साल 2026 अब खत्म होने की कगार पर है और संसद के भीतर सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक थमने का नाम नहीं ले रही. संसद के दोनों पक्षों में यह तल्खी थमती नहीं दिख रही, और इसका सीधा असर अब पार्टियों की उस रणनीति पर पड़ रहा है जो वे अगले साल होने वाले चुनावों के लिए बना रही हैं. इसी बीच राजनीतिक हलकों की नजरें अभी से 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर टिक गई हैं. रणनीतिकारों के बीच बहस तेज है, क्या पुराना धार्मिक कार्ड इस बार भी असर दिखाएगा, या फिर रसोई गैस के दाम, पेट्रोल-डीजल की कीमतें और सरकार की e-20 ईंधन नीति जैसे रोजमर्रा के मुद्दे नतीजों की दिशा तय करेंगे.
सात राज्य, जो 2029 की तस्वीर भी बनाएंगे
2027 के चुनावों को भारतीय राजनीति का एक छोटा संस्करण माना जा रहा है, क्योंकि इनके नतीजे 2029 के लोकसभा चुनाव का माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. अगले साल कुल सात राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा हो रहा है, जहां नए सिरे से मतदान होगा. देश के सबसे बड़े और सियासी रूप से अहम राज्य उत्तर प्रदेश में भी वोटिंग होगी, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने अपनी सरकार बचाने की चुनौती होगी. पंजाब में आम आदमी पार्टी के भगवंत मान की परीक्षा होगी कि उनकी सरकार को लेकर जनता का भरोसा अब भी बरकरार है या नहीं. भाजपा के सबसे मजबूत किले गुजरात में पार्टी को अपनी अजेय जीत की लकीर बनाए रखने की चुनौती मिलेगी. उत्तराखंड और गोवा में भी वोट डाले जाएंगे, जहां भाजपा सरकारें दोबारा सत्ता में लौटने की उम्मीद लगाए बैठी हैं. वहीं मणिपुर और हिमाचल प्रदेश में साल के आखिर में, नवंबर के आसपास चुनाव होने हैं, जहां कांग्रेस को अपनी सरकार बचाने के लिए कड़ी लड़ाई लड़नी होगी. हिंदी पट्टी से लेकर पूर्वोत्तर और पश्चिमी तट तक इतने बड़े भौगोलिक और राजनीतिक दायरे में वोटिंग होने की वजह से इन नतीजों को दो साल बाद होने वाले राष्ट्रीय चुनाव की दिशा भांपने का शुरुआती संकेत भी माना जा रहा है.
रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल, वो मुद्दा जो चुपचाप असर डाल रहा
आम आदमी के महीने के बजट पर ईंधन की कीमतों का सीधा असर पड़ता है, खासकर मध्यम वर्ग और गांव-देहात में रहने वाले परिवारों पर. रसोई गैस सिलेंडर के दाम अकेले ही आधी आबादी का मूड बना या बिगाड़ सकते हैं. वहीं पेट्रोल-डीजल महंगा होने से माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है, जिसका असर बाजार में हर छोटी-बड़ी चीज की कीमत पर दिखता है. विपक्ष 2027 के चुनावों में इसी मुद्दे को सबसे धारदार हथियार बनाने की तैयारी में जुटा है. इसी के साथ e-20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिले पेट्रोल का मसला भी सुर्खियों में रहने वाला है. सरकार देशभर में इस ईंधन को तेजी से बढ़ावा दे रही है और इसे पर्यावरण बचाने और विदेशी मुद्रा की बचत के लिहाज से जरूरी कदम बताया जा रहा है. लेकिन खासकर युवा वाहन चालकों के बीच इसे लेकर नई बहस छिड़ी है, पुरानी गाड़ियों के इंजन पर इसके असर और माइलेज में कथित गिरावट को लेकर सवाल उठ रहे हैं. नीति के समर्थकों का कहना है कि कच्चे तेल के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर देश के लिए यह एक जरूरी लंबी अवधि का बदलाव है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि इस बदलाव की तात्कालिक कीमत आम वाहन चालक ही चुका रहे हैं.
बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बनाम आस्था की राजनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2027 के चुनावों में विचारधारा और जमीनी मुद्दों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामले और सरकारी नौकरियों में देरी ने युवाओं के भीतर गहरी नाराजगी पैदा की है, और सपा-कांग्रेस इसी नाराजगी को भुनाने की कोशिश कर सकती हैं. इसके अलावा स्थानीय स्तर पर नौकरशाही की मनमानी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार भी हमेशा सत्ता विरोधी माहौल बनाने का काम करते हैं. पंजाब में आम आदमी पार्टी और उत्तर प्रदेश में भाजपा दोनों को ही जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब देना होगा. विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह की नाराजगी किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि युवा और पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं की सोच को व्यापक स्तर पर प्रभावित करती है.
क्या धर्म अब भी आर्थिक चिंताओं पर भारी पड़ेगा?
भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, जैसे राम मंदिर या मथुरा-काशी से जुड़े मुद्दे, अब भी उसके प्रचार का हिस्सा बने हुए हैं, इसलिए धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि जनता इस बार भावनात्मक मुद्दों से ज्यादा अपनी जेब और पेट के सवालों पर ध्यान दे रही है. अगर आर्थिक मोर्चे पर राहत नहीं मिली, तो सत्ता विरोधी लहर बेहद आक्रामक रूप ले सकती है. उत्तर प्रदेश में भाजपा लगातार दो कार्यकाल से सत्ता में है, ऐसे में स्थानीय विधायकों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर जनता में नाराजगी पनप सकती है. पंजाब में आम आदमी पार्टी के सामने भी कुछ ऐसी ही स्थिति है, जहां जनता कानून-व्यवस्था और नशा मुक्ति के वादों पर हिसाब मांगेगी. इस वजह से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय, दोनों तरह की पार्टियों पर दबाव है कि वे सिर्फ सांस्कृतिक या धार्मिक नैरेटिव के भरोसे न रहें, बल्कि जमीन पर नतीजे दिखाएं.
नतीजों का पलड़ा किस तरफ झुकेगा
अगर विपक्षी दल बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को पूरी तरह भुनाने में कामयाब रहते हैं, जबकि सत्ताधारी दल सिर्फ धार्मिक एजेंडे पर टिका रहता है, तो 2027 के नतीजे कई राज्यों में चौंकाने वाले हो सकते हैं. ऐसी सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए सरकार चुनाव से ठीक पहले ईंधन और रसोई गैस की कीमतों में कटौती जैसे लोक-लुभावन कदम उठा सकती है. लेकिन क्या यह रणनीति नौकरियों और महंगाई को लेकर उपजे गुस्से की भरपाई कर पाएगी, यह सवाल अभी खुला है, और यही वजह है कि आने वाला चुनावी साल बेहद दिलचस्प होने वाला है.




















