उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2027 में आने वाले समय में भले ही वक्त हो, लेकिन डिजिटल मंचों पर राजनीतिक दलों के बीच घमासान अभी से चरम पर पहुंच चुका है। पारंपरिक रैलियों और सभाओं से कहीं ज्यादा आक्रामक तेवर अब एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर देखने को मिल रहे हैं। राजनीतिक दलों की डिजिटल टीमें हर रोज नए सियासी नैरेटिव गढ़ने में जुटी हैं।
कानून-व्यवस्था और बुलडोजर की सियासत
सोशल मीडिया पर सबसे तीखा टकराव राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर बना हुआ है। सत्तारूढ़ दल के सोशल मीडिया हैंडल्स लगातार साल 2017 से पहले की स्थितियों और मौजूदा दौर की तुलना करते हुए वीडियो और इंफोग्राफिक्स साझा कर रहे हैं। अपराध पर लगाम और अपराधियों के खिलाफ की जाने वाली सख्त कार्रवाई को पार्टी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों के खास अंशों को शॉर्ट वीडियो के जरिए बड़े पैमाने पर प्रसारित किया जाता है ताकि सुरक्षा का संदेश घर-घर तक पहुंच सके।
समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव का पलटवार
इस डिजिटल आक्रामकता के जवाब में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के आधिकारिक हैंडल्स पुलिसिया कार्रवाई और एनकाउंटर पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं। पार्टी का पक्ष है कि इस तरह की कार्रवाई में पारदर्शिता का अभाव है और एकतरफा कदम उठाए जा रहे हैं। पुलिस हिरासत में हुई मौतों और उठाए गए अन्य कदमों के आंकड़ों को पेश कर कानून-व्यवस्था के दावों पर सवालिया निशान लगाए जाते हैं, जिससे सरकार को घेरा जा सके।
सांस्कृतिक हिंदुत्व बनाम पीडीए फॉर्मूला
विचारधारा के स्तर पर दोनों दल अपने पारंपरिक और नए मतदाताओं को साधने के लिए डिजिटल अभियानों का सहारा ले रहे हैं। एक तरफ धार्मिक स्थलों के विकास और भव्य आयोजनों की हाई-क्वालिटी रील्स के जरिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाई जा रही है, तो दूसरी तरफ कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के अनुभव साझा किए जा रहे हैं। इसके विपरीत, विपक्षी खेमे ने अपने पूरे डिजिटल अभियान को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के इर्द-गिर्द केंद्रित कर रखा है। जातीय जनगणना की मांग और आरक्षण को लेकर उठाए जाने वाले मुद्दों के जरिए लगातार माहौल तैयार किया जा रहा है।
विकास, परिवारवाद और बेरोजगारी के मुद्दे
आर्थिक और विकास के मोर्चे पर भी जुबानी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। पुराने शासनकाल की कमियों और पारिवारिक राजनीति को आधार बनाकर डिजिटल कार्टून और वीडियो सीरीज चलाई जाती हैं, ताकि जनता के बीच पुराने समय की यादें ताजा रखी जा सकें। इसके जवाब में विपक्षी दल युवाओं से जुड़े बेहद संवेदनशील मुद्दों जैसे भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक, बढ़ती बेरोजगारी और संविदा नौकरियों के हालात को सामने लाते हैं। युवाओं के प्रदर्शन और खाली पदों की सूचियां साझा करके सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाता है।
लोकल इन्फ्लुएंसर्स और मीम पेजेस की भूमिका
इस सियासी मुकाबले को और धार देने का काम हजारों की संख्या में सक्रिय पॉलिटिकल मीम पेजेस और स्थानीय डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स कर रहे हैं। पेशेवर रचनाकारों के जरिए जहां सरकारी योजनाओं का प्रचार किया जा रहा है, वहीं व्यंग्यात्मक मीम्स और चुनावी गानों के माध्यम से युवाओं का समर्थन जुटाने की कोशिशें जारी हैं। साल 2027 का यह मुकाबला अब केवल पोलिंग बूथ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मतदाताओं के स्मार्टफोन की स्क्रीन पर भी पूरी शिद्दत के साथ लड़ा जा रहा है।


















