घर के भीतर रोजमर्रा के कामकाज हों या बाहर बाजार की कोई व्यस्त दुकान, छोटे बच्चों का अचानक किसी बात पर अड़ जाना किसी भी माता-पिता के मानसिक सब्र की कड़ी परीक्षा ले लेता है। कभी मनपसंद खिलौने को तुरंत खरीदने के लिए फर्श पर लेटकर चीखना, कभी स्कूल का गृहकार्य अधूरा छोड़कर खेलने भागना, तो कभी खाने की मेज पर मनमानी करना पारिवारिक माहौल को तनावपूर्ण बना देता है। हर अभिभावक की स्वाभाविक इच्छा यही रहती है कि उनका बच्चा आज्ञाकारी, समझदार और संस्कारी बने। इसके उलट जब मासूम चेहरे से बेतुकी जिद और उग्र व्यवहार सामने आता है, तो अधिकांश माता-पिता उलझन में पड़ जाते हैं कि आखिर इस स्थिति को शांतिपूर्वक कैसे संभाला जाए। बच्चों की इस हठधर्मिता से हताश होने के बजाय उनके बाल मनोविज्ञान और सोचने के तरीके को समझना इस समस्या का सबसे टिकाऊ समाधान साबित होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों का जिद्दी व्यवहार अक्सर अपनी भावनाएं ठीक से व्यक्त न कर पाने या नियंत्रण हासिल करने की एक अपरिपक्व कोशिश होता है। अगर माता-पिता कुछ सोची-समझी मनोवैज्ञानिक तकनीकों को अपने दैनिक आचरण में शामिल कर लें, तो बिना किसी कड़वाहट या झगड़े के बच्चों के व्यवहार को अनुशासित किया जा सकता है। यहां ऐसे तीन ठोस और व्यावहारिक तरीके विस्तार से समझाए जा रहे हैं, जो जिद्दी बच्चों को शांत करने और उनके साथ संवाद बेहतर बनाने में बेहद असरदार साबित होते हैं।
गुस्से में चिल्लाने के बजाय खुद को पूरी तरह शांत रखें
जब बच्चा सार्वजनिक स्थान पर रोने लगता है या किसी अनुचित मांग को लेकर लगातार चिल्लाता है, तो स्वाभाविक तौर पर माता-पिता का पारा भी चढ़ जाता है। कई बार झुंझलाहट में अभिभावक बच्चे पर जोर-जोर से डांटने लगते हैं या गुस्से में शारीरिक दंड का सहारा लेते हैं। मनोविज्ञान के नजरिए से यह माता-पिता द्वारा की जाने वाली सबसे नुकसानदेह चूक साबित होती है। चीखने-चिल्लाने या हाथ उठाने से उस वक्त भले ही बच्चा सहम जाए, लेकिन अंदरूनी तौर पर वह और अधिक विद्रोही, उग्र और जिद्दी बन जाता है। बच्चा डांट-फटकार को एक आक्रामक प्रतिक्रिया के रूप में दर्ज करता है और भविष्य में अपनी बात मनवाने के लिए इसी नकारात्मक ऊर्जा का सहारा लेने लगता है।
इस जटिल स्थिति को सुलझाने का पहला नियम यह है कि आप प्रतिक्रिया देने से पहले एक पल रुकें और गहरी सांस लेकर खुद को ठंडा करें। जब आपका दिमाग शांत होगा, तभी आप बच्चे की मानसिक स्थिति को संभाल पाएंगे। बच्चे की बात को बिना बीच में टोके धैर्यपूर्वक सुनें। इसके बाद बहुत ही संतुलित, स्थिर और सामान्य आवाज में उससे बात करें। उसे स्पष्ट बताएं कि इस तरह चिल्लाना, चीजें फेंकना या जमीन पर लेटना पूरी तरह गलत है। जब बच्चा देखेगा कि उसके भड़कने के बावजूद माता-पिता उत्तेजित नहीं हो रहे हैं, तो उसका अपना उग्रपन धीरे-धीरे कम होने लगेगा और वह बातचीत के सामान्य तरीके की तरफ लौटने को प्रेरित होगा।
सीधे इनकार करने के बजाय बच्चे के सामने सीमित विकल्प रखें
