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ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा भारत, अमेरिकी टैरिफ के बीच विदेश मंत्रालय ने साफ की नीतिराजनीति
17 सित॰ 2026, 11:24 am (7 घंटे पहले)· 0

ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा भारत, अमेरिकी टैरिफ के बीच विदेश मंत्रालय ने साफ की नीति

अमेरिकी संसद में रूस और ईरान पर प्रतिबंध से जुड़े विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने दो टूक कहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बाजार की शर्तों पर तेल और गैस की खरीद जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में अमेरिका के सामने कड़ा रुख अपनाया है।

अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 'सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' के पारित होने के बाद भारत ने वॉशिंगटन को बेहद कड़ा और स्पष्ट कूटनीतिक संदेश दे दिया है। विदेश मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया है कि देश की 140 करोड़ से ज्यादा आबादी की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। वैश्विक ऊर्जा बाजार की वास्तविकताओं और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप भारत अलग-अलग और विविध स्रोतों से अपनी जरूरत का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदता रहेगा। 16 सितंबर 2026 को अमेरिकी विधायी प्रक्रिया के तहत पारित इस नए कानून में उन तमाम देशों पर भारी और अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान रखा गया है जो रूस से ऊर्जा संसाधनों का आयात जारी रखते हैं, जिससे भारत जैसी विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रभावित होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

नई दिल्ली ने बिना किसी दुविधा के यह बात साफ कर दी है कि देश के आर्थिक, व्यापारिक और राष्ट्रीय हितों के संरक्षण के लिए हर संभव और आवश्यक कदम उठाया जाएगा। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों और महीनों के दौरान इस संवेदनशील मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन के नुमाइंदों के साथ कई दौर की तीखी और बेबाक चर्चाएं हो चुकी हैं। भारतीय पक्ष ने अमेरिका को इस बात से अच्छी तरह अवगत करा दिया है कि इस तरह के एकतरफा प्रतिबंधों और फैसलों का असर केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में गंभीर अस्थिरता और उठापटक भी पैदा हो सकती है। इन तमाम भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों से पार पाने के लिए सरकार देश के प्रमुख उद्योग जगत और व्यापारिक संगठनों के साथ मिलकर एक ठोस रणनीति तैयार करने में जुट गई है ताकि अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

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मंत्रालय की तरफ से यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत वैश्विक बाजार की तात्कालिक दशा और दिशा को ध्यान में रखते हुए अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिकी संसद द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद भारत सरकार लगातार हालात पर बारीक नजर बनाए हुए है और भविष्य में होने वाले घटनाक्रमों के आधार पर ही अपने अगले कदम तय करेगी। अतीत में भी भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी समकक्षों के साथ उच्च स्तर पर हुई बैठकों में यह बात बार-बार दोहराई है कि ऊर्जा सुरक्षा जैसे बुनियादी मामलों में किसी भी तरह का बाहरी दबाव स्वीकार्य नहीं हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यापारिक मार्ग और बाजार की स्वतंत्रता बिना किसी राजनीतिक बाधा के चलती रहे, और भारत अपने इसी रुख पर पूरी दृढ़ता के साथ कायम है।

देश के वाणिज्यिक और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार घरेलू उद्योगों के साथ लगातार संपर्क में है। नए अमेरिकी कानून के कारण आयात लागत या टैरिफ से जुड़े जोखिमों को कम करने के वास्ते वैकल्पिक उपायों पर भी विचार किया जा रहा है। विदेश मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में दोहराया है कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह से स्वतंत्र है और राष्ट्रीय हित हमेशा सर्वोपरि रहे हैं। अमेरिका में इस विधेयक के कानून बनने की प्रक्रिया पर भारत की पैनी नजर है और संसद के आगामी घटनाक्रमों के बाद आगे की कूटनीतिक और आर्थिक प्रतिक्रिया तय की जाएगी। देश की विशाल आबादी की ऊर्जा आवश्यकताओं को निर्बाध रूप से पूरा करने के वास्ते भारत हरसंभव दिशा में अपने विकल्पों को खुला रखते हुए काम कर रहा है।

सवाल-जवाब

अमेरिका द्वारा कौन सा नया विधेयक पारित किया गया है?
अमेरिकी संसद के निचले सदन में 'सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' पारित किया गया है।
इस अमेरिकी कानून का मुख्य प्रावधान क्या है?
इस कानून में रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर कड़े और अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है।
भारत की इस पर क्या प्रतिक्रिया रही है?
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बाजार की शर्तों पर तेल और गैस की खरीद जारी रखेगा।
भारत सरकार किन संगठनों के साथ मिलकर रणनीति बना रही है?
सरकार इस कानून से पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए उद्योग जगत और व्यापारिक संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही है।
इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ क्या बातचीत हुई है?
पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर कई दौर की बेबाक बातचीत हो चुकी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Ravikash Gupta@ravikash·6 घंटे पहले

अमेरिकी संसद के इस नए कानून से वैश्विक वित्तीय बाजारों और कमोडिटी फ्यूचर्स में अनिश्चितता का दायरा बढ़ गया है। यदि टैरिफ के दबाव के कारण आयात श्रृंखला बाधित होती है, तो इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार में ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर के मार्जिन पर पड़ सकता है। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि घरेलू उद्योग और वित्तीय संस्थान इस बढ़ती वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौती से निपटने के लिए क्या वित्तीय हेजिंग और रणनीतिक विकल्प अपनाते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 घंटे पहले

यह भू-राजनीतिक टकराव अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे आर्थिक और कानूनी परिणाम हो सकते हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों और नए टैरिफ प्रावधानों के चलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनुबंधों में विवाद, भुगतान प्रणाली में अवरोध और बीमा संबंधी जटिलताएं बढ़ने की पूरी आशंका है। यदि ऐसे मामलों में कानूनी या विधिक पेचीदगियां पैदा होती हैं, तो आयातकों और घरेलू उद्योगों को वित्तीय और संविदात्मक जोखिमों से निपटने के लिए मजबूत विधिक रणनीतियों की आवश्यकता होगी। कानून-व्यवस्था और नियामक मोर्चे पर आने वाली इन बाधाओं से पार पाना ही इस समय सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।

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