उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी हलचलें अभी से तेज होने लगी हैं। इसी क्रम में देवरिया में आयोजित एक जनसभा के दौरान सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने राज्य के पुनर्गठन को लेकर बड़ा बयान देकर नई बहस छेड़ दी। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश को बहुत जल्द चार अलग-अलग राज्यों में विभाजित किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि पूर्वांचल राज्य के अस्तित्व में आने के बाद राजभर समाज का बेटा वहां का मुख्यमंत्री बनेगा। राजभर के इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने तुरंत मोर्चा खोल दिया और उनके दावे को सिरे से खारिज कर दिया।
चुनावी जुमला बताकर बृजभूषण शरण सिंह ने किया पलटवार
पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने ओम प्रकाश राजभर के दावे पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे केवल चुनावी जुमला और बिना सोचे-समझे की गई बयानबाजी करार दिया। उन्होंने कहा कि मंच से अक्सर राजनेता ऐसी बातें बोल जाते हैं, लेकिन न तो केंद्र सरकार और न ही योगी सरकार की ऐसी कोई योजना या मंशा है। बृजभूषण शरण सिंह ने जोर देकर कहा कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश का असली दबदबा उसकी 80 लोकसभा सीटों की एकजुट ताकत की वजह से है। देश की राजधानी दिल्ली की सत्ता का रास्ता हमेशा लखनऊ और उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। अगर राज्य का विभाजन होता है, तो राष्ट्रीय राजनीति में इसका यह विशाल राजनीतिक प्रभाव बिखर जाएगा और राज्य की ताकत कमजोर पड़ जाएगी।
मायावती सरकार का 2011 वाला प्रस्ताव और संवैधानिक स्थिति
उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में विभाजित करने की मांग का इतिहास काफी पुराना है। नवंबर 2011 में जब बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश विधानसभा से राज्य को चार अलग-अलग भागों में बांटने का आधिकारिक प्रस्ताव पारित करवाया था। उस प्रस्ताव में राज्य को पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश जिसे हरित प्रदेश भी कहा जाता है, अवध प्रदेश और बुंदेलखंड में पुनर्गठित करने की सिफारिश की गई थी। उस दौरान राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मौजूद समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही दलों के नेताओं ने इस विभाजनकारी प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वही पुराना मसला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
संवैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 यह स्पष्ट करता है कि किसी भी नए राज्य के निर्माण, उसकी सीमाओं में फेरबदल या राज्यों के पुनर्गठन का पूर्ण और अंतिम अधिकार केवल देश की संसद के पास सुरक्षित है। राज्य विधानसभा द्वारा पारित किया गया कोई भी प्रस्ताव मात्र एक सलाह या सिफारिश की हैसियत रखता है, जिसे मानना केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होता। यदि केंद्र सरकार चाहे तो संसद के दोनों सदनों में साधारण बहुमत से नया विधेयक पारित कराकर मायावती सरकार के उस पुराने प्रस्ताव को कानूनी रूप दे सकती है या पुनर्गठन का कोई नया ढांचा तैयार कर सकती है। हालांकि, केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार को आए 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं और यदि सरकार की ऐसी कोई मंशा होती तो यह कदम अब तक उठाया जा चुका होता।
चार राज्यों में बंटवारे से किसको नफा और किसको नुकसान
यदि भविष्य में कभी उत्तर प्रदेश का चार स्वतंत्र राज्यों में पुनर्गठन किया जाता है, तो पूरे भूभाग का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ताना-बाना पूरी तरह से बदल जाएगा। अलग-अलग क्षेत्रों में नए राजनीतिक समीकरण उभरेंगे
- पश्चिम प्रदेश अथवा हरित प्रदेश: इस क्षेत्र के अलग राज्य बनने से राष्ट्रीय लोक दल, समाजवादी पार्टी और स्थानीय किसान वर्ग को सीधा राजनीतिक लाभ मिल सकता है। जाट, मुस्लिम और किसान समीकरण के मजबूत होने से क्षेत्रीय ताकतों का वर्चस्व बढ़ेगा, जबकि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की पकड़ कमजोर होने पर उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
- पूर्वांचल राज्य: पूर्वांचल के अलग राज्य बनने की स्थिति में राजभर, निषाद, यादव और दलित मतदाताओं के मजबूत संख्याबल के दम पर छोटे क्षेत्रीय दल किंगमेकर की भूमिका में आ जाएंगे और मुख्यमंत्री पद पर सीधे दावेदारी ठोकेंगे। हालांकि, इससे केंद्र में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों के एकमुश्त सामूहिक प्रभाव में भारी कमी आएगी।
- बुंदेलखंड राज्य: आर्थिक और औद्योगिक रूप से पिछड़ा क्षेत्र होने की वजह से बुंदेलखंड राज्य को अपनी वित्तीय जरूरतों और विकास परियोजनाओं के लिए लंबे समय तक केंद्र सरकार की आर्थिक मदद पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
- अवध प्रदेश: मध्य उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में लखनऊ केंद्रित प्रशासनिक तंत्र होने और पारंपरिक वोट बैंक की मौजूदगी के चलते राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का मजबूत प्रभाव पहले की तरह बरकरार रहने की संभावना है।
क्षेत्रीय अस्मिता बनाम अखंड उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ओम प्रकाश राजभर का पूर्वांचल और छोटे राज्यों के निर्माण का मुद्दा उठाना असल में अति-पिछड़े वर्गों और क्षेत्रीय जनाधार को अपने पाले में एकजुट करने की सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। वे इन सामाजिक समूहों को सत्ता में सीधी हिस्सेदारी का सपना दिखाकर लामबंद करना चाहते हैं। इसके विपरीत, बृजभूषण शरण सिंह की तीखी प्रतिक्रिया यह साफ दर्शाती है कि भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा और प्रभावशाली धड़ा उत्तर प्रदेश की भौगोलिक अखंडता बनाए रखने के पक्ष में है। वे मानते हैं कि 80 सीटों की यह राष्ट्रीय राजनीतिक धुरी ही राज्य को केंद्र की सत्ता का सबसे निर्णायक कारक बनाती है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते यह पूरा घटनाक्रम ‘क्षेत्रीय अस्मिता बनाम अखंड मजबूत उत्तर प्रदेश’ की राजनीतिक बहस को और ज्यादा धार देने का काम करेगा।





















