देश में ज्यादातर महिलाएं अब अस्पताल में ही बच्चे को जन्म दे रही हैं, लेकिन इसी बीच एक चिंताजनक आंकड़ा सामने आया है, जन्म के बाद शिशुओं को सिर्फ मां का दूध पिलाने की दर में गिरावट। इस विरोधाभास को शशि थरूर ने एक्स पर उठाया है और सवाल किया है कि आखिर इसके पीछे की वजह क्या हो सकती है।
एनएफएचएस-6 के आंकड़े क्या कहते हैं
शशि थरूर के मुताबिक, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी NFHS-6 के ताजा आंकड़ों में देश में संस्थागत प्रसव, यानी अस्पताल या किसी रजिस्टर्ड स्वास्थ्य केंद्र में होने वाली डिलीवरी, बढ़कर 90.6% तक पहुंच गया है। इसे मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच का संकेत माना जाता है, क्योंकि अस्पताल में डिलीवरी के दौरान प्रशिक्षित स्टाफ और आपातकालीन सुविधा मौजूद रहती है। लेकिन इन्हीं आंकड़ों में यह भी सामने आया है कि छह महीने से कम उम्र के शिशुओं को सिर्फ मां का दूध पिलाने यानी एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग (EBF) की दर 63.7% से घटकर 55.8% पर आ गई है।
दो अच्छे संकेतकों में यह उलटफेर क्यों चौंकाता है
शशि थरूर ने इसे दिलचस्प आंकड़ा बताते हुए कहा कि यह जानना जरूरी है कि इसका मतलब क्या हो सकता है, क्योंकि दोनों आंकड़े मातृ और शिशु स्वास्थ्य सुधरने का संकेत माने जाते हैं, फिर भी दोनों उलटी दिशा में जा रहे हैं। आम तौर पर माना जाता है कि जब ज्यादा महिलाएं अस्पताल में डिलीवरी कराती हैं, तो उन्हें प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान से जुड़ी सलाह और सहायता भी आसानी से मिलनी चाहिए। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर करीब आठ प्रतिशत अंक तक गिर गई है, और यह गिरावट राष्ट्रीय स्तर के सर्वे के हिसाब से लाखों नवजातों को सीधे प्रभावित करती है।
शशि थरूर ने क्या लिखा
अपनी पोस्ट में शशि थरूर ने लिखा,
एक दिलचस्प आंकड़ा, और इसका क्या मतलब हो सकता हैइसके बाद उन्होंने सर्वे के दोनों आंकड़े सामने रखे और इसे विशेषज्ञों तथा नीति निर्माताओं के लिए एक सवाल के तौर पर पेश किया, न कि खुद इसकी वजह बताते हुए कोई निष्कर्ष दिया।
जनता की प्रतिक्रिया
इस पोस्ट पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। कई यूजर्स ने कहा कि छह महीने तक सिर्फ मां का दूध पिलाना हर बच्चे के लिए जरूरी माना जाना चाहिए, वहीं कुछ ने नई माओं की मानसिक सेहत, दफ्तर के दबाव और डिलीवरी के बाद बेहतर सहयोग व्यवस्था की जरूरत पर सवाल उठाए। कुछ लोगों ने अस्पतालों में जवाबदेही और अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों की तुलना जैसे मुद्दे भी उठाए, जो दिखाता है कि लोग मां और नवजात दोनों की सेहत को एक साथ जोड़कर देखने की मांग कर रहे हैं।


























