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सवाई माधोपुर में 14 सितंबर को सजेगा रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश का लक्खी मेला, उमड़ेगी भारी भीड़राजस्थान
10 सित॰ 2026, 3:12 pm (15 दिन पहले)· 3

सवाई माधोपुर में 14 सितंबर को सजेगा रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश का लक्खी मेला, उमड़ेगी भारी भीड़

सवाई माधोपुर के रणथंभौर दुर्ग में आगामी 14 सितंबर को त्रिनेत्र गणेश का प्रसिद्ध लक्खी मेला आयोजित किया जाएगा। इस दौरान देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना है, जिसे लेकर प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं।

सवाई माधोपुर जिले में आगामी 14 सितंबर को रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश का प्रसिद्ध लक्खी मेला आयोजित होने जा रहा है। इस धार्मिक आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। वैसे तो रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश मंदिर में सालभर भक्तों के आने-जाने का तांता लगा रहता है, लेकिन गणेश मेले के दौरान यहां लाखों की संख्या में भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इस विशाल आयोजन को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन ने भी मेले की पुख्ता तैयारियां शुरू कर दी हैं ताकि आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग और मंदिर की भौगोलिक स्थिति

रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश मंदिर अरावली की पर्वतमालाओं और रणथंभौर नेशनल पार्क की हरी-बारी वादियों के बीच ऐतिहासिक रणथंभौर किले के अंदर स्थित है। जिला मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर आमजन की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और सभी विघ्नों को हरने वाला यानी विघ्नहर्ता माना जाता है। यही मुख्य कारण है कि देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए लंबी दूर तय करके पहुंचते हैं। मेले के दिन नजदीक आते ही मंदिर परिसर और रणथंभौर दुर्ग की ओर जाने वाले रास्तों पर भक्तों की रेलमपेल शुरू हो गई है।

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मंदिर से जुड़े प्राचीन इतिहास और मान्यताएं

त्रिनेत्र गणेश मंदिर का इतिहास बेहद अनूठा और कई रहस्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस पवित्र मंदिर को लेकर कई प्राचीन मान्यताएं और किंवदंतियां समाज में प्रचलित हैं। कई भक्तों का ऐसा दृढ़ विश्वास है कि यहां भगवान गणेश की प्रतिमा किसी मानव द्वारा स्थापित नहीं की गई बल्कि वह स्वयं प्रकट हुई थी। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव द्वारा गणेश जी का शीश काट दिया गया था, तब उनका शीश इसी स्थान पर आकर गिरा था, जिसके बाद से इसी जगह पर गणेश जी के शीश की पूजा की जाने लगी। इसके अलावा मंदिर से जुड़ी एक अन्य कथा भगवान कृष्ण के विवाह से भी जुड़ी हुई बताई जाती है।

भगवान कृष्ण के विवाह और रिद्धि-सिद्धि से जुड़ी कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान गणेश अपने विवाह न होने के कारण नाराज हो गए थे और उन्होंने अपनी मूषक सेना के जरिए भगवान कृष्ण की बारात के रास्ते में भारी बाधाएं उत्पन्न कर दी थीं। इस समस्या के समाधान के रूप में भगवान कृष्ण ने रणथंभौर की इसी पावन भूमि पर भगवान गणेश का विवाह रिद्धि और सिद्धि के साथ संपन्न करवाया था। इसी प्राचीन मान्यता के प्रभाव के कारण यहां भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान माने जाते हैं। इस अनूठी विशेषता के कारण देश भर में इस मंदिर की एक अलग और विशेष पहचान है।

राजा हम्मीर और अलाउद्दीन खिलजी के समय का प्रसंग

रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश मंदिर के इतिहास के पन्नों में राजा हम्मीर से जुड़ा एक प्रसिद्ध आख्यान भी दर्ज है। इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1299 में रणथंभौर दुर्ग पर राजा हम्मीर का शासन हुआ करता था और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इस अभेद्य किले पर आक्रमण कर दिया था। युद्ध के बहुत अधिक लंबा खिंच जाने के कारण किले के अंदर खाने-पीने के सामान यानी खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी होने लगी थी। इसी संकट की घड़ी में, मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश ने राजा हम्मीर को सपने में दर्शन दिए और उन्हें जल्द ही संकट दूर होने का पूर्ण आश्वासन दिया।

