रेगिस्तानी धरातल पर भीषण धूप, बेहद कम वर्षा और हवा के साथ खिसकते बालू के टीलों के बीच किसी भी प्रकार की वनस्पति को जीवित रखना हमेशा से एक कठिन चुनौती रहा है। इसके बावजूद बाड़मेर के बंजर टीलों पर पर्यावरण संतुलन को नया जीवन देने के उद्देश्य से एक विशाल हरित दीवार तैयार की जा रही है। पिछले दो सालों के दौरान इस जिले में वेदांता ऑयल एंड गैस, वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों ने संयुक्त भागीदारी निभाते हुए 700 हेक्टेयर भूमि पर लगभग 3.5 लाख पौधे रोपने का कार्य पूरा किया है। इस पूरे प्रयास की सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई है कि इनमें से करीब 80 फीसदी पौधे विपरीत परिस्थितियों में भी पूरी तरह जीवित और सुरक्षित हैं। योजना के तहत केवल उन्हीं देसी और स्थानीय प्रजातियों के पेड़ चुने गए हैं जो थार के सूखे और कठोर मिजाज में आसानी से खुद को ढालने की प्राकृतिक क्षमता रखते हैं।
थार की देशी प्रजातियों से संवर रहा रेगिस्तानी परिदृश्य
इस मरुस्थलीय विस्तार में हरियाली का नया ताना-बाना बुनने के लिए ऐसे वृक्षों का चयन किया गया जो कम पानी में वर्षों तक टिके रह सकते हैं। कुल 700 हेक्टेयर के दायरे में खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम, शीशम, कुमट, जाल, बेर, अरंडू, मोरिंगा, गूगल और जंगली जलेबी जैसी महत्वपूर्ण स्थानीय किस्मों के पौधे लगाए गए हैं। यह देसी वनस्पतियां मिट्टी के कटाव को थामने के साथ-साथ स्थानीय जैव विविधता को भी पोषण देती हैं।
वृक्षारोपण अभियान के शुरुआती चरण में बाड़मेर के धामडली, गोयणा महादेव भाखर, गंगाली और आवड़ी मांझी क्षेत्रों को शामिल करते हुए योजना आगे बढ़ाई गई। पहले चरण के अंतर्गत लगभग 400 हेक्टेयर जमीन पर 2 लाख पौधे लगाए गए। इस शुरुआती दौर में पौधों को तेज गर्मी से बचाने और उनकी नियमित देखभाल सुनिश्चित करने पर विशेष निगरानी रखी गई, ताकि मरुस्थल के प्रतिकूल थपेड़ों के बावजूद शुरुआती अवस्था में ही पौधे नष्ट न हों और अधिक से अधिक संख्या में पनप सकें।
विस्तार का दूसरा चरण और भविष्य का बड़ा संकल्प
अभियान के अगले चरण को आगे बढ़ाते हुए जूना पत्ररासर, बीजराड़, इटादा और बादरा जैसे सुदूर इलाकों को केंद्र में रखा गया। इस दूसरे चरण में करीब 300 हेक्टेयर भूमि को कवर करते हुए 1.5 लाख नए पौधे लगाए गए। इस प्रकार दोनों चरणों को मिलाकर कुल 700 हेक्टेयर बंजर धरातल को हरा-भरा बनाने की ठोस नींव रखी जा चुकी है। मरुभूमि को संवारने का यह कार्य यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि योजना के तहत वर्ष 2030 तक बाड़मेर जिले के भीतर कुल 20 लाख पेड़ लगाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
वर्षा की बूंद-बूंद सहेजने के लिए विशेष जल संचयन संरचनाएं
रेतीली और भुरभुरी मिट्टी में लंबे समय तक नमी को रोककर रखना सबसे बड़ी तकनीकी रुकावट थी। इस समस्या को सुलझाने के लिए केवल साधारण गड्ढे खोदने के पारंपरिक ढर्रे से हटकर आधुनिक और पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों का एक साथ उपयोग किया गया। ढलान वाली जमीनों पर बहते पानी को थामने के लिए कंटूर और स्टैगर्ड ट्रेंच बनाई गईं, जिससे बारिश का पानी व्यर्थ बहने के बजाय भूमि में समा सके।
इसके साथ ही अर्धचंद्राकार मेड़बन्दी और माइक्रो कैचमेंट संरचनाएं तैयार की गईं, जिन्होंने सीमित वर्षा जल को सीधे पौधों की जड़ों के आसपास केंद्रित करने में मदद की। पानी सहेजने की इसी वैज्ञानिक तकनीक का परिणाम है कि भीषण थार में भी पौधों की जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।
























