समुद्र में काम करने वाले लाखों नाविक दुनिया की रोजमर्रा की जिंदगी को चलाते हैं, फिर भी उनके सामने मंडराते खतरे अक्सर सुर्खियों से दूर रह जाते हैं. हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम के बाद पश्चिम एशिया में हथियारों की गूंज भले थम गई हो, लेकिन इस टकराव ने समुद्री सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और नाविकों की जान को लेकर कई बड़े सवाल छोड़ दिए हैं. इसी दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत ने पूरी दुनिया का ध्यान उन जोखिमों की तरफ खींचा है, जिनसे समुद्र पर काम करने वाले लोग रोज जूझते हैं.
25 जून को मनाए जाने वाले वर्ल्ड सीफेरर्स डे से ठीक पहले भारतीय नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी कमोडोर श्रीकांत केसनूर ने इन मौतों, समुद्री कानून, भारतीय नाविकों की मुश्किलों और देश के समुद्री भविष्य पर खुलकर अपनी बात रखी.
तीन नाविकों की मौत पर क्या बोले कमोडोर केसनूर
कमोडोर केसनूर ने सबसे पहले मारे गए भारतीय नाविकों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना जताई. उन्होंने कहा कि ड्यूटी निभाते हुए भारतीय नाविकों का जान गंवाना बेहद पीड़ादायक है. उनके मुताबिक अमेरिकी पक्ष का दावा है कि जिस जहाज सर्टाबेलो पर हमला हुआ, वह कथित तौर पर अमेरिकी नाकेबंदी तोड़ने की कोशिश कर रहा था और शायद ईरान से जुड़े प्रतिबंधित सामान को ढो रहा था. इसी वजह से उसे निशाना बनाया गया.
हालांकि केसनूर ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में कई कानूनी और परिचालन से जुड़े सवाल खड़े होते हैं. उन्होंने समझाया कि नाकेबंदी को युद्ध का एक कानूनी हथियार माना जाता है और कई बार यह सीधी जंग के मुकाबले कम जान लेने वाला विकल्प भी साबित होता है. लेकिन असली सवाल यह है कि जब औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा नहीं हुई थी और अमेरिकी राष्ट्रपति पहले ही संघर्ष खत्म होने की बात कह चुके थे, तब उस नाकेबंदी की कानूनी हैसियत क्या बचती थी.
उन्होंने जोड़ा कि नाकेबंदी लागू करना अपने आप में युद्ध जैसी कार्रवाई मानी जाती है, और यही वजह है कि इसकी वैधता पर जानकारों के बीच राय बंटी हुई है.
क्या अमेरिकी कार्रवाई हद से ज्यादा थी
केसनूर ने कहा कि सबसे अहम सवाल यह है कि जहाज को आखिर कहां निशाना बनाया गया. क्या वह सचमुच नाकेबंदी वाले इलाके में था या उससे काफी दूर निकल चुका था. क्या वह वाकई नाकेबंदी तोड़ रहा था. क्या उसने अमेरिकी निर्देशों को अनसुना किया था. या फिर वह गलत पहचान और गलत निशाने का शिकार बन गया.
उन्होंने बताया कि कुल तीन जहाजों सर्टाबेलो, मेरिवैक्स और जयवीर पर कार्रवाई हुई थी. इनमें से एक जहाज को ओमान के तट के पास उस वक्त निशाना बनाया गया, जब वह अपना माल उतार चुका था. केसनूर के मुताबिक दूसरा बड़ा सवाल यह है कि किसी जहाज को रोकने के लिए क्या सीधे मिसाइल दागना जरूरी था. उन्होंने कहा कि आमतौर पर किसी जहाज को रोकने के लिए पहले चेतावनी दी जाती है, उसके आगे फायरिंग की जाती है, हेलीकॉप्टर भेजा जाता है और अंतरराष्ट्रीय संचार माध्यमों से रुकने के निर्देश दिए जाते हैं.
