देश के विभिन्न हिस्सों में हालिया दिनों में सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों की नई लहर देखने को मिल रही है। अलग-अलग मंचों से नए धरनों, रैलियों और तिरंगा यात्राओं के आह्वान किए जा रहे हैं। इन आयोजनों में शामिल आयोजकों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत अपनी आवाज उठा रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष और आलोचक इसे सामान्य जन आंदोलन मानने से इनकार कर रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों का विरोध करने के बहाने असल राजनीतिक निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साधा जा रहा है। इस खींचतान के बीच विदेशी एजेंसियों, डीप स्टेट और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्कों की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सड़क से अदालत तक खिंची कानूनी और राजनीतिक रस्साकशी
विरोध प्रदर्शनों का यह पूरा घटनाक्रम अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंच चुका है। विपक्षी खेमे ने कई कानूनी मुद्दों को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां कानूनी दलीलों के दौरान उन्हें तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों की ओर से दायर मामलों में कानूनी प्रक्रिया के दौरान सरकार द्वारा माफी मांगने के दावों पर भी व्यापक बहस छिड़ गई है। अदालत में हुई सुनवाई के बाद दोनों पक्षों के बीच बयानों की जंग और तेज हो गई है, जिसमें याचिकाकर्ताओं को अपनी ही रणनीति पर बैकफुट पर आते देखा गया है।
तिहाड़ जेल में बंद कार्यकर्ताओं का मामला और आगे की कार्रवाई के संकेत
कथित रूप से कॉकरोच पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक माहौल काफी गरमा गया है। सौरव दास और आशुतोष रांका को हाल ही में न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया था, जहां उनकी कानूनी स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या इस मामले से जुड़े अन्य कार्यकर्ताओं, विशेषकर अभिजीत दीपके पर भी जल्द कानूनी शिकंजा कस सकता है। दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंडिया और एमनेस्टी इंटरनेशनल की ओर से सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी पर उठाई गई आपत्तियों ने इस मुद्दे को वैश्विक मंच पर भी चर्चा में ला दिया है। आलोचकों का आरोप है कि घरेलू विरोध प्रदर्शनों को विदेशों से समर्थन और हवा दी जा रही है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखी तकरार और अंतरराष्ट्रीय मॉडल की चर्चा
विपक्षी खेमे द्वारा आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान माहौल उस समय बेहद तनावपूर्ण हो गया जब मीडिया और उपस्थित लोगों ने नेताओं से तीखे सवाल पूछे। इस प्रेस वार्ता में अभिजीत दीपके, नेहा बोरा, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अभिनेता प्रकाश राज शामिल थे। कार्यक्रम के दौरान नेहा बोरा से उनके पूर्व बयानों और टी-शर्ट पर छपे प्रतीकों को लेकर सवाल किए गए, जिनकी तुलना नेपाल और इंडोनेशिया में हुए हिंसक प्रदर्शनों के प्रतीकों से की जा रही थी। आलोचकों का कहना है कि जिस तरह पड़ोसी देश बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हुए जनआंदोलनों के बाद शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट हुआ, ठीक उसी तरह के अशांति वाले मॉडल को भारत में दोहराने की कोशिश की जा रही है।
सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक मर्यादा बनाम विरोध की नई सीमाएं
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के कथित ऑडियो और उनके बयानों को लेकर भी विवाद छिड़ा हुआ है, जिसमें रिजीम चेंज यानी व्यवस्था और सत्ता परिवर्तन की बातें कही गई थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सत्ता का परिवर्तन केवल स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से ही संभव है, न कि सड़कों पर दबाव बनाकर या अराजकता फैलाकर। चुनाव में लगातार मिल रही पराजय के बाद ऐसे हथकंडों के इस्तेमाल के आरोप लगाए जा रहे हैं। जनता के बीच भी इस मुद्दे को लेकर प्रतिक्रिया देखने को मिली है, जहां एयरपोर्ट पर कार्यकर्ताओं के खिलाफ नारेबाजी की घटनाएं सामने आई हैं।






















