कर्नाटक की राजनीति में सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को लेकर सत्ताधारी दल के भीतर खींचतान तेज होती दिख रही है। 2027 की राष्ट्रीय जनगणना में जातिगत आंकड़ों की गिनती को लेकर केंद्र सरकार को घेरने की रणनीति तैयार कर रही कांग्रेस अपने ही शासन वाले राज्य में असहज स्थिति का सामना कर रही है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अगुवाई वाली कर्नाटक सरकार पर बहुचर्चित सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण रिपोर्ट को अविलंब धरातल पर उतारने का दबाव बढ़ा दिया है। इस कदम से प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों में व्यापक बदलाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।
सिद्धारमैया का दबाव और 75 प्रतिशत आरक्षण का दांव
कर्नाटक में 2023 से कांग्रेस की सरकार सत्तारूढ़ है। इस बीच 79 वर्षीय वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने पार्टी के सामने एक नई राजनीतिक बहस खड़ी कर दी है। उन्होंने मांग की है कि राज्य में पहले से तैयार जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट को तुरंत लागू किया जाना चाहिए। इसके साथ ही सिद्धारमैया ने दलितों, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यक समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की पुरजोर पैरवी की है। मई में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी डीके शिवकुमार को सौंपी थी। ऐसे में उनकी ओर से आई इस नई मांग को राज्य सरकार के सामने एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
सामाजिक समीकरणों और नेतृत्व के बीच शक्ति संतुलन
सिद्धारमैया को राज्य में अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के सामाजिक गठबंधन यानी 'अहिंदा' के प्रमुख चेहरे के रूप में मान्यता प्राप्त है। वह स्वयं कुरुबा समुदाय से आते हैं, जो इस सामाजिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरी तरफ उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार राज्य के प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। कर्नाटक के दो बड़े और साधन संपन्न समुदायों, लिंगायत और वोक्कालिगा, ने इस सर्वे के आंकड़ों और इसकी विश्वसनीयता पर पहले ही गंभीर आपत्तियां जताई हैं। वोक्कालिगा समुदाय से आने के कारण डीके शिवकुमार के लिए इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को सीधे स्वीकार करना काफी संवेदनशील माना जा रहा है। यदि सर्वेक्षण के आंकड़े सार्वजनिक और लागू होते हैं, तो सत्तारूढ़ दल के पारंपरिक वोटबैंक में बिखराव का जोखिम पैदा हो सकता है, जिससे सरकार के भीतर भी शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।
राष्ट्रीय राजनीति और राज्य के धरातल में विरोधाभास
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में जातिगत जनगणना को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाकर चल रही है। पार्टी का तर्क है कि देश में विभिन्न वर्गों के लिए संसाधनों के न्यायसंगत वितरण, प्रतिनिधित्व और आरक्षण की नीतियां तय करने से पहले सभी समुदायों की सटीक आबादी का पता होना आवश्यक है। इसी आधार पर 2027 में होने वाली राष्ट्रीय जनगणना में आजादी के बाद पहली बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य सभी जातियों की अलग से गणना करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, कर्नाटक के संदर्भ में स्थिति थोड़ी अलग नजर आती है। पार्टी पर यह सवाल उठ रहे हैं कि जब राज्य में कांग्रेस की अपनी सरकार है और उसके पास जाति सर्वेक्षण के आंकड़े पहले से उपलब्ध हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने में संकोच क्यों किया जा रहा है।
भविष्य के सियासी असर और सरकार की स्थिरता
जातिगत आंकड़ों को उजागर करने और उनके आधार पर नीतियां बनाने का विषय अब केवल एक सर्वेक्षण रिपोर्ट तक सीमित नहीं रह गया है। यह कर्नाटक की राज्य सरकार के स्थायित्व और सामाजिक ताने-बाने की मजबूती से सीधे जुड़ गया है। राष्ट्रीय स्तर पर जिस जातिगत आंकड़े की मांग को लेकर विपक्षी दल लामबंद हो रहे हैं, उसी आंकड़े के राज्य स्तर पर क्रियान्वयन से ऐसे राजनीतिक नतीजे निकल सकते हैं जो सरकार को समर्थन देने वाले विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच असंतुलन पैदा कर दें। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के समर्थकों के बीच उभरती यह खींचतान आने वाले दिनों में राज्य प्रशासन के लिए एक नई चुनौती बनकर सामने आ सकती है।



















