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सीमावर्ती बाड़मेर की प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने वायुवीर परीक्षा में किया कमाल, ऑल इंडिया में हासिल की पहली रैंकराजस्थान
16 सित॰ 2026, 6:43 am (9 दिन पहले)· 1

सीमावर्ती बाड़मेर की प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने वायुवीर परीक्षा में किया कमाल, ऑल इंडिया में हासिल की पहली रैंक

राजस्थान के बाड़मेर जिले के सरहदी गांव रामसर की रहने वाली प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने वायुवीर परीक्षा में ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल कर देश भर में अपने परिवार और क्षेत्र का नाम रोशन किया है।

राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक दूरदराज और सीमावर्ती गांव रामसर की रहने वाली प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर पूरे देश में अपने गृह जिले का नाम रोशन कर दिया है। उन्होंने वायुवीर परीक्षा में ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल करके यह साबित कर दिखाया है कि बुलंद हौसलों के आगे कठिन परिस्थितियां भी टिक नहीं पाती हैं। जिस भूभाग को कभी बेटियों की शिक्षा और उनके चहुंमुखी विकास के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता था, उसी माटी से ताल्लुक रखने वाली इस मेधावी बेटी ने आसमान की बुलंदियों को छूकर एक नया इतिहास रच डाला है। उनकी इस अभूतपूर्व सफलता से न केवल उनके परिजनों में बल्कि पूरे बाड़मेर अंचल में खुशी की लहर दौड़ गई है और हर किसी का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है।

साधारण पृष्ठभूमि और संघर्षपूर्ण शुरुआती दिन

भारत और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब बसे रामसर गांव में जन्मी प्रियदर्शिनी का शुरुआती जीवन गांव की अन्य सामान्य बालिकाओं की भांति ही साधारण परिवेश में बीता। उनके पिता किशनसिंह रामसर में ही मनिहारी की एक छोटी सी दुकान संचालित कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। आर्थिक तंगी के कारण उनके परिवार में संसाधनों की हमेशा से कमी बनी रही, लेकिन इसके बावजूद उनके बुलंद इरादों और सपनों में कभी कोई रुकावट नहीं आई। प्रियदर्शिनी ने अपनी शुरुआती स्कूली शिक्षा अपने पैतृक गांव से ही पूरी की और इसके पश्चात बाड़मेर के पीजी कॉलेज से बीएससी की डिग्री हासिल की। अपनी उच्च शिक्षा के सफर के साथ-साथ उन्होंने एनसीसी में भी सक्रिय रूप से भाग लिया और वहां से कड़ा अभ्यास करते हुए सी सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया, जिसने उनके व्यक्तित्व को निखारने में अहम भूमिका निभाई।

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दादा की प्रेरणा और वर्दी का सपना

प्रियदर्शिनी के लिए सफलता का यह मार्ग जरा भी आसान नहीं था और उन्हें कई बाधाओं को पार करना पड़ा। उनके दादा बागसिंह सीमा सुरक्षा बल में सब-इंस्पेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे और वही उनके जीवन के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत बने। बचपन के दिनों से ही अपने दादा के कंधों पर जगमगाते हुए दो सितारों को देखकर प्रियदर्शिनी के मन में देश की सेवा करने की तीव्र इच्छा जागृत हुई थी। उनके दादा की वर्दी ने उनके भीतर एक ऐसी अलख जगा दी थी कि उन्हें भी भविष्य में देश की सुरक्षा के लिए समर्पित होना है। अपने इसी बचपन के सपने को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से उन्होंने वायुवीर परीक्षा की कठिन तैयारी का बीड़ा उठाया और अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाए।

