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मध्यस्थ की कुर्सी पर बैठकर वैश्विक रसूख की तलाश में जुटा इस्लामाबाद, हर दांव के पीछे छिपा है बड़ा हितपाकिस्तान
24 जून 2026, 6:25 pm (126 दिन पहले)· 5

मध्यस्थ की कुर्सी पर बैठकर वैश्विक रसूख की तलाश में जुटा इस्लामाबाद, हर दांव के पीछे छिपा है बड़ा हित

ईरान और अमेरिका के बीच सुलह कराने में पाकिस्तान ने खुद को अहम मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है, लेकिन इस सक्रियता के पीछे सीमा सुरक्षा से लेकर आर्थिक फायदे तक कई रणनीतिक मकसद छिपे हैं।

मिडिल ईस्ट की पुरानी तनातनी के बीच पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका को बातचीत की मेज तक लाने में खुद को एक बड़े मध्यस्थ के रूप में खड़ा कर लिया है। बीते कुछ महीनों में इस्लामाबाद ने सिर्फ दोनों मुल्कों के बीच संदेश ही नहीं पहुंचाए, बल्कि बातचीत की मेजबानी की और समझौते के लिए जमीन तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाई। हाल यह रहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते को नाम ही दिया गया, ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’, जिसमें पाकिस्तान का जिक्र मध्यस्थ और गवाह दोनों के रूप में हुआ।

पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ दुनिया भर में हुई है। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया से लेकर फ्रांस और नॉर्वे तक, और मलेशिया से लेकर अमेरिका तक, तमाम देशों की मीडिया और नेतृत्व ने इसे सराहा। इस पूरी कवायद में पाकिस्तान के साथ मिस्र और तुर्की जैसे देशों ने भी अहम किरदार निभाया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पाकिस्तान को इससे हासिल क्या होगा और वह इस भूमिका के लिए इतनी दौड़भाग क्यों कर रहा है।

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दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल बता चुके हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ खुद स्विट्जरलैंड में ईरान और अमेरिका के बीच चल रही वार्ता के दौरान मौजूद रहे। वहीं विदेश मंत्री इसहाक डार भी जंग के माहौल के बीच पड़ोसी खाड़ी देशों से लगातार संपर्क बनाए रहे।

अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ाने की कोशिश

पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे दौर में अगर वह अमेरिका और ईरान जैसे कट्टर विरोधियों के बीच कामयाब पुल साबित हो जाता है, तो दुनिया में उसकी छवि मजबूत हो सकती है। दरअसल इस्लामाबाद वैश्विक स्तर पर अपनी साख बढ़ाना चाहता है। विश्लेषकों का मानना है कि वह खुद को सिर्फ दक्षिण एशिया तक सिमटा देश नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार क्षेत्रीय ताकत के रूप में पेश करना चाहता है। यही वजह है कि उसने अमेरिका, ईरान, खाड़ी देशों और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।

बलूचिस्तान और सीमा की चिंता

पाकिस्तान और ईरान करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। दोनों के सीमाई इलाकों में बलूच उग्रवाद और तस्करी जैसी दिक्कतें पहले से मौजूद हैं। अगर ईरान में अस्थिरता बढ़ती है या वहां का केंद्रीय शासन कमजोर पड़ता है, तो इसका सीधा असर पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत पर पड़ सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान कतई नहीं चाहता कि ईरान किसी बड़े युद्ध में उलझे या वहां अराजकता फैले।

तेल की कीमतें और ऊर्जा का गणित

पाकिस्तान ऊर्जा आयात पर टिका हुआ देश है। मध्य पूर्व में जंग भड़कने से तेल के दाम तेजी से ऊपर जा सकते हैं, और इसका सीधा झटका पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को लगता है। ईरान और अमेरिका के तनाव के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट खड़ा हो गया था। दुनिया के तेल कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यह रास्ता बंद होता है तो पाकिस्तान समेत कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति लड़खड़ा सकती है। यही कारण है कि पाकिस्तान इस इलाके में स्थिरता चाहता है।

