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यूपीआई शुल्क पर उमर अब्दुल्ला ने किया केंद्र का समर्थन, राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच छिड़ी तीखी बहसजम्मू-कश्मीर
17 सित॰ 2026, 12:16 am (5 दिन पहले)· 0

यूपीआई शुल्क पर उमर अब्दुल्ला ने किया केंद्र का समर्थन, राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच छिड़ी तीखी बहस

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया है। साथ ही, इस मुद्दे पर राहुल गांधी के हमलों के बाद केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है।

यूपीआई लेनदेन पर संभावित शुल्क को लेकर देश की राजनीति में चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्ष के विरोध के बीच जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को इस मामले में केंद्र सरकार का खुलकर साथ दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे को मेंटेन रखना और सुचारू रूप से चलाना एक खर्चीला काम है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने यह भी हिदायत दी कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खुदरा और आम ग्राहकों को किसी भी तरह की आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े और उनके हितों की पूरी सुरक्षा हो।

बुनियादी ढांचे के रख-रखाव पर खर्च

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस बात पर जोर दिया कि देश की डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को चलाने के लिए भारी भरकम राशि खर्च होती है। उन्होंने कहा कि यह अवसंरचना मुफ्त में तैयार नहीं होती और इसे बनाए रखना बेहद महंगा सौदा है। उनका यह भी मानना है कि जब कोई सेवा बिना किसी लागत के मिलती है, तो लोग अक्सर उसकी अहमियत नहीं समझ पाते। उन्होंने कहा कि यह शुल्क हर नागरिक पर नहीं थोपा जा रहा है। आम आदमी जब एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को पैसे ट्रांसफर करता है, तब कोई चार्ज नहीं लगता है। एक तय सीमा से नीचे लेन-देन करने वाले साधारण ग्राहकों को भी इस दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।

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व्यापारियों और कंपनियों पर असर

डिजिटल भुगतान प्रणाली के संचालन को लेकर आगे बोलते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अगर बड़ी कंपनियों से किसी प्रकार का शुल्क वसूला भी जाता है, तो इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये कंपनियां यूपीआई प्लेटफॉर्म के जरिए पहले से ही भारी मुनाफा कमा रही हैं। दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार को घेरा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने झुकने का गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने मांग की थी कि सरकार को तुरंत इस फैसले को वापस लेना चाहिए और रीढ़ सीधी रखनी चाहिए।

ज्योतिरादित्य सिंधिया का तीखा पलटवार

राहुल गांधी के इन आरोपों का कड़ा जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि कांग्रेस नेता को हर बात में अमेरिका का साया दिखाई देता है और वे कभी भी देश के विकास या राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक बात नहीं करते। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि प्रस्तावित शुल्क आम जनता के लिए नहीं है, बल्कि यह केवल बड़े व्यापारियों पर लागू होगा। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि यह नियम सिर्फ उन मर्चेंट्स पर लागू होगा जिनका मासिक यूपीआई लेनदेन एक लाख रुपये से अधिक है, और ऐसे कारोबारी कुल व्यापारियों का केवल चार प्रतिशत हिस्सा हैं। यह पूरा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है, जहां इस पर कानूनी पहलुओं से विचार किया जा रहा है।

सवाल-जवाब

यूपीआई शुल्क के मुद्दे पर किस राजनेता ने केंद्र सरकार का समर्थन किया है?
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यूपीआई लेनदेन पर शुल्क के मामले में केंद्र सरकार का समर्थन किया है।
उमर अब्दुल्ला के अनुसार यूपीआई शुल्क क्यों जरूरी है?
उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे को बनाए रखना और चलाना बहुत महंगा है और इस व्यवस्था को चलाने में भारी खर्च आता है।
किन लोगों को यूपीआई लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं देना होगा?
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजने और तय सीमा से कम लेनदेन करने वाले आम ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।
राहुल गांधी ने इस मामले में केंद्र सरकार पर क्या आरोप लगाया था?
राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने झुकने के बजाय इस फैसले को वापस लेना चाहिए।
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के आरोपों का क्या जवाब दिया?
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि राहुल गांधी को हर जगह अमेरिका का भूत नजर आता है और वे कभी राष्ट्र निर्माण की बात नहीं करते।
यह शुल्क किन व्यापारियों पर लागू होगा?
यह शुल्क केवल उन व्यापारियों पर लागू होगा जिनका महीने का यूपीआई लेनदेन एक लाख रुपये से अधिक है।
कुल व्यापारियों में से कितने प्रतिशत पर यह शुल्क लगेगा?
ऐसे व्यापारी कुल संख्या का मात्र चार प्रतिशत हैं।
यह मामला अब कहां पहुंच गया है?
यूपीआई शुल्क से जुड़ा यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

