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उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में ढलाई कला से बन रहे पीतल के कछुए, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ी मांगभारत
4 अक्तू॰ 2026, 2:43 pm (36 मिनट पहले)· 0

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में ढलाई कला से बन रहे पीतल के कछुए, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ी मांग

मुरादाबाद के कारीगर बारीक नक्काशी वाले पीतल के कछुए तैयार कर रहे हैं, जिनकी वास्तु उपयोगिता के चलते केरल, दक्षिण भारत और विदेशों में भारी मांग है।

उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद शहर अपनी धातु शिल्प कला के लिए पूरी दुनिया में पीतल नगरी के रूप में पहचाना जाता है। यहां पीतल का विशाल स्तर पर व्यापार संचालित होता है, जहां रोजाना अनगिनत कलाकृतियां और उपयोगी वस्तुएं ढाली जाती हैं। इसी कड़ी में स्थानीय कारीगरों ने पीतल के कछुए की एक बेहद आकर्षक और अलंकृत मूर्ति तैयार करना शुरू किया है। इस कछुए की पीठ पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है और अलग-अलग शुभ आकृतियों को उभारा गया है। इस खास कलाकारी के चलते इन मूर्तियों की मांग भारत के कोने-कोने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी लगातार देखी जा रही है। विदेशी खरीदारों की ओर से भी इसके बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं, क्योंकि वास्तु शास्त्र में इस विशेष धातु शिल्प को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

कास्टिंग तकनीक और वास्तु शास्त्र से जुड़ाव

मुरादाबाद के पीतल कारोबारी राघव खन्ना ने बताया कि शहर में पारंपरिक और सजावटी पीतल के उत्पादों के साथ-साथ वास्तु शास्त्र पर आधारित अनेक वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इन्हीं विशेष वस्तुओं में यह नया पीतल का कछुआ शामिल है, जिसे पूरी तरह से मेटल कास्टिंग यानी धातु की ढलाई तकनीक से रूप दिया जाता है। भट्टी में पीतल को पिघलाने और सांचों में ढालने के बाद इसकी सतह पर नक्काशी का काम किया जाता है। राघव खन्ना के अनुसार इस कछुए का मुख्य उपयोग वास्तु नियमों के पालन के लिए होता है। इसे घर की निर्धारित दिशा और वास्तु सिद्धांतों के अनुकूल स्थापित किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार पीतल के इस कछुए को निवास स्थान पर रखने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और कई प्रकार के लाभ मिलते हैं, जिससे इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

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विभिन्न आकार, अंतरराष्ट्रीय बाजार और प्रति किलो कीमत

कारीगर इन मूर्तियों को 6 इंच से लेकर 24 इंच तक के विभिन्न आकारों में तैयार कर रहे हैं। क्षेत्रीय स्तर पर इसकी सर्वाधिक मांग दक्षिण भारत और विशेष रूप से केरल राज्य से निकलकर सामने आ रही है। इसके साथ ही विदेशों में रहने वाले सनातन धर्म के अनुयायी भी अपने घरों और प्रतिष्ठानों के लिए इन मूर्तियों के आर्डर दे रहे हैं। मूल्य निर्धारण की बात करें तो यह मूर्ति 2000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा रही है। कछुए की ऊपरी खोल पर उकेरी गई बारीक नक्काशी सीधे तौर पर वास्तु विधानों से जुड़ी है, जो इसे केवल एक सजावटी वस्तु न बनाकर आध्यात्मिक और वास्तु महत्व का प्रतीक बनाती है।

सवाल-जवाब

मुरादाबाद में पीतल का कछुआ किस तकनीक से बनाया जा रहा है?
इस कछुए को धातु की ढलाई यानी मेटल कास्टिंग तकनीक के जरिए सांचों में तैयार किया जा रहा है।
पीतल के इस कछुए का आकार क्या है?
कारीगर इस कछुए को 6 इंच से लेकर 24 इंच तक के अलग-अलग आकारों में बना रहे हैं।
इस पीतल के कछुए की कीमत क्या तय की गई है?
व्यापारी राघव खन्ना के अनुसार यह मूर्ति 2000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा रही है।
भारत में इस कछुए की सबसे ज्यादा मांग कहां से आ रही है?
देश के भीतर इसकी सर्वाधिक मांग दक्षिण भारत और विशेष रूप से केरल राज्य से देखने को मिल रही है।
विदेशों में इस उत्पाद की मांग मुख्य रूप से कौन कर रहा है?
विदेशों में जहां भी सनातन धर्म से जुड़े लोग निवास कर रहे हैं, वे इस कछुए की मूर्तियां मंगवा रहे हैं।
घर में पीतल का कछुआ रखने का क्या महत्व बताया गया है?
वास्तु शास्त्र के अनुसार इसे सही दिशा में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है और इससे कई लाभ प्राप्त होते हैं।
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