देश की राजधानी में 10 अक्टूबर को भारी सुरक्षा बंदोबस्त देखने को मिला, जब कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बड़ा प्रदर्शन बुलाया गया। दिल्ली पुलिस ने इस दौरान लगभग 7,000 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए प्रमुख चेहरों में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके, यूट्यूबर ध्रुव राठी, तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन शामिल रहे। जगह-जगह लगाए गए बैरिकेड्स, मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों और कई ट्रेनों के रद्द होने की वजह से राजधानी के विभिन्न हिस्सों में आम जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ। इस व्यापक विरोध प्रदर्शन ने एक बार फिर भारत की मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता और उनके निर्माण की प्रक्रिया को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। हालांकि, वोटर लिस्ट में किसे जगह मिले और किसे नहीं, यह सवाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कोई नया नहीं है, बल्कि इसका संबंध आजादी के तुरंत बाद हुए पहले आम चुनाव की बुनियादी चुनौतियों से जुड़ा हुआ है।
1950 का दौर: एक नवजात लोकतंत्र और दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी प्रयोग
साल 1947 में भारत को आजादी मिली और उसके तीन साल बाद 1950 में लागू हुए संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को देश की नींव बनाया। इस ऐतिहासिक फैसले के तहत हर पात्र वयस्क को संपत्ति, शिक्षा या लिंग के किसी भी भेदभाव के बिना मतदान करने का अधिकार दिया गया। जिस दौर में देश भीषण गरीबी और व्यापक निरक्षरता से जूझ रहा था, वहां यह कदम बेहद साहसिक और ऐतिहासिक माना गया। उस समय मतदान करने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तय की गई थी। इस विशाल वादे को जमीन पर उतारने का दायित्व भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी और गणितज्ञ सुकुमार सेन पर आया, जिन्होंने मार्च 1950 में भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला। उन्हें एक ऐसे विशाल पैमाने पर चुनाव आयोजित कराने का काम सौंपा गया था, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं मिलती थी।
लेकिन जैसे ही चुनाव अधिकारियों ने मतदाता सूचियों को तैयार करने का जमीनी काम शुरू किया, उनके सामने एक अप्रत्याशित और पेचीदा सामाजिक रुकावट आ खड़ी हुई। नई चुनावी व्यवस्था की सबसे पहली शर्त यह थी कि प्रत्येक मतदाता की पहचान एक स्वतंत्र नागरिक और व्यक्ति के रूप में दर्ज की जाए। इतिहासकारों के विवरणों के मुताबिक, सुकुमार सेन ने महिलाओं को उनके पति या पिता जैसे पुरुष रिश्तेदारों के नाम के सहारे दर्ज करने की पुरानी परिपाटी को अतीत का एक अजीब और बेतुका अवशेष करार दिया था। चुनाव अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए कि वे इस तरह के पारिवारिक विवरणों को हटाकर महिलाओं के वास्तविक और पूरे नाम सूची में दर्ज करें। इसके लिए व्यापक प्रचार अभियान चलाए गए और प्रविष्टियों को सुधारने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया गया।
28 लाख महिलाओं के नाम क्यों हटाए गए?
व्यापक प्रयासों के बावजूद यह समस्या पूरी तरह हल नहीं हो सकी। उस दौर में पंजीकृत की जा रही लगभग आठ करोड़ महिला मतदाताओं में से एक बड़ा हिस्सा अपने वास्तविक नाम खुलकर दर्ज कराने में सामाजिक झिझक का सामना कर रहा था। साल 1955 में प्रकाशित पहले आम चुनाव पर चुनाव आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट में दर्ज किया गया कि अंततः करीब 28 लाख महिलाओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने अपने नाम नियमों के अनुसार ठीक से दर्ज नहीं कराए थे।
इन महिलाओं ने मतदान करने की अपनी इच्छा नहीं छोड़ी थी, बल्कि व्यवस्था उनके विवरणों को तय कानूनी प्रारूप में स्वीकार नहीं कर सकी, जिसके चलते उनकी प्रविष्टियों को हटा दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने आजाद भारत के नए लोकतंत्र के भीतर मौजूद एक गहरे अंतर्विरोध को उजागर कर दिया। संविधान ने कागज पर तो समान नागरिकता की गारंटी दे दी थी, लेकिन जमीन पर मौजूद रूढ़िवादी सामाजिक परंपराएं महिलाओं को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मान्यता दिलाने की राह में बड़ी बाधा बनी हुई थीं।
