पड़ोसी देश पाकिस्तान इस समय गंभीर और चौतरफा संकट के दौर से गुजर रहा है। देश के भीतर राजनीतिक अस्थिरता अपने चरम पर है और हालात ऐसे बन चुके हैं जिनसे पार पाना शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में सरकार के खिलाफ असंतोष लगातार बढ़ रहा है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्रता की मांग और तेज होती जा रही है। इस अंदरूनी उठापटक और बगावत के माहौल ने देश के हुक्मरेानों की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं। इस बढ़ते आक्रोश और विरोध प्रदर्शनों को काबू में करने के लिए सड़कों पर भारी सुरक्षा इंतजाम किए जा रहे हैं, हाईवे पर कांटेदार तारें बिछाई जा रही हैं और राजधानी इस्लामाबाद को पूरी तरह से कंटेनरों से पाट दिया गया है। ऐसे तनावपूर्ण हालातों के बीच अफगानिस्तान के साथ भी सीमा पर मोर्चा खुल गया है, जिससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फजीहत हो रही है।
पीटीआई को कुचलने की कोशिश और इमरान खान की रिहाई की मांग
पाकिस्तान की मौजूदा सियासी राह पर आने वाले समय में और भी भयंकर बवाल होना तय माना जा रहा है और इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर देश भर में आंदोलन और तेज हो गया है। इमरान खान लंबे समय से जेल में बंद हैं और उनकी सेहत को लेकर भी लगातार चिंता जताई जा रही है। सरकार द्वारा उन्हें और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ को दबाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। यहां तक कि इमरान खान की बहन को भी हिरासत में ले लिया गया है। इसके बावजूद पार्टी के समर्थकों ने सरकार के सामने झुकने से इनकार कर दिया है और अपने नेता की रिहाई के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर ली है।
27 सितंबर का लॉन्ग मार्च और खैबर पख्तूनख्वा से तैयारी
इमरान खान की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए उनके समर्थक आगामी 27 सितंबर को एक बड़े लॉन्ग मार्च का आयोजन करने जा रहे हैं। पाकिस्तान के अलग-अलग इलाकों में इस मार्च को सफल बनाने के लिए अभी से तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। यह पूरा आंदोलन मुख्य रूप से खैबर पख्तूनख्वा से शुरू होकर देश की राजधानी इस्लामाबाद तक पहुंचेगा। करीब 3 साल से जेल की सलाखों के पीछे काट रहे इमरान खान की बिगड़ती सेहत के बीच उनके समर्थकों का यह आक्रामक रुख सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। इस लॉन्ग मार्च की गूंज इस समय पूरे पाकिस्तान में सुनाई दे रही है और हर कोई इसी की चर्चा कर रहा है।
राजधानी को बनाया गया छावनी, रास्तों पर कंटेनरों की दीवार
इमरान समर्थकों के इस संभावित मार्च को राजधानी में घुसने से रोकने के लिए शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर ने इस्लामाबाद को किसी किले में तब्दील कर दिया है। शहर के तमाम प्रमुख रास्तों और प्रवेश द्वारों को विशालकाय कंटेनरों की दीवारों से पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है। इस्लामाबाद के भीतर से सामने आ रही तस्वीरों में सड़कों पर कंटेनरों की लंबी कतारें साफ देखी जा सकती हैं। शहर में आने वाले सभी प्रमुख हाईवे पर भी इसी तरह की बैरिकेडिंग की गई है। इन कंटेनरों को सामान्य नहीं रखा गया है बल्कि इनके अंदर भारी मात्रा में रेत भरी गई है ताकि इन्हें आसानी से हटाया या हिलाया न जा सके। राजधानी पर समर्थकों द्वारा कब्जा किए जाने के डर से प्रशासन ने सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं, जिसकी चर्चा पाकिस्तानी मीडिया में भी प्रमुखता से हो रही है।
सड़कों की खुदाई और कंटीले तारों का जाल
