महाराष्ट्र राज्य में मुंबई के समीपवर्ती वसई क्षेत्र से एक सनसनीखेज कॉरपोरेट अपराध का मामला सामने आया है, जहां एक कंपनी के भीतर जारी वित्तीय विवाद ने खूनी रूप ले लिया। जीएसएम फॉइल्स कंपनी के प्रबंध निदेशक मोहनसिंह परमार पर नाइकपाड़ा इलाके में दिनदहाड़े गोलीबारी की गई। हालांकि, हमले के दौरान हथियार जाम हो जाने की वजह से अधिकारी की जान बच गई। मामले की पड़ताल कर रही पुलिस टीम जब साजिश की तह तक पहुंची तो पता चला कि यह हमला किसी बाहरी प्रतिद्वंद्वी ने नहीं, बल्कि कंपनी के ही 33 वर्षीय सह अध्यक्ष सागर भनुशाली ने प्रायोजित कराया था। शेयर बाजार में हुए भारी वित्तीय नुकसान और करोड़ों रुपये के कर्ज के दबाव में आकर इस पूरे हत्याकांड का ताना-बाना बुना गया था।
नाइकपाड़ा में दिनदहाड़े गोलीबारी और गन जाम होना
मुंबई से सटे वसई के नाइकपाड़ा इलाके में 26 जुलाई की दोपहर को उस समय हड़कंप मच गया जब दो अज्ञात मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने सड़क पर जा रहे मोहनसिंह परमार को अचानक निशाना बना लिया। हमलावरों ने बहुत करीब से निशाना साधकर गोलियां चलाईं, जिनमें से एक गोली सीधे परमार के कंधे में जा लगी। पहला फायर लगते ही हमलावरों ने उन्हें पूरी तरह से खत्म करने के इरादे से दूसरी गोली चलाने का प्रयास किया। हालांकि, ठीक उसी क्षण उनकी पिस्टल में तकनीकी खराबी आ गई और हथियार जाम हो गया। निशाना चूकने और पिस्टल लॉक हो जाने के कारण हमलावर घबरा गए और तुरंत अपनी बाइक पर सवार होकर मौके से फरार हो गए।
घटना के तुरंत बाद आसपास के लोगों और स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों की मदद से घायल अवस्था में परमार को नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने त्वरित इलाज शुरू किया, जिसके बाद उनकी स्थिति को स्थिर और खतरे से बाहर बताया गया है। शुरुआती चरण में ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह किसी स्थानीय रंजिश या व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम हो सकता है, लेकिन पुलिस की गहन छानबीन में कंपनी के निदेशक मंडल के आंतरिक समीकरण उजागर हो गए।
शेयर बाजार में 55 करोड़ का नुकसान और 32 करोड़ की देनदारी
जांचकर्ताओं द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार, इस हमले के पीछे मुख्य वजह सागर भनुशाली का गहरा आर्थिक संकट था। 33 वर्षीय सह अध्यक्ष सागर भनुशाली शेयर बाजार में आक्रामक ट्रेडिंग के दौरान लगभग 55 करोड़ रुपये की भारी रकम गंवा चुके थे। बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के कारण उन पर विभिन्न कर्जदाताओं का भारी दबाव बनने लगा था और वह कई लोगों की उधारी चुकाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं थे। कर्ज के इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए उन्होंने जीएसएम फॉइल्स में मौजूद अपनी हिस्सेदारी को बेचने का रास्ता तलाशना शुरू किया।
कंपनी से जुड़ी वित्तीय देनदारियों का दायरा करीब 32 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। भनुशाली ने प्रबंध निदेशक मोहनसिंह परमार पर लगातार दबाव बनाया कि वह उनकी कंपनी की पूरी हिस्सेदारी लगभग 32 करोड़ रुपये में खरीद लें। जब परमार ने इतनी बड़ी रकम में हिस्सेदारी खरीदने से इनकार कर दिया या सौदे पर सहमति नहीं बनी, तो भनुशाली ने एक खौफनाक रास्ता चुना। पुलिस का मानना है कि भनुशाली को लगा कि यदि परमार रास्ते से हट जाते हैं, तो उन पर से 32 करोड़ रुपये चुकाने की बाध्यता खत्म हो जाएगी और वह कंपनी के प्रबंधन तथा संपत्तियों पर एकाधिकार स्थापित कर लेंगे।
