खेती बाड़ी में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल हर गुजरते साल के साथ किसानों की जेब पर भारी बोझ बनता जा रहा है। बाजार से महंगी दवाइयां खरीदने और बार-बार छिड़काव करने के बाद भी फसलों पर रस चूसने वाले और पत्तियां चबाने वाले कीटों का हमला पूरी तरह समाप्त नहीं होता। इस बढ़ती लागत और कीटनाशकों के बेअसर होने की समस्या से निपटने के लिए रामपुर क्षेत्र के कई कृषक पारंपरिक जैविक तरीकों की ओर रुख कर रहे हैं। इनमें दशपर्णी अर्क एक अत्यंत प्रभावशाली और टिकाऊ जैविक विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है। यह पूरी तरह प्राकृतिक घोल 10 विभिन्न प्रकार की वनस्पति पत्तियों, देशी गाय के गोबर और गौमूत्र के संयोजन से तैयार किया जाता है। इसे किसान अपने खेत या घर पर ही बेहद मामूली लागत में तैयार कर सकते हैं, जिससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता तेजी से घटती है।
जैविक विकल्प के रूप में दशपर्णी अर्क की उपयोगिता
कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों के पुनरुत्पादन और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए यह देशी घोल बेहद कारगर माना जाता है। दशपर्णी अर्क का प्राथमिक उद्देश्य फसलों को हानिकारक कीटों के प्रकोप से सुरक्षित रखना है। रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग न केवल खेती का बजट बिगाड़ता है, बल्कि खेत की मिट्टी में मौजूद मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंचाता है। इसके विपरीत, दशपर्णी अर्क फसलों पर लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीटों जैसे इल्लियां, रस चूसक कीड़े और पत्तियां खाने वाले जीवों की रोकथाम में मदद करता है। इसके नियमित और संतुलित प्रयोग से फसलों की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है, जबकि लागत में बड़ी कटौती संभव हो पाती है।
दशपर्णी अर्क तैयार करने के लिए जरूरी सामग्री
इस जैविक कीटनाशक घोल को बनाने के लिए आवश्यक सामग्री आसानी से आसपास के वातावरण में उपलब्ध हो जाती है। सबसे पहले 200 लीटर क्षमता वाले एक बड़े प्लास्टिक ड्रम का प्रबंध करना होता है। इसमें 200 लीटर साफ पानी भरा जाता है। इसके बाद इसमें 10 लीटर गौमूत्र और 2 किलो देशी गाय का ताजा गोबर मिलाकर अच्छी तरह घोला जाता है।
मुख्य जैविक घटकों में 10 प्रकार की पत्तियों का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है। मिश्रण में 5 किलो नीम की पत्तियां डाली जाती हैं। इसके साथ 2-2 किलो की मात्रा में सीताफल, बेल, अमरूद, बेर, पपीता, कनेर, आम और देशी करेला की पत्तियां मिलाई जाती हैं। इस प्रकार कुल 10 तरह की पत्तियों का समावेश होता है। घोल को अधिक मारक और प्रभावी बनाने के लिए अंत में आधा से एक किलो तंबाकू और लगभग आधा किलो तीखी मिर्च, लहसुन व चटनी का बारीक पेस्ट मिलाया जाता है। इन सभी सामग्रियों को लकड़ी के डंडे की मदद से ड्रम में अच्छी तरह मिला दिया जाता है।
बनाने की पूरी विधि और रखरखाव की सावधानियां
दशपर्णी अर्क की गुणवत्ता इसके सड़न और फरमेंटेशन की प्रक्रिया तथा रखरखाव की सही विधि पर निर्भर करती है। जिस ड्रम में यह घोल तैयार किया जा रहा हो, उसे हमेशा किसी छायादार स्थान पर रखना चाहिए। ध्यान रहे कि ड्रम पर सीधी तेज धूप या बरसात का पानी बिल्कुल न पड़े, क्योंकि इससे जैविक क्रिया प्रभावित हो सकती है। अर्क तैयार होने के दौरान हर दिन या कम से कम एक दिन छोड़कर लकड़ी की छड़ी से पूरे घोल को अच्छी तरह हिलाना आवश्यक होता है ताकि सभी वनस्पतियों के पोषक तत्व पानी में समाहित हो सकें।
