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पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले नंदीग्राम और रेजीनगर में तृणमूल कांग्रेस बैकफुट पर, सुवेंदु अधिकारी की घेराबंदी ने बढ़ाई ममता बनर्जी की मुश्किलेंपश्चिम बंगाल
19 सित॰ 2026, 1:50 pm (40 दिन पहले)· 0

पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले नंदीग्राम और रेजीनगर में तृणमूल कांग्रेस बैकफुट पर, सुवेंदु अधिकारी की घेराबंदी ने बढ़ाई ममता बनर्जी की मुश्किलें

पश्चिम बंगाल में आगामी उपचुनाव से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है, जहां नंदीग्राम के बाद रेजीनगर से भी पार्टी उम्मीदवारों ने मैदान छोड़ने की बात कही है।

पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में मतदान की तारीख नजदीक आते ही राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे हैं। राज्य की दो अहम विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के भीतर मची हलचल ने पूरे सत्ताधारी खेमे को सकते में डाल दिया है। नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी के अचानक कदम पीछे खींचने के सिर्फ चौबीस घंटे के भीतर रेजीनगर सीट पर भी चुनावी तस्वीर पूरी तरह उलट गई। रेजीनगर से तृणमूल कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी रबीउल आलम चौधरी द्वारा मैदान से हटने की बात सामने आने से पार्टी संगठन के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम को राज्य की राजनीति में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी के बीच चल रही वर्चस्व की दूसरी बड़ी जंग माना जा रहा है, जिसमें फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के नेता का पलड़ा काफी मजबूत दिखाई दे रहा है। हालांकि इस अप्रत्याशित झटके के बाद तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता भी अपनी नई रणनीति तैयार करने में जुट गई हैं।

उपचुनाव से ठीक पहले उम्मीदवारों के पीछे हटने का घटनाक्रम

निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होना तय है, जबकि वोटों की गिनती 9 अक्टूबर को की जाएगी। मतदान दिवस में लगभग एक महीने का समय शेष रहते सत्ताधारी दल के प्रत्याशियों का इस अंदाज में मैदान छोड़ देना राज्य भर में चर्चा का केंद्र बन गया है। इस सिलसिले की शुरुआत शुक्रवार को हुई, जब नंदीग्राम से तृणमूल कांग्रेस की अधिकृत उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अचानक अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। सबसे ज्यादा हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि अपना पर्चा वापस लेने से केवल कुछ ही घंटे पहले उन्होंने राज्य सचिवालय नबन्ना जाकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भेंट की थी, और उसी दौरान उनकी मुलाकात नंदीग्राम के विधायक तथा नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी से भी हुई थी। इस अहम बैठक के फौरन बाद प्रत्याशी का नाम वापस लेना राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयासों को जन्म दे रहा है।

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रेजीनगर में भी तृणमूल कांग्रेस को झटका, बीजेपी को बढ़त

नंदीग्राम के चौंकाने वाले फैसले से तृणमूल कांग्रेस संभल भी नहीं पाई थी कि मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर सीट से भी पार्टी के लिए बुरी खबर आ गई। वहां से पार्टी के घोषित उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने भी चुनावी मुकाबले से अलग होने का ऐलान कर दिया। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने रेजीनगर विधानसभा सीट से शाखारव सरकार पर दांव लगाया है। तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी के मैदान से हट जाने के कारण अब शाखारव सरकार के सामने मुकाबला बेहद एकतरफा होता दिख रहा है, जिससे उन्हें बिना कड़े संघर्ष के सीधी बढ़त मिलने के आसार बन गए हैं। एक के बाद एक दो सीटों पर प्रत्याशियों का इस तरह पीछे हटना सत्ताधारी दल की चुनावी तैयारियों पर सीधे तौर पर सवाल खड़े कर रहा है।

ममता बनाम सुवेंदु की सियासी जंग का पुराना इतिहास

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस टकराव की जड़ें साल 2021 के ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव से जुड़ी हुई हैं। उस वक्त नंदीग्राम की बेहद चर्चित सीट पर सुवेंदु अधिकारी ने खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनावी शिकस्त देकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। उस चुनावी नतीजे के बाद से ही सुवेंदु अधिकारी राज्य के भीतर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के सबसे प्रखर और सीधे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे। अब 2026 के इस दौर में उपचुनाव की घोषणा के साथ ही उम्मीदवारों के इस तरह अप्रत्याशित रूप से मैदान छोड़ने से बंगाल की राजनीति में नए समीकरण आकार लेने लगे हैं।

गिरता कैडर मनोबल और अंदरूनी खींचतान की चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक मतदान से काफी पहले प्रत्याशियों का इस तरह हाथ खड़े कर देना तृणमूल कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं और कैडर के घटते आत्मविश्वास की ओर इशारा करता है। इस सियासी घटनाक्रम ने यह भी साबित कर दिया है कि दक्षिण बंगाल के अपने प्रभाव वाले इलाकों में सुवेंदु अधिकारी की पकड़ आज भी बेहद मजबूत है। पार्टी के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि संगठन के भीतर जारी कलह, स्थानीय गुटबाजी और बगावती तेवरों की वजह से उम्मीदवार बेहद असहज महसूस कर रहे थे। इसके विपरीत, इन दोनों सीटों पर मिली शुरुआती रणनीतिक बढ़त ने आगामी सियासी लड़ाइयों के लिए भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी जोश भर दिया है।

