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सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा में महिला की हत्या के दोषी बालकू ओराम की उम्रकैद रखी बरकरार, कहा अंधविश्वास से खतरे में पड़ जाएगा लोकतंत्रओडिशा
13 अग॰ 2026, 11:54 pm (3 दिन पहले)· 2

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा में महिला की हत्या के दोषी बालकू ओराम की उम्रकैद रखी बरकरार, कहा अंधविश्वास से खतरे में पड़ जाएगा लोकतंत्र

ओडिशा में 1998 में महिला को डायन बताकर मार डालने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी बालकू ओराम की उम्रकैद की सजा को कायम रखा है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए खतरा है।

भारत के मुख्य संवैधानिक न्यायालय ने अंधविश्वास और कुरुतियों के नाम पर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। ओडिशा में करीब दो दशक से भी अधिक पुराने एक जघन्य हत्या के मामले में सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि महिलाओं को प्रताड़ित करने और उनकी जान लेने वाली कुप्रथाओं को किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाएगा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की दो सदस्यीय पीठ ने मुख्य अभियुक्त बालकू ओराम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने सामाजिक चेतना को झकझोरते हुए टिप्पणी की कि यदि अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं पर ऐसे अत्याचार होते रहे, तो भारत का संवैधानिक लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।

अंधविश्वास के नाम पर बर्बरता की खौफनाक दास्तान

यह पूरा मामला साल 1998 का है, जब ओडिशा के एक गांव में अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गई थीं। मुख्य अपराधी बालकू ओराम ने अपने एक साथी के साथ मिलकर एक असहाय महिला के खिलाफ साजिश रची। दोनों अभियुक्तों ने उस बेबस महिला पर डायन होने का झूठा और बेबुनियाद आरोप लगाया। इसके बाद वे महिला को उसके घर से जबरन घसीटकर बाहर ले आए और उस पर बेरहमी से हमला कर दिया। हमलावरों ने महिला की इतनी निर्ममता से पिटाई की कि उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

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इस दिल दहला देने वाली घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि पूरी वारदात पीड़ित महिला की मासूम बेटी की आंखों के सामने अंजाम दी गई। अपनी ही मां को तड़प-तड़पकर मरते देखने का वह दृश्य उस बच्ची के मन मस्तिष्क पर जिंदगी भर के लिए एक गहरा सदमा छोड़ गया। इस वारदात की क्रूरता ने न केवल स्थानीय लोगों को बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका को भी हिलाकर रख दिया।

निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर

कानूनी प्रक्रिया के तहत इस मामले की सुनवाई सबसे पहले निचली अदालत में हुई थी, जहां साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर बालकू ओराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। बाद में अभियुक्त ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन ओडिशा हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के निर्णय को बिल्कुल सटीक मानते हुए सजा को यथावत रखा था।

इसके पश्चात मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह से न्यायसंगत और कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है। शीर्ष अदालत ने बालकू ओराम की अपील को खारिज करते हुए कहा कि न्याय की व्यवस्था में तर्कहीन मान्यताओं और कुप्रथाओं के स्थान पर कानून के शासन की ही जीत होनी चाहिए।

संवैधानिक लोकतंत्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर

अपने विस्तृत आदेश में सर्वोच्च अदालत ने देश में जारी अंधविश्वास की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है। ऐसे में किसी भी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित करना या उसकी हत्या करना एक अक्षम्य अपराध है। कड़े कानूनी प्रावधानों के बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में ऐसी घटनाओं का जारी रहना बेहद चिंताजनक है।

