दक्षिण एशिया के अशांत क्षेत्र बलूचिस्तान के बंजर रेगिस्तानी इलाकों में पाकिस्तानी सैन्य टुकड़ियों की एक बेहद हैरान करने वाली स्थिति देखने को मिल रही है। बलोच लिबरेशन आर्मी के निरंतर और सुनियोजित छापों के सम्मुख पाकिस्तानी सुरक्षा बल इस कदर दबाव में आ चुके हैं कि वे झड़पों के दौरान मारे जाने वाले अपने ही साथियों के पार्थिव शरीर वहीं लावारिस स्थिति में छोड़कर पीछे हट रहे हैं। सुरक्षा मोर्चे पर खड़े सैनिकों को इस तरह छोड़ देने की नीति रावलपिंडी के शीर्ष सैन्य नेतृत्व, विशेष रूप से सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के प्रशासनिक रवैये पर कड़े सवाल खड़े कर रही है।
युद्धक्षेत्र में साथियों को पीछे न छोड़ने की सैन्य परंपरा की अनदेखी
संसार भर के पेशेवर सैन्य बलों का यह बुनियादी सिद्धांत रहा है कि किसी भी परिस्थिति में अपने गिरे हुए साथी को रणभूमि में अकेला नहीं छोड़ा जाता। इसके विपरीत, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के दूरदराज चौकियों पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों और रेंजर्स का व्यवहार पेशेवर नियमों के विपरीत दिख रहा है। जब बलोच लिबरेशन आर्मी के सशस्त्र दस्ते सैन्य छावनियों या गश्ती दलों को घेरते हैं, तो भीषण गोलीबारी के बीच जवान अपने हताहत हुए साथियों को संभालने के बजाय अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने को प्राथमिकता देते हैं।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह रवैया नया नहीं लगता। वर्ष 1999 के कारगिल संघर्ष के समय भी पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों ने अपनी ही नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के सैकड़ों मृत सैनिकों को स्वीकार करने अथवा उनकी शिनाख्त करने से साफ मना कर दिया था। उस ऐतिहासिक घटनाक्रम में भारतीय सेना ने स्थापित मानवीय और सैन्य मूल्यों का पालन करते हुए पाकिस्तानी सैनिकों का पूरे सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया था। दशकों बाद आज बलूचिस्तान के गर्म रेत में ठीक उसी मानसिकता की पुनरावृत्ति देखी जा रही है, जहां अपने ही वर्दीधारी कर्मियों के सम्मान की रक्षा करने में नेतृत्व असमर्थ नजर आ रहा है।
सामरिक दृष्टिकोण और रणनीतिक कमजोरियों का विश्लेषण
सैन्य विश्लेषक अभिजीत अय्यर-मित्रा के सामरिक आकलन का उल्लेख करते हुए रक्षा विशेषज्ञ मेजर गौरव आर्या ने पाकिस्तानी सेना की संचालन पद्धति की बुनियादी खामियों को रेखांकित किया है। विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तानी सेना छोटी टुकड़ियों द्वारा अचानक घुसपैठ करने या गुप्त रूप से घात लगाने जैसी टैक्टिकल गतिविधियों में चालाकी अवश्य दिखाती है, किंतु समग्र रणनीतिक स्तर पर भारी अदूरदर्शिता की शिकार रहती है।
जब कोई सशस्त्र विपक्षी ताकत मजबूती से पलटवार करती है और लड़ाई लंबी खिंचती है, तो पाकिस्तानी सैन्य ढांचा दबाव बर्दाश्त करने में पूरी तरह असमर्थ साबित होता है। विश्लेषकों ने इसकी तुलना पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के ढहने के ढर्रे से की है, जहां शीर्ष क्रम के दो विकेट गिरते ही पूरी बल्लेबाजी ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है। वर्ष 1971 के युद्ध से लेकर कारगिल संघर्ष और अब बलूचिस्तान के मौजूदा संकट तक, जरा सा गहरा सामरिक दबाव पड़ते ही यह बल संगठित प्रतिरोध जारी रखने के बजाय मैदान छोड़ने का रास्ता अपनाता रहा है।
वर्ष 2026 में हताहतों का भयावह पैमाना