तृणमूल कांग्रेस के सामने गढ़ बचाने की कड़ी परीक्षा

अपने पारंपरिक और भरोसेमंद सियासी इलाकों में पकड़ बनाए रखना अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती बन चुका है। सुवेंदु अधिकारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल अपनी विधानसभा सीट की रक्षा करने में ही सक्षम नहीं हैं, बल्कि विरोधी खेमे को बड़ी रणनीतिक शिकस्त देने की ताकत भी रखते हैं। पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को होने वाली वोटिंग से पहले सत्ताधारी दल के प्रत्याशियों का यह कदम साफ दर्शाता है कि नेता प्रतिपक्ष की राजनीतिक घेराबंदी तृणमूल कांग्रेस के अभेद्य माने जाने वाले दुर्ग में सेंध लगाने में कामयाब रही है। चुनाव के आधिकारिक परिणाम भले ही 9 अक्टूबर को सामने आएं, लेकिन सियासी हलकों में यह आम राय बन रही है कि ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच छिड़े इस ताजा मुकाबले के शुरुआती दौर में भारतीय जनता पार्टी ने मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली है।

सवाल-जवाब

पश्चिम बंगाल की किन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं?
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव आयोजित किए जा रहे हैं।
इन दोनों सीटों पर मतदान और मतगणना की तारीखें क्या हैं?
दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होगा और 9 अक्टूबर को चुनाव परिणामों की घोषणा की जाएगी।
नंदीग्राम से तृणमूल कांग्रेस की किस प्रत्याशी ने नामांकन वापस लिया?
नंदीग्राम से पार्टी की अधिकृत उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया।
रेजीनगर विधानसभा सीट से चुनावी मैदान छोड़ने वाले उम्मीदवार कौन हैं?
रेजीनगर से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने चुनावी मैदान से हटने का ऐलान किया है।
भारतीय जनता पार्टी ने रेजीनगर सीट से किसे चुनावी मैदान में उतारा है?
भारतीय जनता पार्टी ने रेजीनगर विधानसभा सीट से शाखारव सरकार को अपना उम्मीदवार बनाया है।
नंदीग्राम सीट का पिछला चुनावी इतिहास क्या रहा है?
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को पराजित किया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·39 दिन पहले

पश्चिम बंगाल के इन उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों का अचानक मैदान छोड़ना केवल स्थानीय स्तर का घटनाक्रम नहीं है, बल्कि यह संगठनात्मक कमजोरी और बढ़ते राजनीतिक दबाव का स्पष्ट संकेत है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच चल रही इस सियासी रस्साकशी का सीधा फायदा विपक्षी खेमे को मिल रहा है। यदि सत्ताधारी दल ने इस असंतोष को समय रहते नियंत्रित नहीं किया, तो आगामी मतदान परिणामों में पार्टी को भारी राजनीतिक मूल्य चुकाना पड़ सकता है, जिससे राज्य के समग्र राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·39 दिन पहले

यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में सांगठनिक समन्वय और जमीनी पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उपचुनाव की तारीखों से ठीक पहले सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों का इस प्रकार मैदान छोड़ना विपक्ष की रणनीतिक बढ़त को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने अंदरूनी कलह को नियंत्रित नहीं किया, तो यह जमीनी स्तर पर पार्टी के मनोबल को और अधिक प्रभावित कर सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·39 दिन पहले

पश्चिम बंगाल के इन घटनाक्रमों से राज्य की राजनीतिक अनिश्चितता का सीधा असर स्थानीय आर्थिक गतिविधियों और निवेशक सेंटीमेंट पर पड़ सकता है। जब चुनावी मैदान में इस तरह की अप्रत्याशित उठापटक होती है, तो कॉरपोरेट क्षेत्र और नए स्टार्टअप भी नीतिगत स्थिरता को लेकर सतर्क हो जाते हैं। यदि इस सांगठनिक संकट का समाधान जल्द नहीं हुआ, तो यह राजनीतिक अस्थिरता राज्य के कारोबारी माहौल और आगामी आर्थिक विकास की रफ्तार को भी प्रभावित कर सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·39 दिन पहले

पश्चिम बंगाल के इन उपचुनावों में प्रत्याशियों का अचानक मैदान छोड़ना इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर संगठनात्मक पकड़ कमजोर हो रही है। यदि सत्ताधारी दल समय रहते असंतोष को नियंत्रित नहीं कर पाया, तो इस रणनीति का असर आगामी बड़े राजनीतिक मुकाबलों पर भी पड़ना तय है, जिससे विपक्षी खेमे को और अधिक मजबूती मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·39 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह समझना होगा कि मुख्य विपक्षी दल के रणनीतिक दबाव और गुप्त बैठकों के बाद उम्मीदवारों का इस तरह हटना केवल आंतरिक असंतोष नहीं, बल्कि प्रशासनिक और खुफिया तंत्र के स्तर पर गहरी उठापटक का संकेत देता है। यदि मतदान से एक महीने पहले ऐसी स्थिति बन रही है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि निर्वाचन आयोग और कानून-व्यवस्था मशीनरी इस सियासी रस्साकशी के बीच चुनावी निष्पक्षता को कैसे सुनिश्चित करती है।

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