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ठोस वजह होने पर बीवी को पति के साथ रहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की दो टूकछत्तीसगढ़
21 सित॰ 2026, 5:54 pm (4 दिन पहले)· 0

ठोस वजह होने पर बीवी को पति के साथ रहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की दो टूक

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 26 वर्षीय पति की याचिका खारिज करते हुए व्यवस्था दी है कि अलग रहने के वाजिब कारण मौजूद हों तो पत्नी को दांपत्य संबंध बहाल करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

वैवाहिक रिश्तों में जबरन साथ रहने को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी सामने आई है, जिसमें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला के पास अपने ससुराल से दूर रहने की ठोस और उचित वजहें मौजूद हैं, तो उसे पति के साथ रहने के लिए कतई विवश नहीं किया जा सकता। इस तल्ख टिप्पणी के साथ अदालत ने अपने जीवनसाथी को वापस बुलाने और दांपत्य अधिकारों की बहाली चाहने वाले एक व्यक्ति की अपील को पूरी तरह नामंजूर कर दिया।

फैमिली कोर्ट के आदेश को रखा गया बरकरार

यह कानूनी विवाद छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से जुड़ा हुआ था, जहां 26 वर्षीय पति ने अपनी 22 वर्षीय पत्नी को मायके से ससुराल वापस लाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले की विस्तृत सुनवाई जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की संयुक्त खंडपीठ ने की। दोनों जजों की बेंच ने मामले के रिकॉर्ड और परिस्थितियों की समीक्षा करने के उपरांत निचली अदालत यानी नवंबर 2023 में आए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें पति के इस अनुरोध को खारिज कर दिया गया था।

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कानूनी नोटिस और फेरों की दलीलें नहीं आईं काम

याचिकाकर्ता पति ने अपनी दलीलों में अदालत के समक्ष यह रेखांकित करने का प्रयास किया था कि वह अपनी पत्नी को घर वापस लाने के लिए लगातार सक्रिय था। उसने तर्क रखा कि वह अपनी जीवनसाथी को मनाकर लाने के लिए कई मर्तबा उसके मायके गया और विधिवत कानूनी नोटिस भी भिजवाए, लेकिन इसके बावजूद पत्नी ने ससुराल लौटने से इनकार कर दिया। पति का कहना था कि उसकी ओर से वैवाहिक संबंध सुधारने के गंभीर प्रयास किए गए थे।

हालांकि, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पति के इन तर्कों को नाकाफी करार दिया। बेंच ने स्पष्ट तौर पर टिप्पणी की कि किसी पति का बार-बार ससुराल का चक्कर लगाना या कानूनी नोटिस जारी करना इस बात का सबूत नहीं बन सकता कि पत्नी बिना किसी पुख्ता वजह के अलग रह रही है। जजों ने कहा कि ऐसे व्यवहारों को बाकी परिस्थितियों से काटकर अलग-थलग नहीं देखा जा सकता, बल्कि दोनों पक्षों के बीच उपजे पूरे परिवेश और अदालत में पेश साक्ष्यों के संदर्भ में ही इन्हें परखा जाना आवश्यक है।

दहेज मांग और दस्तावेज दबाने पर कोर्ट की फटकार

सुनवाई की कार्यवाही के दौरान 22 वर्षीय पत्नी ने पति के आचरण को लेकर बेहद गंभीर खुलासे किए। पत्नी ने अदालत को अवगत कराया कि उसके साथ मारपीट की जाती थी और लगातार प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने स्पष्ट आरोप लगाया कि ससुराल पक्ष की तरफ से दहेज के रूप में क्रेटा कार और 5 लाख रुपये नकद की निरंतर मांग की जा रही थी, जिसकी वजह से उसका वहां रहना दूभर हो गया था।

अदालत ने इन हालात और पति के आचरण पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि पति ने पत्नी के अहम शैक्षणिक और व्यक्तिगत दस्तावेजों को अपने कब्जे में दबाकर रखा हुआ है, तो हाईकोर्ट ने इस अनुचित आचरण के लिए पति को कड़ी फटकार लगाई। खंडपीठ ने अंततः अपने फैसले में दोहराया कि केवल वापस बुलाने की कोशिशें दिखाना कानूनन पर्याप्त नहीं है, और यदि अलग रहने के पीछे उत्पीड़न जैसे वाजिब कारण हैं तो किसी भी महिला को पति के साथ जीवन बिताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