डिजिटल भुगतान शुल्क पर उमर अब्दुल्ला का रुख दर्शाता है कि प्रशासनिक और आर्थिक प्राथमिकताओं के मामले में क्षेत्रीय दल भी अवसंरचनात्मक लागत के तर्क को स्वीकार कर रहे हैं। राहुल गांधी द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय दबाव से जोड़ने और ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा आंकड़ों के साथ आम जनता को राहत देने की बात कहने से यह मामला आर्थिक नीति से बढ़कर सियासी और भू-राजनीतिक विमर्श बन चुका है। अब जब यह विवाद उच्चतम न्यायालय में है, तब देखने वाली बात होगी कि अदालत आर्थिक नीतियों में नियामक संतुलन और जनहित के बीच क्या दिशा तय करती है।

Sophie Laurent@sophie-laurent·5 दिन पहले

डिजिटल भुगतान ढांचे की वित्तीय स्थिरता बनाए रखना वैश्विक स्तर पर नीति-निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती रहा है। जब कोई मुफ़्त सेवा व्यापक पैमाने पर पहुंचती है, तो उसके रखरखाव की लागत का बंटवारा अनिवार्य हो जाता है। बड़े कारोबारियों पर शुल्क सीमित रखकर आम उपभोक्ताओं को राहत देने का यह मॉडल अवसंरचनात्मक लागत और वित्तीय समावेशन के बीच संतुलन साधने का प्रयास है। सर्वोच्च न्यायालय की भावी समीक्षा यह तय करेगी कि सार्वजनिक डिजिटल संपत्तियों के टिकाऊ संचालन और उपभोक्ता संरक्षण के बीच नियामक सीमाएं क्या होनी चाहिए।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के फिनटेक बुनियादी ढांचे के वित्तीय मॉडल पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होता है, तो इससे केवल चार प्रतिशत बड़े कारोबारियों पर असर पड़ेगा, लेकिन यह डिजिटल एसेट्स और पेमेंट गेटवे के सस्टेनेबिलिटी मॉडल को स्पष्ट करता है। बुनियादी ढांचे के रख-रखाव और कॉरपोरेट मुनाफे के बीच संतुलन बनाना वित्तीय बाजार की स्थिरता के लिए आवश्यक है, और इसका असर आगामी डिजिटल अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर भी पड़ेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

यह विवाद अब सर्वोच्च न्यायालय पहुँच चुका है, जिससे मामले का कानूनी दायरा बढ़ गया है। एक तरफ जहाँ बड़े व्यापारियों पर एक लाख रुपये की मासिक सीमा और शुल्क का दायरा तय करने की बात है, वहीं दूसरी तरफ न्यायिक समीक्षा से यह तय होगा कि वित्तीय नीतियां और सार्वजनिक हित किस प्रकार संतुलित होते हैं। आगे अदालत का रुख इस डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

यह स्पष्ट है कि डिजिटल पेमेंट ढांचे के रखरखाव के नाम पर होने वाली बहस अब केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसके दायरे में व्यापारियों का मुनाफा और आम उपभोक्ता की सुरक्षा भी शामिल हो चुके हैं। जब एक लाख रुपये से अधिक के मासिक लेनदेन वाले बड़े मर्चेंट्स पर शुल्क लगाने की बात आती है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह नीति देश की विशाल फिनटेक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है या नहीं। चूंकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुँच चुका है, इसलिए न्यायिक हस्तक्षेप से यह तय होना बाकी है कि तकनीकी विस्तार और आम जनहित के बीच वित्तीय संतुलन कैसे साधा जाएगा।

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