गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके योगदान को स्मरण किया। उन्होंने रेखांकित किया कि किस तरह अतीत के महापुरुषों ने देश की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक उत्थान के लिए अटूट विश्वास के साथ संघर्ष की राह चुनी थी।
गोरक्षपीठ की परंपरा और स्वाधीनता का संकल्प
गोरखपुर में आयोजित स्मृति समारोहों की श्रृंखला में गोरक्षपीठ के पूर्व आचार्यों के योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता रहा है। महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ की स्मृति में व्याख्यान मालाओं तथा श्रद्धांजलि कार्यक्रमों का आयोजन भारतीय सनातन संस्कृति और उसके संरक्षण पर चर्चा का प्रमुख केंद्र बनता है। इन अवसरों पर हमेशा इस विचार पर बल दिया गया है कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी प्राचीन जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी होती है।
योगी आदित्यनाथ का संदेश
योगी आदित्यनाथ ने X पर लिखा कि ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जैसे दृष्टा संतों को पूर्ण विश्वास था कि पराधीनता की बेड़ियां अवश्य कटेंगी और भारत एक दिन स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरेगा। उनके अनुसार उन संतों के मन में यह दृढ़ भाव था कि देश को केवल राजनीतिक मुक्ति ही नहीं पानी है, बल्कि भारत को उसकी वास्तविक परंपरा और समृद्ध विरासत के अनुरूप ही निरंतर प्रगति पथ पर आगे ले जाना है।
सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक संदेश
महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथियों पर आयोजित होने वाले आयोजनों में सनातन मूल्यों के संरक्षण और लोक कल्याण पर गंभीर चिंतन होता रहा है। पहले के संबोधनों में भी यह बात सामने आती रही है कि एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं रहता और भारत ने सदा विश्व को सहअस्तित्व तथा सच्चे लोकतंत्र का संदेश दिया है। इसी वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए समाज को एकजुट और समर्थ बनाने की आवश्यकता पर निरंतर बल दिया जाता रहा है।
जनता की प्रतिक्रिया
इस संदेश पर सोशल मीडिया पर लोगों की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। जहां कई उपयोगकर्ताओं ने सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण के विचारों का समर्थन किया, वहीं कुछ लोगों ने सामाजिक एकता और समसामयिक राजनीतिक मुद्दों को लेकर अपनी राय प्रकट की।


























