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राष्ट्रगीत पर नया फैसला कांग्रेस के लिए बना गले की फांस, अंदरूनी नाराजगी के बीच बीजेपी को मिला हमलावर होने का मौकाराजनीति
21 अग॰ 2026, 6:55 pm (1 घंटे पहले)· 2

राष्ट्रगीत पर नया फैसला कांग्रेस के लिए बना गले की फांस, अंदरूनी नाराजगी के बीच बीजेपी को मिला हमलावर होने का मौका

कांग्रेस वर्किंग कमेटी द्वारा पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सिर्फ दो छंद गाने के फैसले पर आंतरिक विवाद खड़ा हो गया है, जिससे विपक्षी दलों को तीखा हमला करने का अवसर मिल गया है।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी द्वारा अपनी संगठनात्मक बैठकों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंदों को गाने से जुड़ा प्रस्ताव पारित करने के बाद देश की राजनीति में नया उबाल आ गया है। पार्टी की सर्वोच्च फैसला लेने वाली संस्था ने इस निर्णय के समर्थन में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1937 में अपनाए गए एक ऐतिहासिक रुख का हवाला दिया है। हालांकि, यह कदम अब पार्टी के भीतर ही तीखी आलोचना और असंतोष का कारण बन गया है। पार्टी के कई वरिष्ठ रणनीतिकारों और नेताओं का मानना है कि जब विपक्षी खेमा केंद्र सरकार को विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर घेरने में सफल हो रहा था, उस समय इस प्रकार का संवेदनशील प्रस्ताव लाकर पार्टी ने प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत राजनीतिक हथियार थमा दिया है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल ने इस मुद्दे को राष्ट्रभक्ति से जोड़ते हुए आक्रामक रुख अपना लिया है, जिससे कांग्रेस के लिए राजनीतिक और सांगठनिक संतुलन बनाए रखना कठिन साबित हो रहा है।

आंतरिक नाराजगी और राजनीतिक रणनीति पर सवाल

पार्टी की अंदरूनी बैठकों और गलियारों में इस फैसले को लेकर गहरा असंतोष देखा जा रहा है। कई प्रमुख नेताओं ने आधिकारिक नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं। संगठन से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने खेल की शब्दावली का उपयोग करते हुए इस स्थिति को समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम क्रिकेट मैच में फेंकी गई किसी ‘वाइड बॉल’ की तरह था, जिसे बल्लेबाज को बिना छेड़े आसानी से जाने देना चाहिए था। उनका कहना था कि इस अप्रासंगिक मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने या नया रुख अपनाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।

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रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उस समय देश के भीतर छात्रों की विभिन्न मांगों, शैक्षणिक भविष्य से जुड़ी चिंताओं और अयोध्या स्थित राम मंदिर निर्माण न्यास में चंदा चोरी के गंभीर आरोपों को लेकर केंद्र सरकार बैकफुट पर दिखाई दे रही थी। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जब मुख्य विपक्षी दल इन राष्ट्रीय विषयों पर सरकार को सहजता से घेर रहा था, तब राष्ट्रगीत के छंदों पर रुख स्पष्ट करने के फैसले ने पूरे राजनीतिक विमर्श का रुख बदल दिया। वरिष्ठ सदस्यों का मानना है कि पार्टी को उस राजनीतिक पिच पर खेलने से बचना चाहिए था जहां प्रतिद्वंद्वी दल स्वभाविक रूप से अधिक मजबूत स्थिति में रहता है।

संसद में विधेयक पारित होने के दौरान पार्टी का रुख

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि संसद के हालिया मानसून सत्र से भी जुड़ी हुई है, जहां राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 को पारित किया गया। इस विधायी संशोधन का प्राथमिक उद्देश्य वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समकक्ष वैधानिक और आधिकारिक दर्जा प्रदान करना है। संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में 30 जुलाई को यह महत्वपूर्ण विधेयक मात्र 15 मिनट के भीतर बिना किसी विस्तृत चर्चा या बहस के पास कर दिया गया। उस समय सदन में विपक्ष के अन्य घटकों जैसे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के प्रतिनिधि विभिन्न मुद्दों को लेकर भारी हंगामा कर रहे थे। उसी शोरगुल के बीच विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया और उस समय कांग्रेस की ओर से कोई संगठित या औपचारिक विरोध दर्ज नहीं कराया गया।

बाद में पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने स्वीकार किया कि संसद के भीतर जारी हंगामे के कारण इस विधेयक का प्रभावी विरोध नहीं हो सका। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विधेयक पारित होने के बाद भी पार्टी ने सदन के बाहर मीडिया के समक्ष अपनी बात स्पष्टता से नहीं रखी। जबकि परिसीमन प्रक्रिया और विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) में किए गए संशोधनों जैसे अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर पार्टी ने सार्वजनिक मंचों और संवाददाताओं के सामने कड़ा रुख अपनाया था। अचानक वंदे मातरम के गायन पर अपनी स्थिति सीमित करने के फैसले से पार्टी जनता और कार्यकर्ताओं के बीच असहज स्थिति में आ गई है।

अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा दी गई कानूनी व्याख्या

विवाद के तूल पकड़ने के बाद कांग्रेस के विधिक विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने पार्टी नेतृत्व के बचाव में कानूनी तर्क प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने कानून के विभिन्न प्रावधानों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए सार्वजनिक तथा निजी आयोजनों के बीच के अंतर को रेखांकित किया। सिंघवी ने स्पष्ट किया कि राष्ट्र गौरव से जुड़ा संशोधित कानून केवल आधिकारिक, सरकारी और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों पर लागू होता है। उनका कहना था कि यह कानून किसी नागरिक के व्यक्तिगत आवास, निजी होटल या किसी स्वतंत्र संस्थान में आयोजित होने वाले निजी कार्यक्रमों पर कोई बाध्यकारी नियम थोपता नहीं है।

सिंघवी का विधिक तर्क यह है कि विधायिका द्वारा पारित कानून राष्ट्रगीत को किसी विशेष या अनिवार्य तरीके से गाने के लिए बाध्य नहीं करता। कानून का मुख्य उद्देश्य केवल राष्ट्रगीत के गायन में जानबूझकर बाधा डालने, व्यवधान उत्पन्न करने या इसका अनादर करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कांग्रेस ने केवल अपनी पार्टी के आंतरिक संगठनात्मक सम्मेलनों और बैठकों के लिए यह व्यवस्था बनाई है, न कि किसी सरकारी समारोह के लिए। इसके साथ ही उन्होंने प्रतिद्वंद्वी दल पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्रभक्ति को छह छंदों की परीक्षा में जबरन बांधने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि कांग्रेस ने ही अपने समृद्ध इतिहास में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान सम्मानजनक दर्जा दिया था।

कन्हैया कुमार की सफाई और 1937 के प्रस्ताव का संदर्भ

पार्टी नेतृत्व की ओर से 1937 के निर्णय को आधार बनाकर इस कदम का औचित्य सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी के लिए अपने वैचारिक रुख को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक था। उनका मानना था कि यदि शीर्ष नेतृत्व इस विषय पर अपना स्टैंड साफ नहीं करता, तो पार्टी कार्यकर्ताओं और निचले स्तर के कैडर में भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक धरोहर की रक्षा करना पार्टी का मुख्य दायित्व है।

कन्हैया कुमार के अनुसार, वर्ष 1937 में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान विचारकों ने सार्वजनिक सभाओं में वंदे मातरम के केवल प्रथम दो छंदों के गायन का समर्थन किया था ताकि सर्वसमावेशी माहौल बना रहे। उन्होंने तर्क दिया कि पार्टी केवल उसी ऐतिहासिक विरासत का अनुसरण कर रही है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ऐतिहासिक संदर्भ प्रतिद्वंद्वी दलों द्वारा किए जा रहे तीखे हमलों की धार को कम करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है।

विभिन्न राज्यों में असमंजस और अलग-अलग व्यवस्थाएं

केंद्रीय स्तर पर लिए गए इस फैसले का सीधा असर विभिन्न राज्यों में पार्टी की इकाइयों और प्रांतीय सरकारों पर देखने को मिला है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर आयोजित आधिकारिक और सांगठनिक कार्यक्रमों में इस नीतिगत अनिश्चितता का प्रभाव स्पष्ट उजागर हुआ। कांग्रेस द्वारा शासित राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान राष्ट्रगीत वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन पूर्ण सम्मान के साथ किया गया। इसके अलावा, झारखंड में भी जहां कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन में एक कनिष्ठ सहयोगी के रूप में शामिल है, पूरे राष्ट्रगीत का गायन हुआ।

इसके ठीक विपरीत, केरल राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे ने अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान राष्ट्रगीत के गायन से परहेज करने का रुख अपनाया। उत्तर से लेकर दक्षिण तक विभिन्न राज्यों में दिखा यह विरोधाभास दर्शाता है कि एक संवेदनशील राष्ट्रीय विषय पर स्पष्ट और सुसंगत नीति का अभाव पार्टी के प्रांतीय संगठनों में किस प्रकार की विसंगति उत्पन्न कर रहा है।

सवाल-जवाब

कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने वंदे मातरम को लेकर क्या नया फैसला लिया है?
कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रस्ताव पास करके निर्देश दिया है कि पार्टी के आंतरिक आयोजनों में वंदे मातरम के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे।
कांग्रेस अपने इस निर्णय के समर्थन में किस ऐतिहासिक मिसाल का हवाला दे रही है?
पार्टी 1937 के एक ऐतिहासिक प्रस्ताव का हवाला दे रही है, जिसमें महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर ने सार्वजनिक सभाओं में शुरुआती दो छंदों के गायन का समर्थन किया था।
राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 क्या प्रावधान करता है?
यह नया संसदीय कानून वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन के समान वैधानिक दर्जा प्रदान करता है और इसके गायन में व्यवधान डालने पर रोक लगाता है।
अभिषेक मनु सिंघवी ने पार्टी का बचाव करते हुए क्या कानूनी स्पष्टीकरण दिया?
अभिषेक मनु सिंघवी ने स्पष्ट किया कि नया कानून केवल आधिकारिक सरकारी कार्यक्रमों पर लागू होता है, निजी या पार्टी के आंतरिक आयोजनों में सभी छंद गाना अनिवार्य नहीं बनाता।
स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस शासित राज्यों में इस फैसले का क्या असर देखा गया?
हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और झारखंड में पूरा वंदे मातरम गाया गया, जबकि केरल में पार्टी नेतृत्व वाले मंचों पर इसके गायन से परहेज किया गया।
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