अदालत ने सख्त लहजे में चेतावनी दी कि महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले और उनके जीवन को खतरे में डालने वाले अपराधियों के साथ कोई रियायत नहीं बरती जाएगी। कोर्ट ने रेखांकित किया कि कानून का राज बनाए रखने के लिए समाज को अपनी संकीर्ण और हिंसक सोच बदलनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने संदेश दिया कि जब तक समाज में महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक लोकतांत्रिक मूल्य अधूरे रहेंगे।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के किस मामले में फैसला सुनाया?
अदालत ने साल 1998 में महिला की डायन बताकर की गई बर्बर हत्या के मामले में मुख्य आरोपी बालकू ओराम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की किस पीठ ने की?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की दो सदस्यीय पीठ ने की।
अंधविश्वास और डायन प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
कोर्ट ने कहा कि यदि अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करने की कुप्रथा जारी रही तो देश का संवैधानिक लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।
हाईकोर्ट और निचली अदालत का इस मामले में क्या रुख था?
निचली अदालत ने मुख्य आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे ओडिशा हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट दोनों ने बिल्कुल सही मानकर बरकरार रखा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·3 दिन पहले

सर्वोच्च अदालत की यह सख्त टिप्पणी बताती है कि आधुनिक भारत में कुप्रथाएं सिर्फ सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बड़ा खतरा हैं। यह फैसला प्रशासनिक मशीनरी और जमीनी स्तर पर वैज्ञानिक सोच के प्रचार-प्रसार की अनिवार्यता को रेखांकित करता है, ताकि ऐसी हिंसक घटनाओं पर प्रभावी रोक लग सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में सामाजिक न्याय और प्रशासनिक मशीनरी की विफलता पर एक गंभीर नीतिगत सवाल खड़ा करती है। अंधविश्वास के मामलों में पुलिस और स्थानीय प्रशासन की लचर कार्रवाई ग्रामीण भारत में आज भी एक चुनौती बनी हुई है। जब तक राज्यों में प्रभावी एंटी-विंचिंग कानून और जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान कड़ाई से लागू नहीं किए जाते, तब तक संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना कठिन होगा।

Kavya Nair@kavya-nair·3 दिन पहले

अर्जुन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि ऐसे कुप्रथाओं और अंधविश्वास से जुड़े मामलों का ग्रामीण क्षेत्रों के पर्यटन और सांस्कृतिक छवि पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब दूर-दराज के आदिवासी या ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा और कानून का अभाव दिखता है, तो वैश्विक पर्यटकों और शोधकर्ताओं के बीच वहां की सामाजिक स्थिति को लेकर चिंता बढ़ती है। सांस्कृतिक पर्यटन के सतत विकास के लिए यह आवश्यक है कि समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाए ताकि आंतरिक क्षेत्रों में जीवन और संस्कृति का एक सुरक्षित तथा सकारात्मक स्वरूप दुनिया के सामने आ सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी कुप्रथाएं अब कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर टिक नहीं सकतीं। दो दशक से अधिक लंबा कानूनी संघर्ष यह दर्शाता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में सुस्त प्रक्रिया के बावजूद दोषियों को अंततः सजा मिलना तय है। अदालत की यह टिप्पणी कि अंधविश्वास लोकतंत्र के लिए खतरा है, उन राज्यों के लिए एक चेतावनी है जहां डायन प्रताड़ना के मामले आज भी अनरिपोर्टेड रह जाते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

करण मल्होत्रा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, हमें यह भी देखना होगा कि ऐसी कुप्रथाओं का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और श्रम शक्ति पर पड़ता है। जब इस तरह के अपराध अनरिपोर्टेड रह जाते हैं, तो इससे निवेशकों और कॉर्पोरेट जगत में उस क्षेत्र के सामाजिक विकास सूचकांक को लेकर नकारात्मक संदेश जाता है। यदि हमें देश के दूरदराज के इलाकों को मुख्यधारा के विकास से जोड़ना है, तो केवल कानूनी दंड पर्याप्त नहीं है; इसके लिए राज्यों को संस्थागत स्तर पर जागरूकता और आर्थिक समावेशिता के कड़े कदम उठाने होंगे, तभी संवैधानिक लोकतंत्र वास्तव में मजबूत हो पाएगा।

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