भारतीय राजनीति में चुनाव आयोग और केंद्रीय सत्ता को घेरने का सिलसिला नया नहीं है, लेकिन हाल ही में विपक्ष के एक और बड़े दावे की हवा निकल चुकी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक अंग्रेजी समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य आयुक्तों की असहमति या उपेक्षा करते हुए विशेष मतदाता पुनरीक्षण को लेकर अपनी मर्जी से फैसले लिए। इस एक रिपोर्ट को आधार बनाकर देश भर में सियासी भूचाल लाने की कोशिश की गई। कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ उसके सहयोगी दलों ने भी इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाया और प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर प्रदर्शनों का दौर शुरू कर दिया। यहाँ तक कि हाल ही में चर्चा में आई काक्रोच जनता पार्टी ने भी इस प्रकरण में कूदते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए अड़तालीस घंटे का अल्टीमेटम तक जारी कर दिया था। हालांकि, तीनों चुनाव आयोग के सदस्यों ने एक साझा बयान जारी कर इन सभी अटकलों और आरोपों को खारिज कर दिया, जिससे विपक्ष की रणनीति एक बार फिर धरी की धरी रह गई।
राफेल से लेकर हिंडनबर्ग तक, हर मोर्चे पर अदालत से लगे झटके
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही राहुल गांधी ने सरकार और संवैधानिक संस्थाओं पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश या तो अदालत में साबित नहीं हो पाए या उन्हें मुंह की खानी पड़ी। कई मामलों में तो उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत से कड़ी फटकार तक सुननी पड़ी और माफी तक मांगने की नौबत आ गई। इस कड़ी की शुरुआत फ्रांस के साथ हुए राफेल विमान सौदे से हुई थी, जिसमें उन्होंने वित्तीय अनियमितताओं का दावा किया था। उन्होंने देश का पैसा चोरी कर अपने किसी उद्योगपति मित्र को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाते हुए चौकीदार चोर है का नारा उछाला था। यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचा, जहाँ दिसंबर 2018 में अदालत ने खरीद प्रक्रिया में किसी भी तरह की खामी से इनकार किया। इसके बाद नवंबर 2019 में तमाम पुनर्विचार याचिकाओं को पूरी तरह खारिज करते हुए अदालत ने सरकार को क्लीन चिट दे दी। इस बयानबाजी के चलते भाजपा नेमीनाक्षी लेखी के जरिए राहुल गांधी के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा दायर किया, जिसके बाद उन्हें बिना शर्त लिखित माफी मांगनी पड़ी और अदालत ने भविष्य के लिए कड़ी चेतावनी दी। इसके अलावा अमेरिकी फर्म हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सामने आने पर भी उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक यह दावा किया कि सरकार सार्वजनिक संपत्तियों और बंदरगाहों को चुराकर एक खास उद्योग समूह को सौंप रही है। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2024 में विशेष जांच दल या सीबीआई से जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि बाजार नियामक की जांच में किसी भी प्रकार की नियामक विफलता के सबूत नहीं मिले हैं।
पीएम केयर्स फंड और चुनाव आयोग पर बेबुनियाद दावे
विवादों की इस श्रृंखला में महामारी के दौर में स्थापित किए गए पीएम केयर्स फंड को भी नहीं छोड़ा गया। कांग्रेस पार्टी ने इसकी पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हुए यह आरोप लगाया कि इस फंड के जरिए जनता और कंपनियों से जुटाए गए पैसों का कोई ऑडिट नहीं हो रहा है और सत्ताधारी दल इसका दुरुपयोग कर रहा है। इस संबंध में एक जनहित याचिका दायर कर इस राशि को राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी, जिसे सर्वोच्च अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि यह फंड एक पूरी तरह वैध सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है और इसके पैसे को जबरन सरकारी खाते में ट्रांसफर करने का कोई भी कानूनी आधार नहीं बनता है। इसी तरह चुनाव आयोग को लेकर भी उनका आक्रामक रवैया पुराना है। वे लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुँचाने के लिए वोटों की चोरी कर रहा है। विशेष मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से ही उन्होंने यह राग अलापना शुरू कर दिया था कि मतदाता सूचियों में फर्जी नाम जोड़े जा रहे हैं और आंकड़ों में हेरफेर हो रही है। निर्वाचन आयोग ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह निराधार करार दिया और यह भी स्पष्ट किया कि इन दावों के समर्थन में नियमों के मुताबिक कोई भी आवश्यक कानूनी शपथ पत्र जमा नहीं किया गया था।
नवीनतम विवाद और विपक्षी एकजुटता का हस्र
ताज़ा मामले में जब एक मीडिया संस्थान में यह छपा कि मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी आयुक्तों की राय को दरकिनार कर अपने फैसले खुद थोप रहे हैं, तो इसे एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसके आधार पर देशव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाने लगी और यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इस मुहीम में उनके साथ खड़ी नजर आईं। विपक्षी गठबंधन की आगामी बैठक की तारीख भी तीस सितंबर तय कर दी गई ताकि इस मुद्दे पर आक्रामक रणनीति बनाई जा सके। लेकिन इन सब तैयारियों के बीच चुनाव आयुक्तों के संयुक्त बयान ने इस पूरे नैरेटिव की पोल खोल दी। आयुक्तों ने स्पष्ट कर दिया कि जो खबरें फैलाई जा रही हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है और फैसले पूरी तरह से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इस तरह एक बार फिर तथ्यों के अभाव में विपक्ष का यह प्रोपेगैंडा धड़ाम हो गया और उनके दावों की कलाई सबके सामने खुल गई।



















