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उत्तराखंड में जमीन डोलने से आधा मिनट पहले सायरन बजाकर अलर्ट कर रहा भू देव ऐपउत्तराखंड
8 अक्तू॰ 2026, 9:53 pm (29 दिन पहले)· 1

उत्तराखंड में जमीन डोलने से आधा मिनट पहले सायरन बजाकर अलर्ट कर रहा भू देव ऐप

आईआईटी रुड़की और राज्य सरकार द्वारा तैयार भू देव ऐप ने चमोली के 4.9 तीव्रता वाले भूकंप में लोगों को झटके आने से 20 से 30 सेकंड पहले सतर्क कर सुरक्षित निकलने का मौका दिया।

हिमालयी राज्य उत्तराखंड में भूगर्भीय हलचल के बीच तकनीक अब आपदा से निपटने में ढाल बनकर सामने आ रही है। हाल ही में 6 अक्टूबर को चमोली जिले के थराली इलाके में 4.9 तीव्रता का जब तेज भूकंप दर्ज किया गया, तो वहां के निवासियों को तेज झटके महसूस होने से करीब 20 से 30 सेकंड पहले ही चेतावनी मिल गई। समय रहते मिले इस पूर्व संकेत ने लोगों को इमारतों से निकलकर खुली जगहों पर जाने की बहुमूल्य मोहलत दी, जिससे भारी खतरे को टाला जा सका। यह त्वरित चेतावनी प्रणाली मोबाइल पर काम करने वाले 'भू देव ऐप' के जरिए संभव हो पाई है।

आईआईटी रुड़की और सरकार की संयुक्त पहल

पहाड़ी क्षेत्र में भूकंप के गंभीर खतरे को देखते हुए उत्तराखंड राज्य सरकार ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) के साथ मिलकर इस खास अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को तैयार किया है। इस डिजिटल सुरक्षा प्लेटफॉर्म को वर्ष 2021 में विकसित किया गया था। यह प्रणाली भविष्य में होने वाले भूकंप की भविष्यवाणी नहीं करती, बल्कि जमीन के भीतर हलचल शुरू होते ही सक्रिय हो जाती है। यह सतह पर पहुंचने वाली विनाशकारी तरंगों से पहले ही नेटवर्क पर संकेत पकड़ लेती है, जिससे मुख्य झटके पहुंचने से 20 से 30 सेकंड पहले फोन पर तेज सायरन बजने लगता है।

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बीते 22 महीनों में 52 बार डोली जमीन

उत्तराखंड के आंकड़े बताते हैं कि बीते 22 महीनों के दौरान यहां कुल 52 बार भूकंपीय झटके दर्ज किए गए हैं। इन सभी घटनाओं में सबसे अधिक तीव्रता 6 अक्टूबर को थराली में आए भूकंप की ही रही, जिसकी माप 4.9 थी। इस भूकंप के झटके इतने प्रभावी थे कि इनका असर उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर तक अनुभव किया गया। इतनी कम अवधि में 52 बार धरती हिलने से भू-वैज्ञानिकों और शासन-प्रशासन के बीच चिंता की स्थिति बनी हुई है।

हिमालयी फॉल्ट लाइन और उत्तराखंड का भौगोलिक संकट

उत्तराखंड के अत्यधिक भूकंप संवेदनशील क्षेत्र में आने की मुख्य वजह इसका सक्रिय टेक्टोनिक जोन में स्थित होना है। वैज्ञानिक संरचना के अनुसार राज्य के भूगर्भ से मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट जैसी बड़ी फॉल्ट लाइनें गुजरती हैं। भूगर्भीय अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि बीते दौर में आए ज्यादातर बड़े भूकंपों के केंद्र इसी मेन सेंट्रल थ्रस्ट के निकट रहे हैं। उत्तराखंड का लगभग पूरा भूभाग इसी मेन सेंट्रल थ्रस्ट के ऊपर बसा है, जिसके कारण यहां जमीन के भीतर तनाव बढ़ने पर तेज कंपन का जोखिम हमेशा बना रहता है।

सवाल-जवाब

भू देव ऐप को किसने और कब विकसित किया?
इस ऐप को उत्तराखंड राज्य सरकार के सहयोग से आईआईटी रुड़की ने वर्ष 2021 में विकसित किया था।
यह ऐप भूकंप आने से कितने समय पहले चेतावनी देता है?
यह ऐप मुख्य विनाशकारी झटके पहुंचने से 20 से 30 सेकंड पहले मोबाइल पर तेज सायरन बजाकर अलर्ट भेजता है।
6 अक्टूबर को आए भूकंप की तीव्रता कितनी थी और इसका केंद्र कहां था?
6 अक्टूबर को आए भूकंप की तीव्रता 4.9 दर्ज की गई थी और इसका असर चमोली जिले के थराली क्षेत्र में देखा गया।
पिछले 22 महीनों में उत्तराखंड में कुल कितने भूकंप दर्ज किए गए?
राज्य में बीते 22 महीनों के दौरान कुल 52 भूकंप दर्ज किए जा चुके हैं।
उत्तराखंड के नीचे से कौन सी प्रमुख भूगर्भीय संरचनाएं गुजरती हैं?
उत्तराखंड के नीचे से मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट जैसी प्रमुख फॉल्ट लाइनें गुजरती हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·28 दिन पहले

सिर्फ़ तीस सेकंड का वक़्त, पर सोचकर ही दिल बैठ जाता है कि इतने कम समय में इंसान क्या-क्या बचाएगा। तकनीक अपनी जगह है, पर पहाड़ों पर रहना वाकई हर पल एक इम्तिहान है।

Ravikash Gupta@ravikash·28 दिन पहले

तीस सेकंड भी जान बचाने के लिए बहुत होते हैं। तकनीक का ऐसा इस्तेमाल हर पहाड़ी राज्य में होना चाहिए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·28 दिन पहले

रविकेश जी, बात बिल्कुल सही है आपकी। पर क्या ये ऐप पहाड़ी इलाकों में कम नेटवर्क वाले दूरदराज के गांवों में भी ठीक से काम कर पाएगा?

Rohan Verma@rohan-verma·28 दिन पहले

तकनीक का ऐसा इस्तेमाल वाकई जान बचा सकता है। तीस सेकंड का समय भी बहुत होता है जब बात भागकर बाहर निकलने की हो।

Karan Malhotra@karan-malhotra·28 दिन पहले

रोहन जी, बात सही है आपकी। पिछले बयालीस महीनों में आए बानवे भूकंपों को देखते हुए ये तीस सेकंड वाकई जान बचा सकते हैं, खासकर जब बात मुख्य केंद्रीय थ्रस्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की हो।

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