मौजूदा वर्ष 2026 पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के लिए बलूचिस्तान के मोर्चे पर बेहद घातक साबित हुआ है। बलोच लिबरेशन आर्मी के सुनियोजित हमलों के चलते प्रतिदिन औसतन तीन पाकिस्तानी सैनिक जान गंवा रहे हैं। इस वर्ष के प्रारंभिक महीनों से लेकर अगस्त और सितंबर 2026 तक के समग्र आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक 700 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक और अर्धसैनिक रेंजर्स बलूचिस्तान में जारी हिंसक संघर्षों में मारे जा चुके हैं। केवल अगस्त महीने के दौरान ही 50 से अधिक सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों के अंतिम आंकड़े जुटाए जाने शेष हैं। इतने व्यापक नुकसान के बावजूद रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय की ओर से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया जा रहा है।
सैन्य नेतृत्व की उदासीनता और प्रशासनिक प्राथमिकताएं
पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी मेजर आदिल राजा के खुलासे इस प्रशासनिक संवेदनहीनता को और अधिक उजागर करते हैं। पूर्व सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के कार्यकाल में कई प्रशासनिक खामियां होने के बावजूद वे कम से कम हताहत सैनिकों के परिजनों से भेंट करने और संवेदना प्रकट करने उनके घर जाया करते थे। इसके विपरीत, मौजूदा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अपने सैनिकों के प्रति घोर उदासीनता दर्शाते हैं और बलूचिस्तान में गिरती लाशों पर कोई जमीनी प्रतिक्रिया नहीं देते।
यही गैर-जिम्मेदारी नागरिक प्रशासन में भी दिखाई देती है। देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रभारी गृह मंत्री मोहसिन नकवी अपने मुख्य कर्तव्यों पर ध्यान देने के स्थान पर दुबई में क्रिकेट मैचों का लुत्फ उठाने और तेहरान सहित अन्य विदेशी यात्राओं में उलझे रहते हैं। जिस समय सीमावर्ती और अशांत प्रांतों में सैनिकों के शव बिना अंतिम संस्कार के लावारिस पड़े रहते हैं, उस समय सत्ता के शीर्ष गलियारों में बैठे लोग अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय दौरों में व्यस्त रहते हैं।
अग्रिम मोर्चे के अनुभव का अभाव और आंतरिक दमन
जनरल आसिम मुनीर के पेशेवर सैन्य प्रशिक्षण और पृष्ठभूमि पर भी सैन्य हलकों में बहस छिड़ी हुई है। वे वास्तविक युद्धक्षेत्र में सैनिकों का नेतृत्व करके या अग्रिम मोर्चों पर सीधे टकराव का अनुभव लेकर शीर्ष कमान तक नहीं पहुंचे हैं, बल्कि उनका अधिकांश करियर कागजी प्रबंधन और स्टाफ ऑफिसर के प्रशासनिक पदों पर बीता है। विश्लेषकों का मानना है कि इसी कारण उनमें अग्रिम पंक्ति के सैनिकों के साथ खड़े होने वाले पारंपरिक फौजी ऑनर की कमी दिखती है।
आलोचकों का कहना है कि सैन्य नेतृत्व अपनी ताकत केवल निहत्थे नागरिकों, राजनीतिक विरोधियों और महिलाओं पर आजमाता है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की तीन बुजुर्ग बहनों, अलीमा खान, नोरीन नियाजी और डॉ उजमा खान को गिरफ्तार कराकर सत्ता तंत्र अपनी धौंस जमाता है। परंतु जब बलोच लिबरेशन आर्मी के सशस्त्र लड़ाकों से सीधा मुकाबला होता है, तो वही बल बैकफुट पर चला जाता है। यहां तक कि विद्रोही संगठन का भी यह कहना रहा है कि यदि पाकिस्तानी सेना आकर अपने मारे गए कर्मियों के शव ले जाना चाहे तो उन्हें कोई बाधा नहीं पहुंचाई जाएगी, फिर भी सेना में आगे बढ़कर अपने जवानों की पार्थिव देह वापस मांगने तक का साहस नहीं दिख रहा है।


