40 लाख रुपये में सुपारी और 5 लाख रुपये का एडवांस
पुलिस की तफ्तीश में यह बात साफ तौर पर सामने आई कि यह हमला अचानक किसी तात्कालिक गुस्से का नतीजा नहीं था, बल्कि इसे हफ्तों की पूर्व-नियोजित योजना के तहत अंजाम दिया गया था। सह अध्यक्ष सागर भनुशाली ने प्रबंध निदेशक को रास्ते से हटाने के लिए पेशेवर सुपारी किलर का सहारा लिया था। पूरी साजिश को अमलीजामा पहनाने के लिए हमलावरों के साथ 40 लाख रुपये की मोटी रकम में सौदा तय किया गया था।
कार्रवाई को आगे बढ़ाने और हमलावरों का भरोसा जीतने के लिए सौदे की कुल राशि में से 5 लाख रुपये बतौर एडवांस पेशगी के रूप में पहले ही दे दिए गए थे। अग्रिम भुगतान मिलने के बाद हमलावरों ने मोहनसिंह परमार की गतिविधियों पर नजर रखना शुरू किया और 26 जुलाई को नाइकपाड़ा के पास मौका पाते ही हमला बोल दिया। नकदी के इस लेन-देन और पूर्व योजना ने मामले को एक गंभीर कॉरपोरेट सुपारी हत्याकांड की श्रेणी में ला खड़ा किया है।
उत्तर प्रदेश से मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी और पुलिस का बयान
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय पुलिस ने विशेष टीमों का गठन किया। तकनीकी निगरानी, मोबाइल लोकेशन ट्रेसिंग और गुप्त सूचनाओं के आधार पर पुलिस की एक टीम ने उत्तर प्रदेश में छापेमारी कर मुख्य साजिशकर्ता सागर भनुशाली को धर दबोचा। इसके अलावा, हमले की साजिश में शामिल छह अन्य संदिग्ध आरोपियों को भी अलग-अलग स्थानों से हिरासत में लिया गया है, जिससे इस केस में कुल गिरफ्तारियों की संख्या सात हो गई है।
मामले के संबंध में जानकारी देते हुए अतिरिक्त पुलिस आयुक्त संजय शिंत्रे ने बताया, "सागर भनुशाली ने परमार की हत्या की साजिश इस सोच के साथ रची कि इससे उसकी वित्तीय देनदारी खत्म हो जाएगी और कंपनी पर उसका नियंत्रण भी बढ़ जाएगा।" पुलिस अब इस बात की कड़ियों को जोड़ रही है कि हमलावरों से संपर्क स्थापित करने में बिचौलिया कौन था और पैसों का हस्तांतरण किस माध्यम से किया गया।
डिजिटल और वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर आगे की तफ्तीश
जांच एजेंसी अब इस पूरे प्रकरण को सिर्फ एक गोलीबारी कांड के रूप में नहीं देख रही है, बल्कि इसके पीछे छुपे व्यापक कॉरपोरेट और वित्तीय अपराधों के पहलुओं को खंगाल रही है। पुलिस वैज्ञानिक, तकनीकी, डिजिटल और फॉरेंसिक सबूतों को एकत्र करने में जुटी है। आरोपियों के मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), डिजिटल गतिविधियों, बैंक खातों के लेनदेन और आपसी बातचीत के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
जांच अधिकारी यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस बड़ी साजिश में कंपनी के कुछ अन्य लोग या बाहरी मददगार भी शामिल थे। सात आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद अब मुख्य सवाल यही बना हुआ है कि शेयर बाजार का 55 करोड़ रुपये का घाटा और 32 करोड़ रुपये का कर्ज किस तरह दो व्यावसायिक साझीदारों के रिश्तों में इतनी कड़वाहट ले आया कि बात जान लेने तक पहुंच गई। परमार की किस्मत अच्छी थी कि पिस्टल जाम होने से उनकी जान बच गई, लेकिन इस घटना ने कॉरपोरेट जगत में बढ़ते वित्तीय तनाव के खतरनाक परिणामों को उजागर कर दिया है।



