चमत्कारिक भंडार और मंदिर की स्थापना

स्वप्न दर्शन के बाद जब सुबह हुई तो राजा के शाही भंडार चमत्कारिक रूप से अन्न और जरूरी सामग्री से भरे हुए पाए गए। ऐसा माना जाता है कि इसी विशिष्ट कालखंड के दौरान रणथंभौर की धरती से भगवान गणेश की प्रतिमा प्रकट हुई थी। इस चमत्कार के बाद ही यहां मंदिर की स्थापना की गई और नियमित रूप से पूजा-अर्चना का सिलसिला आरंभ हुआ। हालांकि कई ऐतिहासिक मान्यताओं के आधार पर इस मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी के आसपास माना जाता है, लेकिन राजा हम्मीर से जुड़ी यह कथा इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था को और भी अधिक विशेष बना देती है।

परिवार सहित विराजमान हैं गणेश जी

इस ऐतिहासिक मंदिर की एक अन्य बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान गणेश अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र स्थल पर गणेश जी के साथ उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि के साथ-साथ उनके दोनों पुत्र शुभ और लाभ भी विराजमान हैं। यही कारण है कि देशभर में इस मंदिर की अपनी एक अनोखी पहचान है। हर साल गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर यहां आयोजित होने वाला लक्खी मेला श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था और भक्ति का एक बहुत बड़ा केंद्र बन जाता है। दूर-दराज से पैदल यात्राएं करके श्रद्धालु रणथंभौर पहुंचने लगे हैं और गणेश जी के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना कर रहे हैं।

प्रशासन द्वारा की जा रही व्यापक तैयारियां

मेले के दौरान आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की संभावित भारी भीड़ को मध्यनजर रखते हुए जिला प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था, यातायात नियंत्रण, पेयजल आपूर्ति, साफ-सफाई और अन्य सभी जरूरी व्यवस्थाओं को समय रहते अंतिम रूप देने में पूरी तरह जुट गया है। आगामी 14 सितंबर को भरने वाले इस विशाल लक्खी मेले के दौरान रणथंभौर की धरती पर आस्था का एक अदभुत संगम देखने को मिलेगा। जंगल की प्राकृतिक हरियाली, ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग और त्रिनेत्र गणेश के जयकारों के गूंजते स्वरों के बीच सवाई माधोपुर एक बार फिर पूरे देश भर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनने के लिए पूरी तरह तैयार है।

सवाल-जवाब

रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश का लक्खी मेला कब आयोजित किया जाएगा?
यह प्रसिद्ध लक्खी मेला आगामी 14 सितंबर को आयोजित किया जाएगा।
त्रिनेत्र गणेश मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग के भीतर स्थित है।
मंदिर से कौन सी पौराणिक कथा जुड़ी है?
मान्यता है कि भगवान गणेश का विवाह भगवान कृष्ण द्वारा रणथंभौर में रिद्धि और सिद्धि के साथ कराया गया था।
राजा हम्मीर का इस मंदिर से क्या संबंध है?
वर्ष 1299 में आक्रमण के दौरान राजा हम्मीर को भगवान गणेश ने स्वप्न में दर्शन दिए थे और उनके भंडार भरे थे।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·14 दिन पहले

रणथंभौर दुर्ग जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र में लाखों श्रद्धालुओं का यह जुटान स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। चूंकि मंदिर किले के भीतर और राष्ट्रीय उद्यान के दायरे में स्थित है, इसलिए आने वाले दिनों में सुरक्षा व्यवस्था, ट्रैफिक प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 दिन पहले

चूंकि यह आयोजन एक संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्र और ऐतिहासिक दुर्ग के भीतर होना है, इसलिए सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के साथ-साथ वन विभाग और पुलिस के बीच तालमेल बेहद जरूरी होगा। लाखों लोगों की मौजूदगी से पार्क की पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले दबाव को रोकना और आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन की पुख्ता व्यवस्था करना प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

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