राजस्थान में उठी आवाज: व्यवस्था पर खड़े किए गए सवाल
मतदाता सूची से महिलाओं के बाहर होने की यह कहानी केवल दिल्ली के प्रशासनिक दफ्तरों से जारी निर्देशों तक सीमित नहीं रही। राजस्थान में महिलाओं ने संगठित होकर इस बात को लेकर आवाज उठाई कि चुनावी सूचियों को किस तरह तैयार किया जा रहा है। शारदा भार्गव ने इस बात पर जोर दिया कि जो महिलाएं नई चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान थीं, उन्हें इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब सूची तैयार करने वाले अधिकारियों ने नियमों की जानकारी ठीक से नहीं दी थी।
इसी तरह अलवर में महिला मंडल ने 2 अगस्त 1951 को मताधिकार दिवस का आयोजन किया। इस आयोजन के माध्यम से अधिकारियों पर दबाव बनाया गया कि वे महिलाओं के नामों की प्रविष्टियों को स्वीकार करें या उनमें आवश्यक सुधार करें। यह सिर्फ प्रशासनिक शिकायतें नहीं थीं, बल्कि देश के पहले आम चुनाव में महिलाओं की एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में भागीदारी सुनिश्चित करने का एक सशक्त जमीनी प्रयास था।
संसद में गूंजा मामला और नेहरू-आंबेडकर का रुख
जमीनी स्तर पर शुरू हुआ यह आंदोलन बहुत जल्द संसद के गलियारों तक पहुंच गया। अगस्त और सितंबर 1951 के दौरान संसद में राजस्थान की मतदाता सूची से बाहर की गई महिलाओं के मताधिकार को बहाल करने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। शोध अध्ययनों के अनुसार, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कानून मंत्री बी.आर. आंबेडकर ने प्रभावित महिलाओं के प्रति पूरी सहानुभूति जताई। हालांकि, दोनों नेताओं का यह भी मानना था कि उस नाजुक मोड़ पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर सुधार करने से पहले आम चुनाव को टालना पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि वे चुनाव आयोग के अपने विवेक और स्वायत्तता में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। महिलाओं की यह मांग सरकार के शीर्ष स्तर तक जरूर पहुंची, लेकिन पहले आम चुनाव के समय रहते उनके नामों को सूची में दोबारा शामिल नहीं किया जा सका। इसके बाद यह मामला सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के सामने भी आया। 9 अक्टूबर 1951 को भरतपुर के अपने दौरे के दौरान सेन ने उन महिलाओं को भरोसा दिलाया, जिनके नाम दर्ज नहीं हो सके थे, कि आगामी चुनावों में उन्हें उनके अपने नामों से सूची में शामिल किया जाएगा। ऐतिहासिक अध्ययनों के मुताबिक, सेन ने व्यक्तिगत रूप से कई प्रभावित महिलाओं से मुलाकात की थी। इन प्रयासों का परिणाम यह निकला कि 1957 के दूसरे आम चुनाव से पहले बाहर हुई 28 लाख महिलाओं में से लगभग 85 प्रतिशत महिलाओं के नाम उनके अपने पहचान के साथ मतदाता सूची में सफलतापूर्वक दर्ज कर लिए गए।
2026 में वोटर लिस्ट पर फिर छिड़ी वही पुरानी बहस
सात दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद, भारत की मतदाता सूचियों को लेकर जारी विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है। साल 2026 में चल रहा मौजूदा पुनरीक्षण अभियान मतदाता सूचियों की जांच करने और उन प्रविष्टियों की पहचान करने के लिए चलाया जा रहा है जो अपात्र हैं, फर्जी या दोहरी हैं, अथवा ऐसे लोगों से जुड़ी हैं जिनका निधन हो चुका है या जो दूसरी जगह जा चुके हैं।
चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी कवायद मतदाता सूची की शुद्धता और सटीकता को बेहतर बनाने के उद्देश्य से की जा रही है। वहीं, इसके आलोचकों का आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर चलने वाले अभियान के कारण कई वास्तविक और पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से कटने का गंभीर जोखिम पैदा हो गया है। एक निष्पक्ष और मजबूत चुनावी प्रणाली के लिए यह आवश्यक है कि अपात्र नामों को हटाया जाए, लेकिन साथ ही हर पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। साल 1951 में चुनौती यह थी कि महिलाओं को परिवार की परछाईं के बजाय एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में मतदाता बनाया जाए, जबकि 2026 में बहस इस बात पर है कि सत्यापन की प्रक्रिया में कोई पात्र मतदाता छूट न जाए।



