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय टकरावों में आवश्यकता और अनुपातिकता दो बड़े सिद्धांत होते हैं. ऐसे में यह देखना जरूरी है कि बल का इस्तेमाल वाकई जरूरी था या नहीं, और क्या वह खतरे के अनुपात में था. केसनूर के शब्दों में, उपलब्ध तथ्यों को देखें तो ऐसा लगता है कि अमेरिकी नौसेना ने हद से ज्यादा ताकत दिखाई. उनके मुताबिक अगर जहाजों ने सचमुच निर्देशों का उल्लंघन किया भी था, तब भी मिसाइल हमला जरूरत से कहीं ज्यादा सख्त जवाब लगता है.
उन्होंने कहा कि उनकी नजर में यह घटना होनी ही नहीं चाहिए थी और मौके पर फैसला लेने वाले कमांडर को कहीं ज्यादा सूझबूझ से काम लेना चाहिए था. साथ ही उन्होंने यह भी माना कि किसी भी सैन्य कमांडर को मौके पर तरह-तरह के दबावों और मिलती-जुलती सूचनाओं के बीच फैसला करना पड़ता है.
क्यों जरूरी हैं समुद्र के ये गुमनाम हीरो
केसनूर ने कहा कि नाविक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की सबसे मजबूत कड़ी हैं. दुनिया का करीब 90 प्रतिशत व्यापार समुद्री रास्तों से ही होता है. अगर जहाज और नाविक सामान ढोना बंद कर दें तो आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था ठहर जाएगी. उन्होंने कहा कि आज दुनिया के किसी भी कोने में महज एक क्लिक पर सामान पहुंच जाता है, लेकिन इसके पीछे समुद्र में खटने वाले लाखों नाविकों की मेहनत छिपी होती है. इसीलिए पूरी दुनिया उनकी कर्जदार है.
उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय नियम वाणिज्यिक जहाजों को बेरोकटोक आवाजाही का हक देते हैं. फ्रीडम ऑफ नेविगेशन सिर्फ कोई सैन्य या राजनीतिक धारणा नहीं है, बल्कि यह सीधे नाविकों की सुरक्षा से भी जुड़ी है.
संघर्ष वाले इलाकों में नाविकों पर कौन से खतरे
केसनूर ने कहा कि दुनियाभर के नाविकों को कई तरह के खतरों से जूझना पड़ता है. कुछ खतरे स्थानीय होते हैं तो कुछ क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर के. उदाहरण देते हुए उन्होंने अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती, अफ्रीका के पश्चिमी तट के आसपास की घटनाओं और हूती जैसे हथियारबंद गुटों की ओर से समुद्री यातायात को दी जाने वाली धमकियों का जिक्र किया.
उन्होंने कहा कि समुद्री डकैती, आतंकवाद, हथियारबंद लूटपाट, स्थानीय आपराधिक गिरोहों की हरकतें, युद्ध, खराब मौसम, प्रशासनिक अड़चनें और संचार की दिक्कतें लगातार नाविकों के लिए जोखिम पैदा करती रहती हैं. उनके मुताबिक आधुनिक युद्धों में ड्रोन और सटीक निशाना साधने वाली मिसाइलों के बढ़ते इस्तेमाल ने नाविकों के लिए खतरा और बढ़ा दिया है, क्योंकि ऐसे हमले दूर से और बिना पर्याप्त चेतावनी के किए जा सकते हैं.
उन्होंने जोर देकर कहा कि नाविकों की सुरक्षा किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है.
भारतीय नाविकों की हालत और चुनौतियां
केसनूर ने बताया कि दुनियाभर में तीन लाख से ज्यादा भारतीय नाविक काम कर रहे हैं. वैश्विक समुद्री बिरादरी में भारतीयों की हिस्सेदारी करीब एक-पांचवें से एक-छठे हिस्से के बीच है, जो भारत की बढ़ती समुद्री ताकत को दिखाती है.













