राजस्थान के पाली शहर की संकरी गलियों में कदम रखते ही धुनाई की जानी-पहचानी आवाजें गूंजती हैं और हवा में रुई के नन्हें कण तैरते दिखाई देते हैं. इस पारंपरिक माहौल के बीच पिंजारा समाज के कारीगर पूरी तन्मयता के साथ सुई और धागे से गद्दों पर बारीक टांके लगाते नजर आते हैं. चारों तरफ ब्रांडेड कंपनियों और रेडीमेड फोम के बिस्तरों की भरमार होने के बाद भी पाली के ये हुनरमंद हाथ अपनी दशकों पुरानी विरासत को पूरी शिद्दत से थामे हुए हैं. सदियों पुराना यह कारीगरी कौशल केवल एक काम नहीं, बल्कि उस समुदाय का गौरव है जिसने कभी मध्य प्रदेश के इंदौर से यहां आकर अपनी नई कर्मभूमि बनाई थी.
इंदौर से पाली तक का ऐतिहासिक सफर
इस हुनर की जड़ें पाली की मिट्टी में कई पीढ़ियों पहले जमी थीं, जब इंदौर से कुछ परिवार पलायन कर यहां पहुंचे थे. शुरुआत में कुछ परिवारों द्वारा शुरू किया गया यह काम धीरे-धीरे पूरे पिंजारा समाज का मुख्य पेशा बन गया और शहर की सांस्कृतिक व व्यापारिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया. स्थानीय लोग जब भी बेजोड़ टिकाऊपन, आरामदायक अहसास और शुद्ध रुई से तैयार बिस्तरों की तलाश करते हैं, तो वे आधुनिक शोरूमों के बजाय सीधे इन्हीं कारीगरों के पास पहुंचते हैं. दशकों बीत जाने पर भी हाथ से बने इन देशी गद्दों पर लोगों का विश्वास अटूट बना हुआ है.
पुरानी मशीनों और सुई-धागे की नायाब जुगलबंदी
जहां आज बड़े-बड़े कॉर्पोरेट कारखाने पूरी तरह ऑटोमैटिक संयंत्रों के जरिए गद्दे और बिस्तर तैयार कर रहे हैं, वहीं पाली का पिंजारा समाज आज भी अपनी दशकों पुरानी, जंग लगी पारंपरिक मशीनों के सहारे काम कर रहा है. इन विंटेज मशीनों के जरिए रुई की बारीक धुनाई की जाती है, ताकि उसकी परतें एक समान और गांठ रहित बन सकें. इसके तुरंत बाद कुशल कारीगर मजबूत धागों और बड़ी सुइयों के सहारे रुई की परतों को गद्दों और तकियों का रूप देते हैं. हाथों से खिंचे टांकों की मजबूती और मखमली मुलायमता ऐसी होती है कि ये बिस्तर कई सालों के इस्तेमाल के बाद भी अपनी बनावट और आराम बनाए रखते हैं.
कड़ी मेहनत और घटते मुनाफे से नई पीढ़ी का मोहभंग
औद्योगिक बदलावों और बदलती जीवनशैली के बीच इस समृद्ध विरासत के सामने अब अस्तित्व का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. समुदाय के बुजुर्गों और अनुभवी कारीगरों का मानना है कि दिन-रात रुई की धूल के बीच भारी शारीरिक मशक्कत करने के बावजूद उतना मुनाफा नहीं मिल पाता, जिससे युवा आकर्षित हो सकें. युवाओं की बदलती प्राथमिकताओं और बाजार में आसान रेडीमेड विकल्पों की वजह से अगली पीढ़ी इस हुनर को अपनाने से कतराने लगी है. कारीगरों को डर है कि उनके बाद शायद यह कला सिर्फ किस्सों और इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी. इसके बावजूद, जब तक बुजुर्गों के हाथों में सुई और धागा है, वे हर एक टांके के साथ अपनी इस बेशकीमती सांस्कृतिक विरासत को पूरी निष्ठा से संभाले हुए हैं.


















