वर्ष 1947 में हुए बंटवारे से पहले जब सीमाएं तय नहीं थीं, तब कई परिवार काम और आजीविका की तलाश में एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाकर बस गए थे। उसी दौर में स्वात घाटी से मुंबई पहुंचे शैबर लाला वहीं बस गए, लेकिन अपनी मिट्टी और जड़ों की कहानियां वे हमेशा संजोए रहे। अब कई दशकों बाद उनकी बेटी रेहाना बीबी ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए अपने पिता के उसी पुश्तैनी ठिकाने को पाकिस्तान के स्वात में खोज निकाला है।
पिता की बताई निशानियों से शुरू हुई तलाश
रेहाना बीबी के अनुसार उनके पिता शैबर लाला स्वात के पश्तून थे। वे 1947 में पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से पहले ही मुंबई आ चुके थे और बाद में वहीं स्थायी तौर पर रहने लगे। शैबर लाला अपने जीवनकाल में अक्सर अपनी बेटी से अपनी जड़ों और पुरखों की चर्चा किया करते थे। उन्होंने बताया था कि उनका परिवार पश्तूनों की यूसुफजई जनजाति से ताल्लुक रखता है और उनके गांव का नाम बोर था। इसके अलावा उन्होंने अपनी वंशावली के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारियां दी थीं।
रेहाना ने बताया कि उनके दादा का नाम मोहम्मद अली और दादी का नाम खान टोली था। उनके दादा मोहम्मद अली ने तीन शादियां की थीं, जिनमें से शैबर लाला उनकी दूसरी पत्नी की संतान थे। पिता के निधन के बाद भी रेहाना के मन में अपने पुरखों की जमीन और अपने रिश्तेदारों को खोजने की ललक बनी रही। पिता द्वारा दिए गए इन्हीं नामों, पारिवारिक विवरणों और जनजाति की जानकारी के आधार पर रेहाना ने लंबे समय तक खोजबीन जारी रखी।
इंटरनेट पर अपील ने खोला बंद दरवाजा
पारंपरिक तरीकों से कोई ठोस जानकारी न मिल पाने के बाद रेहाना ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। उन्होंने अपने पिता के नाम, जनजाति और गांव से जुड़ी तमाम निशानियों को साझा करते हुए लोगों से मदद मांगी। यह संदेश इंटरनेट के जरिए सीमाओं के पार पहुंचा और स्वात घाटी के बहा गांव के निवासियों तक जा पहुंचा। वहां के स्थानीय लोगों ने रेहाना द्वारा साझा किए गए पारिवारिक विवरणों का मिलान अपने गांव के पुराने परिवारों से किया।
गांव के लोगों ने रेहाना से संपर्क साधकर पुष्टि की कि शैबर लाला का संबंध बहा से ही था। स्थानीय परिजनों ने स्पष्ट किया कि उनका परिवार यूसुफजई जनजाति की सिनाखेल शाखा का हिस्सा है। इस तरह सोशल मीडिया पर जारी की गई एक भावनात्मक अपील ने सात समंदर पार बिछड़े परिवार के इतिहास की कड़ियों को आपस में जोड़ दिया।
स्वात में अब भी मौजूद हैं परिवार के वंशज
बहा गांव के रिश्तेदारों से मिली जानकारी के मुताबिक शैबर लाला के तीन भाई थे, जिनके नाम आमिर खान, दौलत खान और दिलावर खान थे। हालांकि इन तीनों भाइयों का अब देहांत हो चुका है, लेकिन उनकी संतानें और नई पीढ़ी आज भी बहा गांव में ही निवास कर रही हैं।
परिवार के वर्तमान सदस्यों, जिनमें बख्त नवाज और बशीर खान शामिल हैं, ने रेहाना के साथ संपर्क स्थापित किया है। उन्होंने पुष्टि की कि रेहाना के पिता वास्तव में उनके परिवार के वही सदस्य थे जो दशकों पहले मुंबई चले गए थे और जिनसे संपर्क टूट गया था।
पैतृक गांव आने का मिला औपचारिक न्योता
दशकों बाद अपने बिछड़े परिवार की पहचान होने पर दोनों तरफ बेहद भावुक माहौल है। स्वात के बहा गांव में रह रहे परिजनों ने रेहाना बीबी को पाकिस्तान आने और अपने पिता के पुश्तैनी गांव का दौरा करने का खुला निमंत्रण दिया है।
रिश्तेदारों का कहना है कि अगर रेहाना स्वात आती हैं, तो पूरा गांव और उनका कुनबा उनका खुले दिल से और गर्मजोशी के साथ स्वागत करेगा। उनका मानना है कि इतने लंबे अंतराल के बाद खून के रिश्तों का दोबारा मिलना एक बेहद यादगार और भावुक लम्हा होगा। मुंबई से सोशल मीडिया के जरिए शुरू हुआ यह प्रयास अब स्वात की वादियों में पारिवारिक मिलन की नई उम्मीद बन चुका है।



















