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बिहार में अंग्रेजों का जेल कानून खत्म: 132 साल पुरानी व्यवस्था की जगह लेगा नया बंदी सुधार बिलराजनीति
6 घंटे पहले· 2

बिहार में अंग्रेजों का जेल कानून खत्म: 132 साल पुरानी व्यवस्था की जगह लेगा नया बंदी सुधार बिल

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की कैबिनेट ने 1894 के पुराने प्रिजंस एक्ट को रद्द करते हुए बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी है। अब राज्य की जेलें यातना घर की बजाय बंदियों के लिए कौशल विकास और पुनर्वास के आधुनिक केंद्र बनेंगी।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने बिहार की न्याय और दंड व्यवस्था में एक युगांतरकारी बदलाव का शंखनाद कर दिया है। सोमवार को राज्य मंत्रिमंडल की एक बेहद महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय बैठक आयोजित हुई, जिसमें एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया गया जो राज्य के प्रशासनिक और कानूनी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है। सरकार ने सर्वसम्मति से ब्रिटिश काल के दौरान लागू किए गए 132 वर्ष पुराने और बेहद दमनकारी 'प्रिजंस एक्ट, 1894' को पूरी तरह से समाप्त करने का साहसिक निर्णय लिया है। इस दकियानूसी और औपनिवेशिक कानून की विदाई के साथ ही, राज्य में एक नई व्यवस्था यानी 'बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026' को विधिवत रूप से मंजूरी प्रदान कर दी गई है। यह कदम केवल पन्नों पर किया गया एक कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि अपराधियों को देखने, समझने और उनके साथ व्यवहार करने के सरकारी और प्रशासनिक नजरिए में एक बहुत बड़ा परिवर्तन है। अब तक हमारी जेलों को केवल सजा काटने की अंधियारी और खौफनाक जगहों के रूप में देखा जाता था, लेकिन इस नई और प्रगतिशील व्यवस्था के लागू होने के बाद, इन्हें बंदी सुधार और मानवीय विकास के जीवंत, आधुनिक केंद्रों में तब्दील करने का मार्ग पूरी तरह से प्रशस्त हो गया है। सरकार का यह कदम मानवाधिकारों की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग माना जा रहा है।

अंग्रेजों के क्रूर कानून का काला अध्याय और उसका अंत

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि वर्ष 1894 में जब क्रूर ब्रिटिश हुकूमत ने प्रिजंस एक्ट लागू किया था, तब उनका मुख्य मकसद किसी को न्याय देना या सुधारना बिल्कुल नहीं था, बल्कि इसके पीछे भारतीयों की बुलंद आवाज को बेरहमी से कुचलने की गहरी साजिश थी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले महान भारतीय सेनानियों और अंग्रेजी राज के खिलाफ आवाज उठाने वाले विद्रोहियों को जेल की सीलन भरी सलाखों के पीछे डालकर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ देना ही इस काले कानून का एकमात्र लक्ष्य था। इस 132 साल पुराने अमानवीय मसौदे में कैदियों के लिए मानवाधिकार, उनके मानसिक स्वास्थ्य, गरिमा या समाज में उनकी सम्मानजनक वापसी (पुनर्वास) जैसे प्रगतिशील शब्दों का कोई अस्तित्व ही नहीं था। यह पूरी तरह से एक दमनकारी तंत्र था, जिसे केवल और केवल कैदियों पर कठोर नियंत्रण स्थापित करने, उन्हें डराने और उन्हें बाहरी दुनिया से एकदम अलग-थलग करके एकांतवास में धकेलने के लिए गढ़ा गया था। दुर्भाग्यवश, भारत की आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी, हमारे सिस्टम में यही सड़ी-गली व्यवस्था ज्यों की त्यों चलती रही। इस पुराने ढर्रे के कारण हमारी जेलें केवल अपराधियों को जानवरों की तरह बंद रखने और उन्हें कठोर यातनाएं देने का एक डरावना कोना बनकर रह गई थीं। अक्सर देखा जाता था कि छोटी-मोटी गलतियों के लिए जेल जाने वाला व्यक्ति इस अमानवीय माहौल से निकलने के बाद समाज का और भी बड़ा और खूंखार अपराधी बन जाता था।

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बदलते समय की मांग और नई चुनौतियों का सामना

जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ा, अपराध के तरीकों, समाज की संरचना और तकनीकी विकास में भारी बदलाव आया है। आज के दौर की प्रशासनिक और पुलिसिंग चुनौतियां 19वीं सदी से बिल्कुल अलग और बेहद जटिल हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की वर्तमान सरकार ने इस बात को बहुत ही गहराई से महसूस किया कि अंग्रेजों के जमाने के बनाए गए पुराने कानून के सहारे 21वीं सदी के आधुनिक युग के जेल प्रशासन को किसी भी सूरत में नहीं चलाया जा सकता। आज अपराधियों के सिंडिकेट और नेटवर्क बहुत ज्यादा हाई-टेक और जटिल हो गए हैं। कई बार ऐसी चिंताजनक खबरें आती रहती हैं कि खूंखार अपराधी जेलों के भीतर से ही अपना पूरा काला साम्राज्य और अपराध संचालित कर रहे हैं। ऐसे में जेलों को केवल चारदीवारी, ऊंची दीवारों और लोहे की मजबूत सलाखों तक सीमित रखना प्रशासनिक दृष्टिकोण से एक बहुत बड़ी भूल साबित हो रही थी। इसलिए, बदलते वक्त के साथ तेजी से तालमेल बिठाने और जेल प्रशासन के सामने हर दिन आ रही नई और खतरनाक चुनौतियों का डटकर मुकाबला करने के लिए इस पुराने, जंग लगे कानून को हमेशा के लिए कूड़ेदान में डालना बेहद जरूरी हो गया था।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों पर आधारित नया और मजबूत खाका

बिहार सरकार द्वारा उठाया गया यह ऐतिहासिक कदम रातों-रात या एकाएक उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि यह देश भर में चल रही एक बहुत ही व्यापक राष्ट्रीय सुधार प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने पूरे देश की खस्ताहाल जेल व्यवस्था को सुधारने और एकरूपता लाने के लिए 'मॉडल प्रिजंस एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट, 2023' नाम से एक बहुत ही विस्तृत और आधुनिक राष्ट्रीय मसौदा तैयार किया था। इसी मसौदे को मुख्य आधार बनाते हुए, केंद्र ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़ा निर्देश दिया था कि वे अपने स्थानीय नियमों, परंपराओं और राज्य की आवश्यकताओं के अनुसार अपने पुराने जेल कानूनों में आमूलचूल संशोधन करें। बिहार के गृह विभाग ने इसी अहम दिशा-निर्देश का पूरी गंभीरता से पालन करते हुए, राज्य की विशेष भौगोलिक स्थिति, स्थानीय अपराध की प्रकृति और वर्तमान प्रशासनिक जरूरतों का बहुत ही बारीकी से अध्ययन किया। इसके बाद, कानूनी जानकारों के साथ मिलकर एक ऐसा नया और अभेद्य विधेयक तैयार किया गया, जो राज्य की पूरी कानून व्यवस्था को आधुनिक चुनौतियों, सुरक्षा खतरों और नए जमाने के साइबर व संगठित अपराधों से निपटने में पूरी तरह से सक्षम और चुस्त-दुरुस्त बना सके।

खौफनाक कालकोठरी से आधुनिक कौशल विकास केंद्र तक का सफर

देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का स्पष्ट मानना है कि 'बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026' के पूरी तरह से जमीन पर उतरते ही राज्य की सभी जेलों की पूरी कार्यसंस्कृति हमेशा के लिए बदल जाएगी। इस नए कानून का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब किसी भी कैदी को केवल एक खूंखार अपराधी मानकर उसके साथ अमानवीय या क्रूर व्यवहार नहीं किया जाएगा। राज्य की जेलें अब खौफ पैदा करने वाली अंधियारी कालकोठरी नहीं रहेंगी, बल्कि वे सकारात्मक ऊर्जा, सुधार, शिक्षा और पुनर्वास का एक बहुत ही मजबूत और सुरक्षित गढ़ बनेंगी। कानून में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि सजा काट रहे बंदियों को समाज की मुख्यधारा से दोबारा कैसे जोड़ा जाए। इसके लिए, सरकार जेल परिसरों के भीतर ही कैदियों को विभिन्न प्रकार के वोकेशनल ट्रेनिंग और आधुनिक स्किल डेवलपमेंट कोर्स उपलब्ध कराएगी। उन्हें तकनीकी शिक्षा, कंप्यूटर ट्रेनिंग और हाथ का हुनर सिखाया जाएगा। इसके पीछे राज्य सरकार की दूरगामी सोच यह है कि जब भी कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी करके जेल की दहलीज से बाहर खुली हवा में कदम रखे, तो वह अपराध की अंधी दुनिया में वापस जाने के बजाय एक जिम्मेदार, सभ्य और आत्मनिर्भर नागरिक की तरह अपना और अपने परिवार का जीवन यापन कर सके।

नए विधेयक के तहत होने वाले प्रमुख और बड़े सुधार

इस नए कानून के दस्तावेजों में जेल व्यवस्था को पूरी तरह से जवाबदेह, पारदर्शी और कैदी-केंद्रित बनाने के लिए कई बहुत ही महत्वपूर्ण और कड़े प्रावधान किए गए हैं। सरकार का पूरा ध्यान अब बंदियों को केवल सजा देने पर नहीं, बल्कि उन्हें एक बेहतर इंसान बनाकर वापस समाज को सौंपने पर केंद्रित है। इसमें जेलों को केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक मायनों में सुधारात्मक केंद्र के रूप में विकसित करना प्रमुख रूप से शामिल है। कैदियों से सिर्फ कठोर शारीरिक श्रम ही नहीं करवाया जाएगा, बल्कि उनके लिए उनकी रुचि के अनुसार व्यावसायिक प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था की जाएगी ताकि वे बाहर जाकर अपनी आजीविका सम्मान से कमा सकें। इसके अलावा, कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य पर अब पहले से कहीं अधिक विशेष ध्यान दिया जाएगा। अक्सर देखा गया है कि जेल के तनावपूर्ण और घुटन भरे माहौल में कैदी गंभीर डिप्रेशन और अवसाद का शिकार हो जाते हैं, इसलिए उनके लिए नियमित मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग और विशेष पुनर्वास कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाएगा। बंदियों के बुनियादी मानवाधिकारों और उनकी गरिमा की हर हाल में रक्षा की जाएगी, ताकि वे अपने इंसान होने का अहसास कभी न खोएं। साथ ही, पूरे जेल प्रबंधन को समाज और कानून के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने के लिए नए सिरे से कड़े नियम बनाए गए हैं।

