नई दिल्ली। राजनीति के गलियारों में संवाद की अनूठी शैली और हर वर्ग के साथ तुरंत जुड़ाव बना लेने की कला नरेंद्र मोदी को एक अलग पहचान देती है। उनका यह सफर गुजरात से शुरू होकर देश की राजधानी दिल्ली के तख्त तक पहुंचा है। आज के बदलते दौर में जब तौर-तरीके डिजिटल हो चुके हैं, तब उन्होंने मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से अपनी बात सीधे युवा पीढ़ी तक पहुंचाई है। एक ऐसा राजनीतिक नेतृत्व जिसे चुनौती देना या पस्त करना लगभग असंभव सा साबित हुआ है, वह हर नए माध्यम को अपने पक्ष में ढालना बखूबी जानता है।
जेन-जी के बीच डिजिटल संवाद की नई शुरुआत
हाल ही में जब सोशल मीडिया के जरिए एक खास अंदाज में संवाद की शुरुआत हुई, तो विरोधियों के वे तमाम नैरेटिव एक झटके में ध्वस्त हो गए जो युवा वर्ग के रोष को लेकर बुने जा रहे थे। जब देश के कई हिस्सों में पेपर लीक का शोर गूंज रहा था और यह मुद्दा संसद की चौखट तक पहुंच चुका था, तब युवाओं में भारी नाराजगी थी। विपक्ष की ओर से लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाने की रणनीतियां बनाई जा रही थीं। ऐसे संवेदनशील माहौल में प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश साझा किया। उसमें उन्होंने युवाओं को सीधे ‘फ्रेंड्स’ कहकर संबोधित किया, जिससे उनकी संवेदनशीलता और संप्रेषण कला साफ झलक उठी। इस एक कदम ने विरोधियों की तमाम चालों को कमजोर कर दिया।
गुजरात के कार्यक्रम में दिखा अनूठा उत्साह
मोबाइल स्क्रीन के जरिए शुरू हुआ यह संवाद केवल वर्चुअल दुनिया तक सीमित नहीं रहा। इसके बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के एक कार्यक्रम में पहुंचे, तो वहां युवाओं ने उनका स्वागत बिल्कुल आधुनिक और जेन-जी अंदाज में किया। युवाओं ने उनके समर्थन में जो पोस्टर बनाए, वे पारंपरिक पेन और कागज से नहीं बल्कि मोबाइल फोन की स्क्रीन पर तैयार किए गए थे। उस आयोजन में नए स्टाइल के ट्रेंडिंग गाने, क्रिएटिव डिजिटल पोस्टर और एक भव्य एंट्री देखने को मिली, जिसने यह साबित कर दिया कि वह हर पीढ़ी के साथ कितनी सहजता से तालमेल बिठा लेते हैं।
जब बिना माइक के 40 मिनट तक बोलते रहे
मंचों से उनकी आवाज हमेशा से विशाल भीड़ को खींचने और राजनीतिक विरोधियों को परास्त करने में असरदार रही है। किसी भी वक्ता के लिए बीच भाषण में बिजली चले जाना एक बड़ी परेशानी बन सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी बाधाओं को भी अपनी खूबी में बदल दिया है। उत्तराखंड के मुकेश कोली ने ‘मोदी स्टोरी’ के दौरान एक ऐसी ही पुरानी घटना का जिक्र किया था। उन्होंने बताया कि साल 2007 में पौड़ी में बिजली की भारी समस्या के बीच जब तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एक रैली को संबोधित कर रहे थे, तब उन्होंने इस विकट स्थिति का सामना कैसे किया। उन्होंने तमाम प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए जनता को अपने बेहद करीब बुलाया और बिना किसी माइक के पूरे 40 मिनट तक लगातार लोगों को संबोधित किया।
कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ाव और सम्मान की मिसाल
आम जनता के साथ-साथ पार्टी के भीतर भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ भी उनका जुड़ाव बेहद मजबूत है। वे अपने हर एक व्यवहार से यह साबित करते हैं कि भाजपा वास्तव में कार्यकर्ताओं की ही पार्टी है। चाहे पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष हो या फिर बूथ स्तर पर काम करने वाला सामान्य कार्यकर्ता, नरेंद्र मोदी हर किसी के साथ पूरी मजबूती के साथ खड़े नजर आते हैं। नितिन नवीन ने उनसे जुड़ा एक बेहद प्रेरणादायक प्रसंग साझा किया था। उन्होंने बताया कि जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक बिहार में हुई थी और पटना में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया था, तब देश भर से बड़े नेता पहुंच रहे थे।
पटना की वह घटना जब कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंचे पीएम
नितिन नवीन ने उस वाकये को याद करते हुए बताया कि जब सभी बड़े नेता अपनी गाड़ियों में बैठकर रवाना हो रहे थे, तब स्वागत के लिए मौजूद स्थानीय नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को बताया कि बाहर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता खड़े हैं। यह सुनते ही उन्होंने कहा कि हम उन सभी कार्यकर्ताओं से मिलते हुए आगे बढ़ेंगे। इसके बाद वह पैदल ही बाहर आए, कार्यकर्ताओं द्वारा लाई गई मालाओं को अपने हाथों में लिया और हर एक का अभिवादन करते हुए उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद ही वे अपनी गाड़ी में सवार होकर वहां से रवाना हुए। यह छोटा सा संस्मरण पार्टी के सामान्य कार्यकर्ताओं के प्रति उनके मन में मौजूद सर्वोच्च सम्मान के भाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
नेतृत्व की नई शैली और चिंतन शिविर का अनुभव
शासन और प्रशासन के स्तर पर भी उनकी कार्यशैली हमेशा अपनी टीम को आगे बढ़ाने वाली रही है। उन्होंने खुद को अक्सर पीछे रखकर अपनी टीम को नेतृत्व करने और नए प्रयोग करने के पूरे अवसर दिए हैं। एक पूर्व नौकरशाह ने गुजरात के मुख्यमंत्री के कार्यकाल से जुड़ा एक वाकया साझा किया था। उन्होंने ‘मोदी स्टोरी’ में बताया कि जब भी ‘चिंतन शिविर’ की शुरुआत होती थी, तो वहां मंत्री, सचिव और कलेक्टर सभी मौजूद होते थे। खास बात यह होती थी कि मोदी जी खुद जान-बूझकर पीछे की पंक्ति में बैठते थे। वह हर एक बात को बेहद गौर से सुनते और पूरी गंभीरता के साथ चर्चा में हिस्सा भी लेते थे।
सहभागिता और खुले संवाद को बढ़ावा
उस पूर्व नौकरशाह के अनुसार, ऐसा कभी नहीं हुआ कि उस शिविर में किसी की सहभागिता न हो। प्रधानमंत्री न केवल दूसरों को अपने विचार रखने और वक्ताओं से सवाल पूछने के लिए प्रेरित करते थे, बल्कि कई बार तीखे और महत्वपूर्ण सवाल खुद उनकी तरफ से ही आते थे। कई मौकों पर तो बातचीत की शुरुआत भी वही किया करते थे। वहां उनका रवैया किसी मुख्य कार्यकारी अधिकारी या हुक्म चलाने वाले की तरह नहीं, बल्कि एक सक्रिय प्रतिभागी का होता था। वे चुपचाप चीजों को बहुत बारीकी से देखते-समझते थे और हर चर्चा में पूरी ऊर्जा के साथ शामिल होते थे, जो उनके प्रशासनिक कौशल का एक अनूठा पहलू है।





















