शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का उल्लास शुरू होते ही आजमगढ़ के शहरी और देहाती इलाकों में उत्सव का अनूठा माहौल नजर आने लगता है। त्योहार के आगमन के साथ ही चारों तरफ भव्य और कलात्मक पूजा पंडालों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इन विशाल पंडालों में विधि-विधान से स्थापित होने वाली मां दुर्गा की दिव्य और आकर्षक प्रतिमाएं हर साल श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनती हैं।
रानी की सराय बना मूर्तिकला का सबसे बड़ा केंद्र
जिले भर के पूजा पंडालों में स्थापित होने वाली इन मनमोहक प्रतिमाओं का निर्माण आजमगढ़ के बेहद प्रसिद्ध बाजार रानी की सराय में किया जाता है। मूर्तियों के सबसे बड़े बाजार के रूप में पहचानी जाने वाली इस जगह पर इन दिनों दिन-रात भारी चहल-पहल देखने को मिल रही है। इस बाजार की सबसे खास बात यह है कि यहां स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए कुशल कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
प्रतिमाओं के निर्माण में जुटे ये हुनरमंद कारीगर मिट्टी, पुआल, बांस और प्राकृतिक रंगों के अद्भुत तालमेल से ऐसी मूर्तियां तैयार करते हैं कि श्रद्धालु उन्हें देखते ही रह जाते हैं। दुकानों और कार्यशालाओं में कतारबद्ध सजी ये मूर्तियां पहली ही नजर में भक्तों को आकर्षित कर लेती हैं। उत्सव के कई महीने पहले से ही पश्चिम बंगाल के कोलकाता और महाराष्ट्र से आए दिग्गज मूर्तिकार आजमगढ़ के इस बाजार में डेरा जमा लेते हैं और दिन-रात एक कर प्रतिमाओं को भव्य आकार देने में जुट जाते हैं।
कोलकाता की पारंपरिक नक्काशी और महाराष्ट्र की आधुनिक शैली
कोलकाता से आए कलाकार पारंपरिक बंगाली शैली, तीखे नैन-नक्श और बारीक नक्काशी के लिए जाने जाते हैं। वहीं महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले मूर्तिकार प्रतिमाओं को समकालीन भव्यता, शारीरिक गठन और आकर्षक रंगों की छटा देने में पारंगत हैं। दो अलग-अलग सांस्कृतिक धाराओं और कला शैलियों का यह संगम रानी की सराय में तैयार होने वाली हर मूर्ति को सजीव और अलौकिक बना देता है।
यहां की कलाकारी की ख्याति केवल आजमगढ़ जिले तक ही सीमित नहीं है। पूर्वांचल के सीमावर्ती जिलों जैसे मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और बलिया से पूजा समितियों के पदाधिकारी कई महीने पहले ही रानी की सराय पहुंचकर अपनी पसंदीदा प्रतिमाओं की अग्रिम बुकिंग करवा लेते हैं। हर समिति की कोशिश यही रहती है कि उनके इलाके के पंडाल में स्थापित होने वाली प्रतिमा सबसे अनूठी और भव्य दिखाई दे।
स्मार्टफोन की तस्वीर देखकर हूबहू ढाल रहे स्वरूप
इस प्रसिद्ध बाजार की सबसे आधुनिक विशेषता कस्टमाइज्ड प्रतिमाओं का निर्माण है। आज के दौर में पूजा आयोजक सोशल मीडिया और इंटरनेट से अपनी पसंद की प्रतिमाओं की तस्वीरें फोन में लेकर कारीगरों के पास पहुंचते हैं। अनुभवी मूर्तिकार मोबाइल स्क्रीन पर दिखी तस्वीर का बारीकी से अध्ययन करते हैं और मिट्टी में बिल्कुल वैसा ही रूप उतार देते हैं। चेहरे के कोमल भावों से लेकर वस्त्रों की सलवटों और आभूषणों की बनावट तक में कोई अंतर नजर नहीं आता।
दुर्गा पूजा से छठ महापर्व तक लगातार जारी रहेगी रौनक
रानी की सराय के बाजार की यह गहमागहमी केवल नवरात्र या विजयादशमी तक ही सीमित नहीं रहती। दुर्गा पूजा का विसर्जन संपन्न होते ही कारीगर तुरंत दीपावली के पूजन के लिए मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं गढ़ने में लग जाते हैं। इसके बाद लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के लिए भी विशेष मूर्तियों और पूजन सामग्री की तैयारी शुरू हो जाती है। इस प्रकार दुर्गा पूजा से लेकर छठ तक लगभग दो महीने यह पूरा बाजार खरीदारों, आयोजकों और कारीगरों की भीड़ से गुलजार रहता है।
हर बजट में उपलब्ध, पांच हजार से एक लाख रुपये तक के विकल्प
कीमतों के लिहाज से भी आजमगढ़ का यह बाजार हर वर्ग के आयोजकों के बजट में बैठता है। व्यक्तिगत पूजा या छोटे स्तर के पंडालों के लिए पांच हजार रुपये की शुरुआती कीमत में सुंदर प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। दूसरी ओर, विशाल स्तर पर आयोजन करने वाली समितियों के लिए एक लाख रुपये तक की भव्य और विशालकाय प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। मूर्तियों के आकार, ऊंचाई, मिट्टी की गुणवत्ता और आभूषणों की सजावट के आधार पर दाम तय किए जाते हैं, जिससे हर ग्राहक अपनी पसंद और सामर्थ्य के अनुसार खरीदारी कर पाता है।
