असफलताओं से सीख और दूसरा प्रयास

हालांकि सफलता का यह सफर इतना सीधा नहीं था क्योंकि अपने पहले ही प्रयास में प्रियदर्शिनी को असफलता का सामना करना पड़ा था। परंतु उन्होंने इस असफलता से निराश होने के बजाय अपनी गलतियों का विश्लेषण किया और दोगुनी मेहनत तथा पूरी लगन के साथ दोबारा परीक्षा की तैयारी में जुट गईं। सीमित संसाधनों और तमाम पारिवारिक एवं सामाजिक बाधाओं के बीच उनकी यह कड़ी मेहनत आखिरकार रंग लाई और उन्होंने अपने दूसरे ही प्रयास में वायुवीर परीक्षा की अखिल भारतीय सूची में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी सफलता की एक नई इंवत लिख दी। उनका यह संघर्षपूर्ण सफर देश के तमाम युवाओं और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है।

गृह जिले लौटने पर भव्य स्वागत

हाल ही में जब प्रियदर्शिनी अपनी कठोर प्रशिक्षण प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के पश्चात अपने गृह जिले बाड़मेर वापस लौटीं, तो स्थानीय निवासियों और उनके परिवार के सदस्यों ने उनका अत्यंत भव्य स्वागत किया। इस दौरान हर कोई इस प्रतिभाशाली बेटी की असाधारण उपलब्धि पर गर्व की अनुभूति कर रहा था। अपनी इस शानदार सफलता के संबंध में चर्चा करते हुए प्रियदर्शिनी ने बताया कि उनके दादा के कंधों पर सजे दो सितारे हमेशा से उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा रहे हैं। उन्होंने बचपन से ही अपने दादा को देखकर जो वर्दी पहनने और देश की रक्षा करने का संकल्प लिया था, वह आज उनकी मेहनत से वास्तविकता में बदल चुका है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिस वर्दी को उन्होंने हमेशा अपने सपनों में देखा था, उसे अपने शरीर पर धारण करके वह पूरी निष्ठा, ईमानदारी और जवाबदेही के साथ देश और समाज की सेवा करेंगी।

क्षेत्र की बेटियों के लिए बनी नई मिसाल

प्रियदर्शिनी की यह उल्लेखनीय सफलता अब पूरे सीमावर्ती इलाके की युवतियों और नौजवानों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत बन गई है। जिस सरहदी क्षेत्र में अक्सर सुविधाओं और संसाधनों के अभाव का रोना रोया जाता था, वहां की एक बेटी ने अपने अटल संकल्प और जुनून के बल पर यह प्रमाणित कर दिया है कि सफलता किसी भौतिक संसाधन की मोहताज नहीं होती है। वायुवीर के रूप में उनकी यह नई उड़ान गांव की अन्य बालिकाओं को भी अपने घरों की चौखट लांघकर अपने बड़े सपनों को पूरा करने की एक नई उम्मीद दे रही है। उनकी यह पूरी यात्रा यह दर्शाती है कि यदि बेटियां किसी कार्य को पूरा करने की ठान लें, तो वे किसी भी क्षेत्र में सर्वोच्च मुकाम हासिल कर सकती हैं और देश के गौरव को कई गुना बढ़ा सकती हैं।

सवाल-जवाब

प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने कौन सी परीक्षा में टॉप किया है?
प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने वायुवीर परीक्षा में ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल की है।
प्रियदर्शिनी राजपुरोहित का संबंध किस जिले से है?
वह राजस्थान के बाड़मेर जिले के रामसर गांव की रहने वाली हैं।
प्रियदर्शिनी की सफलता के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा कौन थे?
सीमा सुरक्षा बल में सब-इंस्पेक्टर रहे उनके दादा बागसिंह उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बने।
प्रियदर्शिनी ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई कहां से पूरी की थी?
उन्होंने बाड़मेर के पीजी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई पूरी की थी।
प्रियदर्शिनी ने कौन सा एनसीसी सर्टिफिकेट हासिल किया था?
उन्होंने पढ़ाई के दौरान एनसीसी से 'सी' सर्टिफिकेट हासिल किया था।
प्रियदर्शिनी के पिता क्या काम करते हैं?
उनके पिता किशनसिंह गांव में ही मनिहारी की एक छोटी सी दुकान चलाते हैं।
क्या प्रियदर्शिनी को पहले प्रयास में सफलता मिल गई थी?
नहीं, उन्हें अपने पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली थी लेकिन उन्होंने दूसरे प्रयास में पहली रैंक हासिल की।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·8 दिन पहले