अमेरिका से रिश्ते सुधारने का मौका

अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद पाकिस्तान की रणनीतिक अहमियत कुछ हद तक घट गई थी। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच संवाद कराने की भूमिका निभाकर पाकिस्तान वॉशिंगटन के साथ अपने रिश्ते दोबारा मजबूत करना चाहता है। मध्यस्थ की भूमिका उसे अमेरिकी नेतृत्व से सीधे संपर्क और कूटनीतिक वजन दोनों दिलाती है।

खाड़ी देशों और चीन के बीच तालमेल

एक तरफ पाकिस्तान के करीबी रिश्ते सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से हैं, तो दूसरी तरफ उसका पड़ोसी ईरान और रणनीतिक साझेदार चीन भी है। अगर अमेरिका और ईरान का टकराव बढ़ता है, तो पाकिस्तान पर किसी एक खेमे का साथ देने का दबाव बन सकता है। मध्यस्थ बनकर वह हर पक्ष के साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

कूटनीति के साथ आता आर्थिक फायदा

कूटनीतिक कामयाबी अक्सर आर्थिक मौके भी साथ लाती है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि अगर वह क्षेत्रीय शांति में बड़ी भूमिका निभाता है तो उसे खाड़ी देशों, अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से ज्यादा समर्थन मिल सकता है। इसके अलावा ईरान के साथ व्यापार और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं। दोनों देश पहले भी व्यापार बढ़ाने और आर्थिक सहयोग के लिए कई समझौते कर चुके हैं।

अमेरिका के साथ रिश्ते सुधरने से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज हासिल करने में मदद मिलेगी, साथ ही पश्चिमी देशों के वित्तीय बाजारों तक उसकी पहुंच आसान हो जाएगी।

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार और पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व, दोनों इस मध्यस्थता को अपनी कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिली कामयाबी घरेलू राजनीति में सरकार और सेना, दोनों की पकड़ मजबूत कर सकती है।

क्या इस भूमिका पर सब राजी हैं?

भले ही पाकिस्तान की मध्यस्थता की तारीफ हुई हो, लेकिन कुछ अमेरिकी और पश्चिमी नेताओं ने उसकी निष्पक्षता पर सवाल भी खड़े किए हैं। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे नेताओं ने उसकी भूमिका को लेकर संदेह जताया है।

साफ है कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता कराने की पाकिस्तान की यह कोशिश सिर्फ शांति कायम करने की मुहिम नहीं है। इसके पीछे कई रणनीतिक हित जुड़े हैं, जिनमें सीमा सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, अमेरिका से बेहतर रिश्ते, खाड़ी देशों के साथ संतुलन, आर्थिक लाभ और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा शामिल हैं। अगर यह मध्यस्थता कामयाब रहती है, तो पाकिस्तान खुद को मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया के बीच एक अहम कूटनीतिक पुल के रूप में स्थापित कर सकता है।

सवाल-जवाब

अमेरिका और ईरान के अंतरिम समझौते को क्या नाम दिया गया?
इसे ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ नाम दिया गया, जिसमें पाकिस्तान का जिक्र मध्यस्थ और गवाह के रूप में हुआ।
पाकिस्तान इस मध्यस्थता से क्या हासिल करना चाहता है?
वह सीमा सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, अमेरिका से बेहतर रिश्ते, खाड़ी देशों के साथ संतुलन, आर्थिक लाभ और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा हासिल करना चाहता है।
पाकिस्तान और ईरान की सीमा कितनी लंबी है?
दोनों देश करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, जहां बलूच उग्रवाद और तस्करी जैसी समस्याएं मौजूद हैं।
इस भूमिका में पाकिस्तान के अलावा कौन से देश शामिल रहे?
पाकिस्तान के साथ मिस्र और तुर्की जैसे देशों ने भी अहम भूमिका निभाई।
किसने पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाए हैं?
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे कुछ अमेरिकी और पश्चिमी नेताओं ने उसकी निष्पक्षता पर संदेह जताया है।
अमेरिका से रिश्ते सुधरने से पाकिस्तान को आर्थिक रूप से क्या फायदा होगा?
इससे उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज और पश्चिमी देशों के वित्तीय बाजारों तक आसान पहुंच मिलने में मदद मिलेगी।
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