अक्सर माता-पिता इस उलझन में रहते हैं कि उनका बच्चा जरूरत से ज्यादा शर्मीला है और नए लोगों से बात करने में कतराता है। यदि आपका बेटा या बेटी भी स्कूल में नए दोस्त बनाने, मंच पर जाने या अपनी बात रखने में हिचकिचाता है, तो यह स्थिति केवल आपकी नहीं है। बचपन का यह संकोच और भय एक आम बात है, लेकिन समय रहते ध्यान न देने पर यह आदत बच्चे के उज्ज्वल भविष्य और आत्मबल को कमजोर कर सकती है। इस समस्या से पार पाने और बच्चे को एक साहसी इंसान बनाने के लिए कुछ असरदार तरीकों को आजमाया जा सकता है।
बच्चों के मन में डर और संकोच क्यों पैदा होता है
किसी भी परेशानी का हल निकालने से पहले उसके मूल कारणों को टटोलना बहुत जरूरी हो जाता है। बच्चे रातों-रात शर्मीले स्वभाव के नहीं बनते हैं, बल्कि इसके पीछे कई वजहें काम करती हैं। कई बार अभिभावक बच्चों को हर छोटी-बड़ी मुश्किल से बचाने के फेर में उन्हें खुद निर्णय लेने का अधिकार नहीं देते हैं, जिससे वे आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। इसके अलावा, बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने पर उनके भीतर का आत्मविश्वास अंदर से टूट जाता है। उनके मन में हमेशा इस बात का डर बना रहता है कि गलती होने पर लोग क्या कहेंगे या घर पर डांट पड़ेगी। कई बार बच्चे की बात पर उसे टोक देने या अनसुना करने से वह अगली बार अपनी बात कहने से पूरी तरह पीछे हट जाता है।
आत्मबल मजबूत करने के पांच अहम नियम
पालन-पोषण के तरीकों में थोड़े से बदलाव करके आप अपने बच्चे के भीतर दबे हुए आत्मविश्वास को बाहर निकाल सकते हैं। इसके लिए कुछ खास बातों पर ध्यान देना बेहद जरूरी होता है। बच्चे की भावनाओं का कभी भी उपहास नहीं उड़ाना चाहिए। जब बच्चा किसी बात से डरे, तो उसकी परेशानी को नजरअंदाज करने के बजाय उसकी बात को ध्यान से सुनें और उसे यह अहसास कराएं कि आप उसके साथ मिलकर इस स्थिति का सामना करेंगे।
गलतियों को सीखने का माध्यम बनाएं
बच्चों को इस बात का अहसास कराना जरूरी है कि गलतियां करना किसी भी प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और हर होनहार इंसान अपनी गलतियों से ही सीखकर आगे बढ़ता है। जब कभी बच्चा कोई चूक करे, तो उस पर गुस्सा करने की बजाय प्यार से समझाएं कि अगली बार उस काम को किस तरह से बेहतर ढंग से किया जा सकता है। इसके अलावा, बच्चों को घर की दहलीज से बाहर निकलने पर छोटे-छोटे फैसले खुद लेने की पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, होटल में अपना भोजन खुद मंगाना, बाजार से कोई सामान लाना या अपने पसंद के कपड़े स्वयं चुनना जैसी आदतें उनके भीतर खुद पर भरोसा जगाती हैं।
तुलना करने से बचें और सामाजिक मेलजोल बढ़ाएं
किसी अन्य बच्चे से अपने बच्चे की तुलना करना उनके मनोबल को ठेस पहुंचाता है, इसलिए ऐसा करने से हमेशा बचना चाहिए। हर बच्चा अपने आप में अनूठा होता है, और उसकी तुलना किसी दूसरे से करने के बजाय उसके पिछले प्रदर्शन से की जानी चाहिए तथा उसकी छोटी-छोटी सफलताओं की भी सराहना करनी चाहिए। इसके साथ ही, संकोची बच्चों को धीरे-धीरे बाहरी दुनिया और समाज के बीच घुलने-मिलने का अवसर देना चाहिए। उन्हें पार्क में अन्य बच्चों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें और घर आने वाले मेहमानों से बातचीत करने का मौका दें ताकि उनकी झिझक धीरे-धीरे खत्म हो सके।
धैर्य और प्यार से दूर होगी बच्चों की हिचकिचाहट
किसी भी बच्चे के भीतर का डर और संकोच एक ही रात में पूरी तरह दूर नहीं हो सकता है, जिसके लिए अभिभावकों को अत्यधिक संयम और स्नेह दिखाने की आवश्यकता होती है। बच्चे को यह विश्वास दिलाना बेहद जरूरी है कि हार हो या जीत, आप हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े हैं। जब बच्चों को अपने माता-पिता की तरफ से ऐसा सुरक्षा कवच मिलता है, तो उनका सारा डर अपने आप काफूर हो जाता है और वे एक निडर तथा आत्मविश्वासी व्यक्तित्व के रूप में समाज के सामने आते हैं।



















