कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की हालिया बैठक के बाद देश का राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ गया है। चुनावी निष्पक्षता और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन पहुंचकर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस बैठक के तुरंत बाद सामने आए बयानों ने केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच नए टकराव को जन्म दे दिया है, जिसमें चुनावी प्रणाली में हस्तक्षेप के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
राष्ट्रपति को सौंपा गया ज्ञापन और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग
राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के साथ हुई इस उच्चस्तरीय चर्चा के दौरान चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। सौंपे गए ज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका पर सवाल खड़े किए गए और आरोप लगाया गया कि चुनावी तंत्र के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की जा रही है। इसके साथ ही विपक्षी दल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के समक्ष रखी।
राहुल गांधी का बयान और 'वोट चोरी' का दावा
मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि वे इस बात से हैरान थे कि राष्ट्रपति ने उनकी बातों को स्वीकार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रणाली को कमजोर किया जा रहा है और उन्होंने 'वोट चोरी' से जुड़े दावों को राष्ट्रपति के समक्ष मजबूती से पेश किया। गांधी के अनुसार, देश के संवैधानिक प्रमुख के साथ हुई यह बैठक असाधारण और अप्रत्याशित रही, जहां विपक्ष ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की शुचिता की रक्षा के लिए हस्तक्षेप की गुहार लगाई।
भाजपा का पलटवार और सुधांशु त्रिवेदी की तीखी टिप्पणी
राहुल गांधी के दावों पर भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत और बेहद तीखा पलटवार किया। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के बयानों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि संवैधानिक पदों की मर्यादा और राष्ट्रपति से बातचीत के संदर्भ को तोड़-मरोड़ कर पेश करना गलत है। सत्ताधारी दल ने इन आरोपों को आधारहीन बताते हुए कहा कि बिना किसी पुख्ता सबूत के संवैधानिक संस्थाओं और शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाना विपक्ष की हताशा को दर्शाता है।
जनता की प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम पर आम लोगों की राय बंटी हुई नजर आई। जहां कई नागरिकों ने विपक्ष द्वारा चुनावी पारदर्शिता का मुद्दा उठाने का समर्थन किया, वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने ठोस सबूतों के बिना ऐसे गंभीर दावे करने पर सवाल खड़े किए और इसे राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश बताया।



