इस्लामाबाद में इस समय कंटेनर ही कंटेनर नजर आ रहे हैं, हालांकि शहर को पूरी तरह बंद नहीं किया गया है। शहर के अंदर लगभग एक हजार कंटेनर लगाए जा रहे हैं, जबकि अटक और इस्लामाबाद के बाहरी इलाकों में दो हजार अतिरिक्त कंटेनर तैनात किए जा रहे हैं। इन कंटेनरों के भीतर मिट्टी की ढेरियां भी रखी जा रही हैं। इसके अलावा पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा से इस्लामाबाद आने वाले रास्तों और सड़कों को भी खोदने का बड़ा फैसला किया गया है। इन कंटेनरों की दीवारों को पार करना नामुमकिन बनाने के लिए इनके ऊपर खतरनाक कंटीले तार बिछा दिए गए हैं। हालांकि, सरकार के इन तमाम सुरक्षा उपायों के बावजूद इमरान खान के समर्थक भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। जब प्रशासन के कर्मचारी सड़कों और पुलों पर कंटीले तार बिछाते हैं, तो समर्थक उन तारों को उखाड़कर पास की नदी में फेंक देते हैं।
35 हजार सुरक्षाकर्मियों की तैनाती और इंटरनेट पर रोक
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। राजधानी आने वाले हर मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पंजाब और सिंध प्रांतों से 20 हजार अतिरिक्त पुलिसकर्मियों को विशेष तौर पर इस्लामाबाद बुलाया गया है। इस प्रकार पूरे इलाके में कुल 35 हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। इसके अलावा किसी भी तरह के अप्रिय घटनाक्रम को रोकने के लिए रैलियों, जुलूसों और सार्वजनिक सभाओं पर दो महीने के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। कई संवेदनशील इलाकों में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।
बुलडोजर और ट्रैक्टर के साथ आगे बढ़ते समर्थक
प्रशासन की तमाम पाबंदियों और भारी सुरक्षा के बावजूद इमरान खान के समर्थक इस मार्च को लेकर पूरी तरह अडिग हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ये समर्थक अपने साथ भारी-भरकम बुलडोजर और ट्रैक्टर लेकर आ रहे हैं ताकि रास्ते में खड़ी की गई कंटेनरों की दीवारों और बैरिकेड्स को आसानी से हटाया जा सके। देश के भीतर मचे इस घमासान के बीच अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी पाकिस्तान की स्थिति दयनीय होती जा रही है। यमन के हूती विद्रोहियों के खौफ के कारण पाकिस्तान सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपनी सेना भेजने से कतरा रहा है, जिससे उसकी भारी किरकिरी हो रही है। जनता अब खुलेआम सवाल पूछ रही है कि बहुचर्चित मक्का पैक्ट का क्या हुआ। इस चौतरफा आलोचना और फजीहत से जनता का ध्यान भटकाने के लिए सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने अब एक नई और खतरनाक चाल चली है।
अफगानिस्तान के साथ सीमा पर भड़की सैन्य झड़प
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर घिरे पाकिस्तान ने हाल ही में अफगानिस्तान के कई इलाकों में अचानक एयर स्ट्राइक कर दी। पाकिस्तानी सेना के इस कायराना हमले में कई निर्दोष अफगान नागरिक मारे गए, जिससे तालिबान सरकार और वहां के लोग भड़क उठे। इसके जवाब में अफगान सैनिकों ने पाकिस्तान से लगी सीमा पर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित गुलिस्तान क्षेत्र से दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी की तस्वीरें सामने आ रही हैं। अफगान पक्ष का दावा है कि उसने इस जवाबी कार्रवाई में कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया है, हालांकि पाकिस्तानी सेना के दावे इसके विपरीत हैं।
ड्रोन हमलों की नाकामी और सैनिकों का पीछे हटना
हूती संकट से ध्यान हटाने के चक्कर में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ जो नया मोर्चा खोला है, उसमें भी उसे लेने के देने पड़ते नजर आ रहे हैं। पाकिस्तानी सेना सीमा पर ड्रोन के जरिए हमले कर रही है, लेकिन अफगान लड़ाके उन ड्रोन को हवा में ही मार गिराने में सफल हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर एक पाकिस्तानी ड्रोन को मार गिराए जाने के दावे वाली तस्वीरें भी सामने आई हैं। अफगानिस्तान के खौफ और आक्रामक रुख के आगे पाकिस्तानी सैनिक कई बॉर्डर चौकियों को छोड़कर पीछे हटने और भागने पर मजबूर हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर पाकिस्तानी हुक्मरानों की रणनीतिक विफलता और देश की चरमराती आंतरिक सुरक्षा को उजागर कर दिया है.



















