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सिरोही में मानसून दौरान पपीते की फसल पर मंडराया तना गलन रोग का खतरा, विशेषज्ञ ने दिए बचाव के उपायराजस्थान
20 अग॰ 2026, 6:19 am (36 दिन पहले)· 3

सिरोही में मानसून दौरान पपीते की फसल पर मंडराया तना गलन रोग का खतरा, विशेषज्ञ ने दिए बचाव के उपाय

राजस्थान के सिरोही जिले में बारिश के मौसम के दौरान पपीते के बागों में जलभराव की वजह से जड़ और तना गलन रोग फैलने की आशंका बढ़ गई है। कृषि विज्ञान केंद्र की विशेषज्ञ डॉ. कामिनी पाराशर ने किसानों को सही जल निकासी, जैविक खाद और फफूंदनाशक के इस्तेमाल की सलाह दी है।

राजस्थान का सिरोही जिला पपीते की पैदावार के मामले में राज्य भर में प्रमुख स्थान रखता है, जहां रेड लेडी समेत विभिन्न उन्नत किस्मों की बागवानी की जाती है। हालांकि, मौजूदा मानसून के दौर में खेतों में पानी जमा होने के कारण पपीते के पौधों में गंभीर बीमारियां पनपने की आशंका काफी बढ़ गई है। जलभराव की वजह से फैलने वाला जड़ और तना गलन रोग फसल को भारी नुकसान पहुंचा रहा है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।

मानसून में जलभराव से फैलता है जड़ और तना गलन रोग

सिरोही स्थित कृषि विज्ञान केंद्र की विषय विशेषज्ञ डॉ. कामिनी पाराशर के अनुसार, बारिश के समय खेतों में लंबे समय तक जलभराव रहना ही इस घातक रोग का मुख्य कारण है। जब पौधों के तने और जड़ों के इर्द-गिर्द पानी इकट्ठा हो जाता है, तो वहां फफूंद पनपने लगती है। इससे पौधे की जड़ें सड़ने लगती हैं और तना गल जाता है। इस रोग का असर सीधे तौर पर पौधे के विकास पर पड़ता है, जिससे पौधे तेजी से सूखने लगते हैं। सही समय पर रोकथाम न की जाए तो फलों का विकास रुक जाता है, जिसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है।

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जल निकासी की सही व्यवस्था और सिंचाई नियंत्रण

फसल को इस बर्बादी से बचाने के लिए डॉ. कामिनी पाराशर ने किसानों को तुरंत ठोस कदम उठाने की सलाह दी है। सबसे पहले पपीते के बगीचे में बारिश के अतिरिक्त पानी की निकासी की पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि पौधों के तनों के पास किसी भी सूरत में पानी जमा न हो सके। मानसून के दौरान हवा और मिट्टी में नमी पहले से अधिक होती है, इसलिए इस मौसम में बार-बार सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं होती। मिट्टी की ऊपरी सतह पूरी तरह सूख जाने के बाद ही हल्की सिंचाई की जानी चाहिए।

संक्रमित पौधों को हटाना और जैविक व रासायनिक उपचार

बीमारी को पूरे खेत में फैलने से रोकने के लिए कृषि विशेषज्ञ ने बताया कि यदि कोई पौधा संक्रमित दिखाई दे, तो उसे तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा, नए पौधरोपण के दौरान हमेशा रोगमुक्त और स्वस्थ पौध का ही चयन करना चाहिए। मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और जैविक तरीके से रोग नियंत्रण के लिए ट्राईकोडर्मा युक्त खाद या अच्छी तरह तैयार कंपोस्ट खाद का उपयोग बेहद प्रभावी माना जाता है। यदि खेत में रोग का असर दिखाई देने लगे, तो किसानों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर उपयुक्त फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए ताकि फसल को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके।

सवाल-जवाब

पपीते में जड़ और तना गलन रोग का मुख्य कारण क्या है?
मानसून के दौरान खेत में लंबे समय तक जलभराव रहना ही पपीते में जड़ और तना गलन रोग फैलने का प्राथमिक कारण है।
मानसून के मौसम में पपीते की फसल की सिंचाई कैसे करनी चाहिए?
बारिश के समय अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। मिट्टी की ऊपरी सतह पूरी तरह सूख जाने के बाद ही हल्की सिंचाई करें।
रोगग्रस्त पौधे दिखने पर किसान को क्या कदम उठाना चाहिए?
संक्रमित पौधे को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट कर देना चाहिए ताकि बीमारी अन्य स्वस्थ पौधों में न फैले।
पपीते के पौधों को जैविक तरीके से इस रोग से कैसे बचाया जा सकता है?
जैविक नियंत्रण के लिए मिट्टी में ट्राईकोडर्मा युक्त खाद या अच्छी तरह तैयार कंपोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए।
सिरोही में पपीते की कौन सी किस्म मुख्य रूप से उगाई जाती है?
सिरोही में रेड लेडी किस्म के साथ-साथ पपीते की कई अन्य उन्नत वैरायटी की खेती की जाती है।
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