विकास के शुरुआती दौर में छोटे बच्चों के भीतर स्वायत्तता और खुद फैसले लेने की ललक पैदा होती है। वे हर बात में अपनी पसंद थोपना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में जब अभिभावक सीधे तौर पर किसी चीज के लिए 'ना' कह देते हैं या हुकुम चलाने वाले अंदाज में निर्देश जारी करते हैं, तो बच्चे का आत्मसम्मान आहत होता है और वह विरोध जताने के लिए जिद पर अड़ जाता है। इससे बचने का सबसे कारगर तरीका यह है कि आप बातचीत की दिशा अपने हाथ में रखते हुए उसे सीमित विकल्प पेश करें।
सीमित विकल्प देने की यह युक्ति माता-पिता और बच्चे दोनों के हित में काम करती है। उदाहरण के लिए, अगर बच्चा रात को तय समय पर बिस्तर पर जाने से मना कर रहा है, तो उस पर चिल्लाने के बजाय यह पूछें कि क्या वह सोने से पहले दांत साफ करना चाहेगा या कोई छोटी कहानी सुनना पसंद करेगा। इसी तरह सुबह स्कूल के लिए तैयार होते समय अगर कपड़ों को लेकर विवाद हो रहा हो, तो उससे पूछें कि वह लाल टी-शर्ट पहनना चाहता है या नीली टी-शर्ट। इस तकनीक से फैसला तो वही होता है जो माता-पिता चाहते हैं, लेकिन बच्चे को मानसिक संतुष्टि मिलती है कि घर में उसकी राय को महत्व मिल रहा है और निर्णय लेने की आजादी उसके पास भी है। परिणामस्वरूप बिना किसी बेवजह के ड्रामे के काम आसानी से पूरा हो जाता है।
अनावश्यक ध्यान पाने वाले ड्रामे को रणनीतिक रूप से नजरअंदाज करें
अक्सर देखा गया है कि बच्चे हर बार किसी वास्तविक जरूरत के लिए जिद नहीं करते। कई बार उनका एकमात्र मकसद माता-पिता और आसपास के लोगों का पूरा ध्यान अपनी तरफ खींचना होता है। जब उन्हें लगता है कि सामान्य व्यवहार से उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही है, तो वे घर में या रिश्तेदारों और अजनबियों के सामने जोर-जोर से रोना-धोना शुरू कर देते हैं ताकि माता-पिता शर्मिंदगी में आकर उनकी बात मान लें। इस तरह की भावनात्मक ब्लैकमेलिंग से निपटने के लिए रणनीतिक अनदेखी सबसे धारदार हथियार मानी जाती है।
अगर बच्चे की मांग पूरी तरह अनुचित है और उसका रोना केवल ध्यान खींचने का एक जरिया है, तो उस विशेष क्षण में उसके व्यवहार पर कोई भी भावनात्मक प्रतिक्रिया देना बंद कर दें। उसकी जिद और ड्रामे को ऐसे नजरअंदाज करें जैसे कुछ हुआ ही न हो। जब बच्चा यह महसूस करेगा कि उसके चीखने-चिल्लाने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है और न ही उसे कोई अतिरिक्त अटेंशन मिल रहा है, तो उसका यह पैंतरा बेअसर साबित हो जाएगा। कुछ ही देर में वह खुद समझ जाएगा कि इस नाटक से कुछ हासिल नहीं होने वाला और वह शांत हो जाएगा।
जब बच्चे का रोना बंद हो जाए और उसका गुस्सा पूरी तरह उतर जाए, तब उसे अपने पास बैठाकर प्यार से समझाना बहुत जरूरी है। उसे स्पष्ट शब्दों में बताएं कि जब वह शांति से, सभ्य तरीके से और प्यार से अपनी बात कहेगा, तभी उसकी उचित जरूरतों को सुना और पूरा किया जाएगा। अच्छी पेरेंटिंग किसी एक दिन का चमत्कार नहीं है, बल्कि यह अटूट धैर्य, मानसिक स्थिरता और निरंतर समझदारी का सफर है। बच्चों के व्यवहार में बदलाव आने में वक्त लगता है, लेकिन शांत रहने, सीमित विकल्प देने और सही समय पर अनदेखा करने के इन तीन नियमों को नियमित रूप से अपनाने पर बच्चों में गहरा और सकारात्मक सुधार दिखाई देने लगता है।



