वैश्विक और रणनीतिक दृष्टि से, सीमावर्ती और दूरदराज के इलाकों से बेटियों का रक्षा सेवाओं के शीर्ष स्तर तक पहुंचना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव और राष्ट्रीय सशक्तीकरण का बड़ा संकेत है। अमेरिका सहित कई देशों में यह देखा गया है कि जब सीमांत क्षेत्रों की प्रतिभाएं राष्ट्रीय मुख्यधारा और सुरक्षा ढांचे से जुड़ती हैं, तो इससे न केवल स्थानीय स्तर पर जेंडर समानता को बल मिलता है बल्कि क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक ढांचा भी मजबूत होता है। शुरुआती असफलता के बावजूद आल इंडिया पहली रैंक पाना यह साबित करता है कि अवसर और दृढ़ संकल्प मिलकर कठिन से कठिन परिस्थितियों को बदल सकते हैं। यह उपलब्धि सीमावर्ती युवाओं के लिए एक नया मानदंड स्थापित करती है।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

सीमावर्ती और साधन-विहीन ग्रामीण अंचलों से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में शीर्ष स्थान हासिल करना भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है। प्रियदर्शिनी राजपुरोहित की यह ऐतिहासिक सफलता दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन से प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी बाधा नहीं बनतीं। पहले प्रयास की असफलता के बाद ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल करना युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। रक्षा क्षेत्र में सुदूर क्षेत्रों की बेटियों की यह बढ़ती भागीदारी स्थानीय स्तर पर शिक्षा, एनसीसी और करियर विकल्पों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को बदलने का काम करेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

रविकश जी के इस सामाजिक विश्लेषण से आगे बढ़कर देखें तो लोक नीति और सीमावर्ती शासन के दृष्टिकोण से यह सफलता बेहद महत्वपूर्ण है। भारत-पाक सीमा से सटे बाड़मेर जैसे संवेदनशील अंचलों से युवाओं, विशेषकर बेटियों का रक्षा बलों की ओर बढ़ना राष्ट्रीय सुरक्षा में जन-भागीदारी को मजबूत करता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में एनसीसी और शिक्षा के बुनियादी ढांचे का प्रसार अब धरातल पर नतीजे दे रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल सुदूर इलाकों में सरकारी नीतियों के जमीनी प्रभाव को दर्शाती है, बल्कि सीमावर्ती समुदायों को देश की सुरक्षा मुख्यधारा से सीधे जोड़ने की नीतिगत दूरदर्शिता को भी सिद्ध करती है।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

सीमावर्ती बाड़मेर जैसे भौगोलिक रूप से दुर्गम और आर्थिक रूप से संघर्षपूर्ण क्षेत्र से निकलकर अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त करना यह दर्शाता है कि राज्य के दूरदराज के इलाकों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। राष्ट्रीय कैडेट कोर का अनुभव और पारिवारिक प्रेरणा ने इस सफलता में उत्प्रेरक का कार्य किया है। ऐसे प्रेरणादायक उदाहरण भविष्य में सीमावर्ती जिलों की अन्य बालिकाओं के लिए उच्च शिक्षा और रक्षा सेवाओं में करियर बनाने के मार्ग को और अधिक सुगम बनाएंगे, जिससे क्षेत्रीय विकास की तस्वीर बदलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह सफलता केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों में जन-जागरूकता के दृष्टिकोण से भी बेहद अहम है। अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बसे गांवों में सैन्य या अर्धसैनिक पृष्ठभूमि से प्रेरणा लेकर युवा जब ऐसे उच्च पदों पर पहुँचते हैं, तो इससे स्थानीय स्तर पर राष्ट्र निर्माण की भावना को और मजबूती मिलती है। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति सीमावर्ती इलाकों के प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे में सकारात्मक बदलाव लाने का काम करेगी।

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