प्राकृतिक संपदा और अहम खनिजों की प्रचुरता के बावजूद बलूचिस्तान लंबे समय से भारी आर्थिक संकट, गंभीर बेरोजगारी और ढांचागत उपेक्षा की चपेट में फंसा हुआ है। जब स्थानीय स्तर पर वैधानिक रोजगार, पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो जाती हैं, तब आम नागरिक अपनी बुनियादी जरूरतों और रोजमर्रा की भूख से निपटने के लिए जोखिम भरे अनौपचारिक रास्तों पर निर्भर होने लगते हैं। बलूचिस्तान के जमीनी हालात भी इसी आर्थिक विवशता की गवाही दे रहे हैं, जहां भुखमरी से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय नशीले पदार्थों की तस्करी का बदनाम नेटवर्क एक तरह से स्थानीय आजीविका का स्थायी तंत्र बन चुका है।
गोल्डन क्रेसेंट का भूगोल और तस्करी का त्रिकोण
बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति इसे सीधे तौर पर अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान के जटिल सीमावर्ती संगम पर स्थापित करती है। इस त्रिकोणीय सीमा क्षेत्र को दुनिया भर में गोल्डन क्रेसेंट यानी सुनहरा अर्धचंद्र के नाम से जाना जाता है, जो दशकों से अंतरराष्ट्रीय नशीले पदार्थों के उत्पादन और उनकी अवैध सप्लाई का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। जिन इलाकों में सरकारों की मौजूदगी जनकल्याण के बजाय सिर्फ सैन्य उपस्थिति तक सीमित रह जाती है, वहां अंतरराष्ट्रीय सीमाएं स्थानीय बलूच समुदाय के लिए औपचारिक रेखाओं के बजाय दैनिक उत्तरजीविता का व्यापारिक गलियारा बन जाती हैं।
इस पूरे त्रिकोण में नशीले पदार्थों के अलावा अन्य चीजों की भी भारी मात्रा में आवाजाही होती है। सोवियत संघ और मुजाहिद्दीन के दौर में इस इलाके में हेरोइन प्रयोगशालाओं और अवैध ट्रांसपोर्टरों का जो ढांचा खड़ा हुआ था, वही लॉजिस्टिक्स तंत्र आज भी पूरी ताकत से संचालित हो रहा है।
- अवैध वस्तुओं का खुला प्रवाह: सीमावर्ती रास्तों से सिर्फ हेरोइन या सिंथेटिक ड्रग्स ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में सस्ता ईरानी डीजल, नकली उपभोक्ता उत्पाद, सोना और आग्नेयास्त्र भी बेधड़क पार कराए जाते हैं।
- कंटीली बाड़ और अनौपचारिक रास्ते: औपचारिक बॉर्डर सुरक्षा के बावजूद सीमा पर लगी तारों के कट और सुराखों का इस्तेमाल करके पैदल या छोटे वाहनों से खेप निकाली जाती है।
- चेक पोस्टों पर अवैध वसूली: बड़े ट्रकों के पूरे काफिले आधिकारिक क्रॉसिंग पॉइंट्स से गुजरते हैं, जहां प्रभावशाली तंत्र को अनौपचारिक टैक्स अथवा रिश्वत देकर अवैध खेप को अनदेखा करवा दिया जाता है।
अमेरिकी हथियारों की बाढ़ और पहुंच का नया खेल
साल 2021 में जब अमेरिकी सेना अचानक अफगानिस्तान से वापस लौटी, तो उस उथल-पुथल में आधुनिक हथियारों और सैन्य उपकरणों का एक विशाल जखीरा पीछे छूट गया था। अफगान संकट और युद्ध की तबाही के बीच जब लोगों के सामने दाने-दाने का संकट खड़ा हुआ, तो अमेरिकी असॉल्ट राइफलों को नकदी जुटाने का जरिया बनाया गया। हालांकि बाजार में इन हथियारों की इतनी अधिक बाढ़ आ गई कि स्थानीय स्तर पर इनके खरीदार ही मिलने मुश्किल हो गए।
हथियारों की इस अधिकता ने बलूचिस्तान सीमा पर शक्ति संतुलन को भी बदल दिया। अब इस तंत्र में केवल तालिबानी पहचान होना या हथियार का मालिक होना पर्याप्त नहीं रहा। सीमा पार कोई भी सामान भेजने के लिए सुरक्षा चौकियों पर राजनीतिक संरक्षण, बड़े अधिकारियों से मिलीभगत और प्रभावशाली संपर्कों की अनिवार्यता बन गई। बिना उच्चस्तरीय प्रशासनिक साठगांठ के सीमा के आर-पार एक साधारण राइफल भी ले जाना असंभव हो गया।
तालिबान की अंतरराष्ट्रीय छवि बनाम बॉर्डर की हकीकत
काबुल की सत्ता संभाल रहा तालिबान वैश्विक मंच पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। वर्ष 2025 में रूस की ओर से तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दी जा चुकी है, जबकि चीन और खाड़ी देशों ने उनके प्रतिनिधियों को अपने यहां स्वीकार किया है। इसके साथ ही बीजिंग से लेकर इस्तांबुल तक की विदेशी कंपनियां खनिजों के बड़े सौदों में जुटी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ बातचीत में तालिबान आतंकवाद के खात्मे और अफीम पर सख्त पाबंदी जैसे लुभावने वादे दोहराता है, लेकिन बलूचिस्तान से सटी जमीनी सीमाओं पर स्थिति बिल्कुल जुदा दिखाई देती है।
सच्चाई यह है कि तालिबान की तथाकथित पाबंदियां केवल छोटे काश्तकारों और गरीब तस्करों तक सीमित हैं। दूसरी तरफ बड़े सिंडिकेट और प्रभावशाली कमांडरों के नजदीकी नेटवर्क बिना किसी रुकावट के काम कर रहे हैं। यद्यपि हेलमंद और कंधार में अफीम की खेती में गिरावट दर्ज की गई, किंतु यह उत्पादन उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में स्थानांतरित हो गया। इसके समानांतर मेथामफेटामिन और हेरोइन की तस्करी का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
अपराध, स्थानीय राजनीति और आम जनता का नुकसान
बलूचिस्तान में आपराधिक नेटवर्क अब कोई छिटपुट गैरकानूनी गतिविधि नहीं है, बल्कि यह वहां की व्यावहारिक राजनीति और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ में तब्दील हो चुका है। स्थानीय कबीलाई सरदार, सीमावर्ती तस्कर और तालिबानी बिचौलिए मिलकर एक संगठित व्यवस्था चलाते हैं, जिसे प्रशासनिक स्तर पर मौन समर्थन प्राप्त रहता है। ये बिचौलिए काबुल और कंधार के शीर्ष नेतृत्व तथा स्थानीय जमीनी हालात के बीच कड़ी का काम करते हैं।
इस पूरे गठजोड़ में सबसे ज्यादा नुकसान आम बलूच नागरिकों का हो रहा है, जिनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बिना उन्हें लाभ दिए किया जाता है। स्थानीय आबादी को अत्यंत कम मजदूरी पर खतरनाक कामों में झोंक दिया जाता है। दूसरी ओर तालिबान की सुरक्षा सेना में 30 फीसदी कटौती किए जाने के बाद से व्यापक बेरोजगारी फैली है, जिससे और अधिक लोग गैर-कानूनी रास्तों की तरफ धकेले जा रहे हैं। जब तक इस पूरे क्षेत्र में आर्थिक न्याय, नागरिक अधिकार और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब तक इस अवैध तंत्र की पकड़ कमजोर होना नामुमकिन दिखता है।



