लगभग 40 दिनों की समयावधि में यह मिश्रण पूरी तरह सड़कर तैयार हो जाता है। 40 दिन पूरे होने के पश्चात तैयार घोल को एक साफ और बारीक सूती कपड़े की मदद से छान लिया जाता है। छाने गए तरल अर्क को किसी साफ ढक्कनदार बर्तन या ड्रम में भर दिया जाता है। छानने के बाद बचा हुआ जैविक अपशिष्ट खाद के रूप में खेतों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
विभिन्न फसलों में छिड़काव की सही मात्रा और समय
तैयार दशपर्णी अर्क का उपयोग अनाज, दलहन, तिलहन और सब्जी वर्गीय फसलों सहित लगभग सभी कृषि उत्पादों में किया जा सकता है। छिड़काव के लिए 200 लीटर पानी में 5 से 6 लीटर छाना हुआ दशपर्णी अर्क मिलाया जाता है। सामान्य स्थिति में एक एकड़ खेत के लिए 180 से 200 लीटर का यह तैयार घोल पर्याप्त होता है। हालांकि, यदि फसल बहुत अधिक घनी हो या फलदार बड़े पेड़ों में छिड़काव करना हो, तो पानी और घोल की कुल मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
इसका छिड़काव मुख्य रूप से धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, सरसों, सोयाबीन, मूंग, उड़द, चना और अरहर जैसी फसलों में सफलतापूर्वक किया जाता है। इसके अलावा मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिंडी, लौकी, खीरा और करेला जैसी सब्जियों, व्यावसायिक फूलों की खेती तथा आम व अमरूद जैसे फलदार वृक्षों पर भी यह समान रूप से प्रभावी है। छिड़काव के लिए सुबह 7 से 10 बजे या शाम 4 से 6 बजे का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। दोपहर की तेज धूप में छिड़काव करने से बचना चाहिए। यदि बारिश की संभावना हो तो स्प्रे टाल देना बेहतर रहता है। कीटों की रोकथाम या शुरुआती लक्षण दिखने पर हर 10 से 15 दिनों के अंतराल पर इसका नियमित छिड़काव किया जा सकता है।
भंडारण अवधि और कृषि विभाग की महत्वपूर्ण सलाह
सूती कपड़े से छना हुआ दशपर्णी अर्क सही तरीके से संग्रहित किए जाने पर लंबे समय तक इस्तेमाल योग्य बना रहता है। यदि इसे ढक्कन बंद प्लास्टिक ड्रम या कैन में ठंडी और छायादार जगह पर रखा जाए, तो यह 3 से 6 महीने तक खराब नहीं होता। भंडारण के दौरान बीच-बीच में बर्तन को हल्का हिलाते रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसमें बाहरी पानी का प्रवेश न हो।
रामपुर के उप कृषि निदेशक राम किशन सिंह के अनुसार, दशपर्णी अर्क की निर्माण लागत बाजार में मिलने वाले रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में बहुत ही कम होती है। इसके उपयोग से खेत की मिट्टी की जैविक सेहत और प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बनी रहती है, जबकि फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के प्राकृतिक शत्रु यानी मित्र कीट पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। इससे किसानों की रसायनों पर निर्भरता में कमी आती है। हालांकि, राम किशन सिंह यह सलाह भी देते हैं कि यदि खेत में कीटों का प्रकोप अत्यधिक भयावह रूप ले ले, तो कृषि विशेषज्ञों से संपर्क कर समेकित कीट प्रबंधन यानी IPM की तकनीक अपनाना अधिक श्रेयस्कर रहता है।



