सवाल-जवाब

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने किस मामले में यह फैसला सुनाया?
हाईकोर्ट ने जशपुर के एक 26 वर्षीय पति की उस याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया, जिसमें उसने अपनी 22 वर्षीय पत्नी को वापस ससुराल बुलाने की मांग की थी।
अदालत में किस बेंच ने इस मामले की सुनवाई की?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की संयुक्त खंडपीठ ने की।
पति ने अपनी याचिका में क्या मुख्य दलील दी थी?
पति का कहना था कि उसने पत्नी को वापस लाने के लिए कई बार मायके जाकर कोशिशें कीं और कानूनी नोटिस भी भेजे, फिर भी पत्नी नहीं लौटी।
हाईकोर्ट ने पति के नोटिस और प्रयासों पर क्या टिप्पणी की?
कोर्ट ने कहा कि केवल नोटिस भेजना या मायके जाना यह साबित नहीं करता कि पत्नी बिना वजह अलग रह रही है, बल्कि पूरे हालात और साक्ष्यों को देखना जरूरी है।
पत्नी ने पति और ससुराल पक्ष पर क्या आरोप लगाए थे?
पत्नी ने मारपीट, प्रताड़ना और दहेज के रूप में 5 लाख रुपये नकद व क्रेटा कार मांगने के गंभीर आरोप लगाए।
हाईकोर्ट ने पति को किस बात के लिए कड़ी फटकार लगाई?
कोर्ट ने पत्नी के जरूरी शैक्षणिक और व्यक्तिगत दस्तावेज अपने पास दबाकर रखने के लिए पति के रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए उसे फटकार लगाई।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·3 दिन पहले

यह कानूनी फैसला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे पारिवारिक तनाव और घरेलू प्रताड़ना, जैसे दहेज की मांग और दस्तावेजों को अवैध रूप से रोकना, रसोई और घर के भीतर के माहौल को जहरीला बना देते हैं। जब मानसिक शांति छिन जाती है, तो भोजन और आपसी सौहार्द जैसी बुनियादी चीजें भी बेमानी हो जाती हैं। ऐसे मामलों का सीधा असर पारिवारिक संस्कृति और जीवनशैली पर पड़ता है, जिससे घरेलू हिंसा के खिलाफ कानूनी सुरक्षा का दायरा और मजबूत होता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह फैसला वैवाहिक विवादों में व्यक्तिगत स्वायत्तता और मानवीय गरिमा को प्राथमिकता देने की दिशा में एक अहम न्यायिक कदम है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि केवल कानूनी नोटिस या पति के सतही प्रयासों को रिश्ते की बहाली का आधार नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया जाए। ऐसे मामलों में अदालतों का रुख पारिवारिक कानून और लैंगिक न्याय के बीच संतुलन को और अधिक मजबूत कर रहा है, जिससे भविष्य में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के दायरे में और स्पष्टता आएगी।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

यह फैसला केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सामाजिक-आर्थिक ढांचे पर भी पड़ता है। जब अदालतों द्वारा दहेज प्रताड़ना और दस्तावेज रोकने जैसे मामलों में कड़ा रुख अपनाया जाता है, तो यह कॉर्पोरेट और कार्यस्थल पर भी महिलाओं की वित्तीय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए एक मजबूत मनोवैज्ञानिक आधार तैयार करता है। आने वाले समय में इस तरह के न्यायिक दृष्टांत पारिवारिक कानून में सुधार और घरेलू अधिकारों के प्रति कॉरपोरेट और सामाजिक उत्तरदायित्व दोनों को प्रभावित करेंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

यह फैसला पारिवारिक अदालतों में बढ़ रहे वैवाहिक विवादों के मामलों में एक अहम कानूनी नजीर बनेगा। अदालत की यह टिप्पणी कि केवल कानूनी नोटिस भेजने या औपचारिकताएं पूरी करने से पतियों को वैवाहिक अधिकारों की बहाली का हक नहीं मिल जाता, यह साबित करती है कि न्याय प्रणाली में अब घरेलू प्रताड़ना और दहेज उत्पीड़न के वास्तविक साक्ष्यों को प्राथमिकता दी जा रही है। ऐसे मामलों में आगे चलकर काउंसलिंग और मध्यस्थता की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला स्पष्ट करता है कि वैवाहिक विवादों में केवल कानूनी दस्तावेजों या औपचारिकता दिखाने भर से राहत नहीं मिल सकती। जब कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और शैक्षणिक दस्तावेज दबाने जैसे गंभीर आचरण पर पति को फटकार लगाई है, तो यह स्पष्ट संदेश है कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के मुकदमों में पुरुषों को अपनी पक्षधरता साबित करने के लिए अपने दुराचरण को छिपाने की बजाय न्यायसंगत और वास्तविक दृष्टिकोण अपनाना होगा। भविष्य में ऐसी कार्यवाहियां पतियों को केवल कानूनी दांव-पेंच खेलने से रोकेगी।

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