ब्रजभूमि वृंदावन में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। शरद पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर, जिसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी पुकारा जाता है, ठाकुर बांके बिहारी अपने भक्तों को एक बेहद अलौकिक रूप में दर्शन देते हैं। वर्ष में केवल इसी एक रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण अपने हाथ में मुरली लिए महारास की दिव्य मुद्रा में प्रकट होते हैं। इस अनुपम छवि को निहारने के लिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु वृंदावन की कुंज गलियों में खिंचे चले आते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस खास दिन भगवान के इस मनोहारी स्वरूप का दीदार करने से भक्तों को सीधे लक्ष्मी नारायण की असीम अनुकंपा प्राप्त हो जाती है।
साल में केवल एक रात्रि का अद्भुत महारास श्रृंगार
सामान्य दिनों में ठाकुर बांके बिहारी के हाथों में बंशी दिखाई नहीं देती, परंतु शरद पूर्णिमा का अवसर इस नियम का अपवाद है। इस पुण्य तिथि पर भगवान को मोर मुकुट पहनाया जाता है और उनका संपूर्ण सोलह श्रृंगार किया जाता है। आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में ठाकुरजी चमचमाते चांदी के भव्य सिंहासन पर आसीन होते हैं। उनके तन पर श्वेत रंग की विशेष जड़ाऊ पोशाक सुशोभित होती है तथा वे सोने व चांदी के बहुमूल्य आभूषणों से अलंकृत किए जाते हैं। जैसे ही आकाश से चंद्रमा की शीतल धवल किरणें मंदिर परिसर और ठाकुरजी के विग्रह पर पड़ती हैं, समूचा गर्भगृह एक अद्भुत आभा से जगमगा उठता है। उस समय पूरा मंदिर परिसर बांके बिहारी के गूंजते जयकारों से भक्तिमय हो जाता है। इस पुनीत बेला में ठाकुरजी को विशेष रूप से स्वादिष्ट खीर और चंद्रकला मिष्ठान्न का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
भागवत महापुराण और यमुना तट पर रचा महारास
आश्विन पूर्णिमा को रास पूर्णिमा कहे जाने के पीछे गहरा आध्यात्मिक और पौराणिक रहस्य छिपा हुआ है। श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रसंगों में वर्णित है कि इसी रात को भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना के पावन पुलिन पर गोपियों की भक्ति से मुग्ध होकर महारास का सृजन किया था। जीवात्मा और परमात्मा के इस मिलन को ही महारास की संज्ञा दी गई है। शरद पूर्णिमा पर ठाकुरजी बंशी धारण कर उसी ऐतिहासिक महारास की पावन स्मृति को जीवंत कर देते हैं। यही वजह है कि श्रद्धालु इस अद्वितीय दर्शन का पुण्य प्राप्त करने के लिए पूरे बारह महीने उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं।
वृंदावन के सप्त निधि मंदिरों में भी श्वेत आभा का उत्सव
बांके बिहारी मंदिर के अतिरिक्त वृंदावन के अत्यंत प्राचीन एवं प्रतिष्ठित सप्त निधि मंदिरों में भी शरद पूर्णिमा का पर्व अत्यंत भव्यता के साथ संपन्न किया जाता है। इन प्रतिष्ठित देवालयों में श्री राधा मदन मोहन जी, श्री गोविंद देव जी, श्री राधा गोपीनाथ जी, श्री राधा रमण लाल जी, श्री राधा वल्लभ लाल जी, श्री राधा दामोदर जी तथा श्री राधा श्यामसुंदर जी के मंदिर प्रमुख हैं। शरद ऋतु के स्वागत में इन सभी सात मंदिरों में भी ठाकुरजी को धवल श्वेत परिधान धारण कराए जाते हैं। विभिन्न मंदिरों में महारास प्रसंग की स्मृति में संकीर्तन, पद गायन और सांस्कृतिक अनुष्ठानों की श्रृंखला आयोजित होती है, जिससे संपूर्ण ब्रज क्षेत्र उत्सव के रंग में सराबोर नजर आता है।
चंद्र किरणों में अमृत वर्षा और खुले गगन तले खीर
शरद पूर्णिमा की रात्रि में खुले आकाश के नीचे खीर रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी इस विधान की विस्तृत चर्चा मिलती है, जिसके तहत इस दिन खीर बनाकर ईष्ट देवों को भोग लगाने का नियम है। हिंदू धर्म में खीर को पवित्रता और समृद्धि का प्रमुख परिचायक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा का दिन माता महालक्ष्मी के प्राकट्य दिवस के रूप में भी वंदनीय है, और देवी लक्ष्मी को खीर अत्यंत प्रिय है। इसी कारण देवी को प्रसन्न करने के लिए घर-घर में यह मिष्ठान्न तैयार किया जाता है। जनविश्वास है कि इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है और उसकी किरणों से आकाश से अमृत तत्व टपकता है। जब खीर को पूरी रात चांदनी के नीचे रखा जाता है, तो उसमें यह प्राकृतिक आरोग्यवर्धक और औषधीय ऊर्जा समाहित हो जाती है, जिसे अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से परिवार में सुख, शांति और उत्तम स्वास्थ्य का वास होता है।























