय चुनावों में किस संगठन के आंदोलन का असर देखने को मिला?
श्री राजपूत करणी सेना और अगड़ी जातियों के संगठनों द्वारा चलाए गए यूजीसी रोल बैक आंदोलन का असर चुनावों पर पड़ा।
यूजीसी आंदोलन की शुरुआत राजस्थान में कहाँ से हुई थी?
यह आंदोलन बीकानेर के देशनोक से शुरू होकर सीकर होते हुए जयपुर तक पहुंचा था।
निकाय चुनावों में कुल कितने निर्दलीय पार्षद जीते हैं?
राजस्थान में कुल 2273 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीतकर आए हैं।
करणी सेना के प्रमुख का क्या नाम है?
श्री राजपूत करणी सेना के मुखिया महिपाल सिंह मकराना हैं।
बीजेपी और कांग्रेस को कितने पार्षद मिले हैं?
चुनाव में बीजेपी के 4179 और कांग्रेस के 3613 पार्षद जीते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·8 दिन पहले

यह स्थानीय चुनाव परिणाम भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र में जमीनी और क्षेत्रीय आंदोलनों की जबरदस्त ताकत को दर्शाते हैं। जब नीतिगत असंतोष स्थानीय स्तर पर पहचान और जातियों की राजनीति से जुड़ता है, तो यह सत्तारूढ़ दलों के पारंपरिक वोट बैंक को कैसे हिला सकता है, इसका यह स्पष्ट उदाहरण है। यदि मुख्यधारा के दल इस प्रकार के नीतिगत विरोधों को समय रहते और प्रभावी ढंग से हल नहीं करते हैं, तो यह प्रवृत्ति आने वाले व्यापक चुनावों में सत्ता के समीकरणों को और अधिक जटिल बना सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

राजस्थान निकाय चुनावों में करणी सेना के यूजीसी विरोध और अगड़ी जातियों की नाराजगी ने सत्ताधारी दल के परंपरागत वोट बैंक में जो सेंध लगाई है, वह आने वाले विधानसभा उप-चुनावों और ग्रामीण निकाय चुनावों से पहले पार्टी नेतृत्त्व के लिए एक बड़ी चेतावनी है। यदि समय रहते इन असंतुष्ट सामाजिक समीकरणों को नहीं साधा गया, तो यह स्थानीय क्षोभ व्यापक राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक वैचारिक वोट बैंक अब नीतिगत फैसलों और स्थानीय नेतृत्व के प्रति असंतोष पर सीधा असर दिखा रहा है। यदि इन आर्थिक और सामाजिक मुद्दों का समाधान संवाद के जरिए नहीं निकाला गया, तो यह असंतोष व्यापक राजनीतिक बदलाव का कारण बन सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

राजस्थान निकाय चुनावों के यह नतीजे इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि वैचारिक या पारंपरिक वफादारियां अब क्षेत्रीय मुद्दों और सामाजिक आंदोलनों के आगे कमजोर पड़ रही हैं। यदि सत्ताधारी दल ने समय रहते इस असंतोष को नहीं संभाला, तो आने वाले बड़े चुनावों में यह नाराजगी शहरी और ग्रामीण दोनों मोर्चों पर पार्टी के समीकरण बिगाड़ सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

यह चुनावी परिणाम केवल राजनीतिक उलटफेर नहीं, बल्कि सामाजिक असंतोष के संगठित विरोध का एक गंभीर उदाहरण है। जब वैचारिक निष्ठाएं स्थानीय और जातिगत आंदोलनों के सामने दरकती हैं, तो यह प्रशासनिक और कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नई चुनौतियां खड़ी करता है। यदि जमीनी स्तर पर इस वर्ग संघर्ष का समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह असंतोष व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले सकता है, जिससे आगामी राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

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