उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में बहने वाली शारदा नदी इस समय तटीय इलाकों के ग्रामीणों के लिए भारी तबाही लेकर आई है। इलाके में नदी का जलस्तर नीचे उतरने के बाद कटान की तीव्रता में अचानक बड़ा उछाल देखा जा रहा है। बहाव का रुख किनारों की तरफ मुड़ जाने से नदी उपजाऊ खेतों और बस्तियों को बड़ी तेजी से निगलने लगी है। इस अप्रत्याशित संकट ने ग्रामीणों के मन में भय का माहौल बना दिया है, क्योंकि किसानों की आंखों के सामने उनकी महीनों की मेहनत और रिहायशी ठिकाने एक-एक कर पानी की धारा में समाते जा रहे हैं।
रूरा सुल्तानपुर में धारा में विलीन हुआ प्राचीन आस्था का केंद्र
गोला तहसील के अंतर्गत आने वाले रूरा सुल्तानपुर गांव की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। यहां नदी का बहाव किनारों को काटते हुए सीधे गांव की तरफ बढ़ चुका है। इसी विनाशकारी कटान की जद में आकर गांव का एक अत्यंत पुराना और पूज्य दुर्गा मंदिर पूरी तरह से शारदा नदी की तेज धारा में विलीन हो गया। इस धार्मिक स्थल से ग्रामीणों की गहरी आस्था जुड़ी हुई थी और दूर-दराज से लोग यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर नियमित पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते थे। आस्था का यह केंद्र देखते ही देखते नदी के तेज बहाव में समा गया, जिससे समूचे गांव में गहरा शोक और निराशा फैल गई है।
जलस्तर घटते ही तेज हुई कटान की रफ्तार, आशियानों पर संकट
स्थानीय निवासियों का कहना है कि शारदा नदी में भूमि कटान का यह सिलसिला पिछले करीब दो महीने से लगातार जारी है। नदी का स्वभाव ऐसा देखा जा रहा है कि जब जलस्तर ऊपर उठता है, तब किनारों का कटाव अपेक्षाकृत धीमा रहता है, लेकिन जैसे ही पानी उतरना शुरू होता है, धारा सीधे किनारों की मिट्टी को तेजी से काटने लगती है। गांव के निवासी दिनेश कुमार ने बताया कि पिछले साठ दिनों से इलाका लगातार इस मुसीबत से जूझ रहा है और पानी घटने के बाद से जमीन ढहने की रफ्तार कई गुना बढ़ चुकी है।
दिनेश कुमार के अनुसार, मंदिर के साथ-साथ अब तक छह से अधिक रिहायशी मकान भी नदी के गर्भ में समा चुके हैं। रिहायशी ढांचों के अलावा किसानों की लहलहाती फसलें और खेती की जमीनें भी लगातार कट रही हैं। उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यदि इस कटाव को रोकने के लिए फौरी प्रबंध नहीं किए गए, तो बहुत जल्द पूरे रूरा सुल्तानपुर गांव के भौगोलिक अस्तित्व पर ही सीधा संकट खड़ा हो जाएगा। ग्रामीणों की शिकायत है कि इतने लंबे समय से जारी नुकसान के बावजूद अब तक किनारे पर कटानरोधी मजबूत कार्य शुरू नहीं किए गए हैं, जिसके चलते लोग तत्काल सुरक्षात्मक कदम उठाने की गुहार लगा रहे हैं।
फसलें डूबीं और मजदूरी पर उतरे किसान
नदी के इस प्रकोप ने इलाके की किसानी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। प्रभावित किसान रामसागर ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि शारदा नदी उनके खेत की करीब तीन एकड़ उपजाऊ भूमि को पहले ही अपने आगोश में ले चुकी है। उनका पूरा परिवार अपनी आजीविका और दैनिक खर्चों के लिए इसी जमीन पर पूरी तरह निर्भर था। रामसागर ने इस खेत में बड़े परिश्रम से धान और गन्ने की बुआई की थी। फसलें पककर कटने के लिए तैयार हो रही थीं, लेकिन कटान ने पूरी खेती को बर्बाद कर दिया।
भूमि विहीन हो जाने के बाद अब रामसागर के सामने परिवार का पेट पालने की विकट समस्या पैदा हो गई है। घर का चूल्हा जलाने के लिए उन्हें अब मेहनत-मजदूरी का सहारा लेना पड़ रहा है। उनका कहना है कि पूरे साल की खून-पसीने की कमाई और उम्मीदें इस कटान की भेंट चढ़ चुकी हैं। रूरा सुल्तानपुर के बाशिंदे अब एक दोहरी मार झेल रहे हैं, जहां एक तरफ अपने बचे हुए घरों और जमीनों को बचाने का मानसिक तनाव है, वहीं दूसरी तरफ रोजी-रोटी का जरिया छिन जाने से भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है।

















