कांग्रेस के गलियारों में इन दिनों एक सवाल बार-बार लौट रहा है — क्या 83 वर्षीय पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अब संगठन के लिए ताकत रह गए हैं या बोझ बनते जा रहे हैं? केरल में मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान को लेकर हुई लंबी रस्साकशी ने इस बहस को और हवा दे दी है, और इसी के साथ पार्टी के एक तबके में उनकी कार्यशैली को लेकर असहजता खुलकर सामने आने लगी है।
'ताकत' या 'बोझ' की बहस
पार्टी के भीतर एक वर्ग का मानना है कि खरगे का नेतृत्व अब संगठन को मजबूती देने के बजाय उस पर भारी पड़ रहा है। यही धारणा इस चर्चा को भी जन्म दे रही है कि गांधी परिवार के साथ उनके रिश्तों में पहले जैसी गर्माहट नहीं रही और दूरी की अटकलें तेज हो गई हैं।
'एक व्यक्ति, एक पद' की अनदेखी का आरोप
TrendKia के अनुसार, पार्टी के कुछ नेता यह शिकायत कर रहे हैं कि खरगे खुद 'एक व्यक्ति, एक पद' के सिद्धांत पर खरे नहीं उतर रहे। एक ओर वे कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाल रहे हैं, तो दूसरी ओर राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी उन्हीं के पास है। आलोचकों का तर्क है कि जब संगठन और संसदीय राजनीति — दोनों की कमान एक ही व्यक्ति के हाथ में हो, तो उभरते हुए नए नेताओं को आगे बढ़ने की जगह ही नहीं मिल पाती।
परिवारवाद के आरोप
TrendKia ने यह भी बताया कि खरगे पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लग रहा है। इसकी ताजा मिसाल के तौर पर उनके बेटे प्रियंक खरगे को गिनाया जा रहा है, जिन्हें कर्नाटक की डीके शिवकुमार सरकार में गृह मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। गौरतलब है कि खरगे खुद 83 साल की उम्र में दोबारा सांसद चुने गए हैं, और परिवार व करीबियों को मिल रही तरजीह इस आलोचना को और धार दे रही है।
राज्यसभा टिकटों पर 'करीबियों' को तरजीह
नाराजगी सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं है। राज्यसभा चुनावों में भी खरगे के नजदीकी लोगों को आगे रखे जाने की चर्चा है। झारखंड से उनके सहयोगी प्रणव झा को टिकट दिए जाने पर पार्टी के कई नेताओं ने खुलकर असंतोष जताया। यह पहली बार नहीं है — इससे पहले राजस्थान से भी उनके करीबी नीरज डांगी को राज्यसभा भेजा जा चुका है। इन्हीं फैसलों के सिलसिले ने इस धारणा को मजबूत किया है कि शीर्ष पद पर बैठे नेता अपने भरोसेमंद चेहरों को ही आगे बढ़ा रहे हैं।