आधुनिक हाई-टेक तकनीक और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का अद्भुत संगम

जहां एक ओर यह नया कानून कैदियों के अधिकारों, उनके स्वास्थ्य और उनके सुधार की पुरजोर वकालत करता है, वहीं दूसरी ओर यह जेलों की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जरा सा भी समझौता नहीं करता। इस नए विधेयक में जेल के पूरे प्रशासनिक ढांचे को नए जमाने के आधुनिक गैजेट्स और हाई-टेक सुरक्षा तकनीक से लैस करने का बहुत ही स्पष्ट और सख्त प्रावधान है। पूरे परिसर में हर जगह हाई रेजोल्यूशन सीसीटीवी कैमरे, अत्याधुनिक बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम, और मोबाइल सिग्नल रोकने के लिए पावरफुल जैमर जैसी तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल हर हाल में सुनिश्चित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, जेलों के भीतर कैदियों के स्वास्थ्य की नियमित जांच, उच्च स्तरीय साफ-सफाई और उन्हें समय पर कानूनी सहायता मुहैया कराने के लिए बहुत ही सख्त और स्पष्ट नियम तय किए गए हैं। इन सभी बड़े और कड़े कदमों के लागू होने से जेलों के अंदर पनपने वाले भ्रष्टाचार, गुटबाजी और संदिग्ध आपराधिक गतिविधियों पर सरकार का सीधा और करारा प्रहार होगा और पूरी प्रणाली में भारी पारदर्शिता आएगी।

कैबिनेट का ऐतिहासिक फैसला और एक सुनहरे भविष्य की राह

सोमवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में संपन्न हुई राज्य कैबिनेट की यह उच्च स्तरीय बैठक कई मायनों में बहुत अहम रही। इस मैराथन बैठक में कुल 10 अलग-अलग विकास और प्रशासनिक प्रस्तावों पर मुहर लगाई गई, लेकिन पूरे राज्य और प्रशासनिक हलकों में सबसे अधिक और सबसे तेज चर्चा सिर्फ 'प्रिजन्स एक्ट, 1894' को निरस्त करने की ही हो रही है। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा सिर्फ अपने स्वार्थ और फायदे के लिए बनाया गया वह काला कानून आज के लोकतांत्रिक और स्वतंत्र भारत में पूरी तरह से बेमानी और अप्रासंगिक हो चुका था। आज की आधुनिक दंड व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य किसी से बदला लेना नहीं, बल्कि उसे सुधार कर मुख्यधारा में लाना है, और वर्तमान जेल व्यवस्था की जरूरतें उस पुराने कानून की संकीर्ण सोच से कोसों दूर जा चुकी थीं। यदि 'बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026' को इसके मूल स्वरूप, इसकी सच्ची भावना और पूरी सख्ती के साथ राज्य भर में प्रभावी ढंग से लागू कर दिया जाता है, तो यह निश्चित रूप से बिहार की पूरी जेल व्यवस्था में पिछले एक सदी से भी अधिक समय में हुआ सबसे बड़ा, सबसे क्रांतिकारी और ऐतिहासिक बदलाव साबित होगा, जो पूरे देश के लिए एक नजीर बन सकता है।

सवाल-जवाब

बिहार में किस पुराने जेल कानून को खत्म किया गया है?
राज्य सरकार ने अंग्रेजों के समय बनाए गए 132 साल पुराने 'प्रिजंस एक्ट 1894' को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।
पुराने कानून की जगह कौन सा नया बिल लाया गया है?
पुराने कानून को हटाकर अब राज्य में 'बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026' लागू किया जाएगा।
यह ऐतिहासिक फैसला किसकी अध्यक्षता में लिया गया?
यह फैसला सोमवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया।
नए जेल कानून का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य जेलों को यातना गृह की बजाय कैदियों के सुधार, पुनर्वास और स्किल डेवलपमेंट के आधुनिक केंद्र के रूप में विकसित करना है।
क्या जेलों की सुरक्षा व्यवस्था में भी कोई बदलाव होगा?
हां, नए कानून के तहत जेलों की आंतरिक सुरक्षा और प्रशासन को सीसीटीवी और बायोमेट्रिक जैसे आधुनिक तकनीकी गैजेट्स के इस्तेमाल से हाई-टेक और पारदर्शी बनाया जाएगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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